Sunday, 30 November 2014

हर कोई अपना आप गिनाने में रह गया

हर सिम्त तमाशा ही ज़माने में रह गया 
हर कोई अपना आप गिनाने में रह गया 

इल्ज़ाम सिर्फ़ मुझपे लगाता रहा है वो 
मेरा ही नाम सारे ज़माने में रह गया ?

ख़ुद अपने आपको नहीं देखा टटोल कर 
वो दूसरों के पाप गिनाने में रह गया 

दुनिया में नफरतों के अलावा है और कुछ 
क्या बस ख़लूस मेरे घराने में रह गया ?

कब की निकाल दी है ये दुनिया तेरे लिए 
इक तेरा नाम दिल के ख़ज़ाने में रह गया 

हासिल हुई थी, उसने मगर खो दिया मुझे 
फिर उसके बाद वो मुझे पाने में रह गया 

खिड़की पे बैठी सोच रही थी वो कुछ कहे 
गाड़ी चली वो हाथ हिलाने में रह गया 

मंज़िल पे गामज़न थे ये मेरे क़दम सिया 
वो रस्ते से मुझको हटाने में रह गया 

Har simt tamasha hi zamane mein rah gaya
Har koi apna aap dikhane mein  rah gaya

Ilzaam sirf mujh pe lagata raha hai wo
mera hi naam saare zamane mein  rah gaya???

khud apne aap ko nahi dekha tatol kar 
wo Doosron ke paap ginane mein rah gaya 

Duniya me nafrato.n ke ilawa hai aur kuch
Kya bas khuloos mere gharaane mein rah gaya ?

Kab ki nikaal di hai ye duniya tere liye
Ik tera naam dil.ke khazane mein rah gaya

Hasil huwi thee ..uss ne magar kho diya mujhe ..
Phir uske baad wo mujhe paane mein  rah gaya

 manzil pe gamzan the ye mere qadam siya 
wo raste se mujhko hatane mein rah gaya

चंद लम्हों की ख़ुशी थी जो चुराई मैंने

ख़ुद को जीने की अदा यूँ भी सिखाई मैंने 
चंद लम्हों की ख़ुशी थी जो  चुराई मैंने 

साथ चलती रही मेहरुमियां हरदम मेरे 
ज़िंदगी तुझसे बहुत खूब निभायी मैंने 

उसकी रुस्वाई से घर की मेरे  रुस्वाई है 
उसकी  हर बात जो है ऐब छुपाई मैंने 

कोई उम्मीद न ख़्वाहिश, तकाज़ा तुझसे  
अपनी हर बात ही सीने में  दबायी मैंने 
 
लेके एहसान ये उसका मैं सिया क्या करती 
आग ख़ुद अपनी ही अर्थी को  लगायी मैंने 


Wednesday, 26 November 2014

दरमियाँ कितने ज़माने आये


फिर वो मौसम न सुहाने आये 
दरमियाँ कितने ज़माने आये 

काश टूटे तो किसी तौर जमूद 
कोई दीवार गिराने आये 

रंज ओ ग़म पर ये तमाशाई मिरे 
जश्न मातम का मनाने आये

मेरी ख़ुद्दारी ने मुँह मोड़ लिया 
मेरे क़दमों पे ख़ज़ाने आये 

उम्र लम्हों में सिमट आई थी 
आप जब मुझको मनाने आये 


घर किराये का है फ़ानी दुनिया 
चार ही दिन तो बिताने आये 



Phir wo mausam na suhaane aaye.
Darmiyaa'n kitne zamaane aaye.

Kaash toote to kisi taur jamood.
Koi deewaar giraane aaye .

Ranj-o-gham par ye tamaashai mire 
jashn maatam ka manane aaye

Meri khuddari ne munh mod liya .
Mere qadmo .n pe khazane aaey

Umr lamho 'n me simat aayi thee .aap jab mujh ko manane aaye


Ghar kiraaye ka hai faani duniya
Char hi din to bitaane aaye.



siya

Monday, 24 November 2014

कब तअल्लुक़ तेरा ग़ैरों से गवारा है मुझे

तुझ से रिश्ता है जो वो जान से प्यारा है मुझे
कब तअल्लुक़ तेरा ग़ैरों से गवारा है मुझे

सारी ख़ुशियाँ मेरी वाबस्ता हैं तेरे दम से 
एक तेरा ही तो दुनिया में सहारा है मुझे 

मैंने जिस तरह भी बरता है तुझे, जाने दे 
ज़िन्दगी तूने अजब तौर गुज़ारा है मुझे 

मुझ पे दुनिया की खुली तल्ख़ हक़ीक़त जब से 
दर्द ने गहरे समंदर में उतारा है मुझे 

जाने किस सोच में बैठी थी मैं तन्हा  यूँ ही 
कैसी आहट सी हुई किसने पुकारा है मुझे 

जीत जाने की ख़ुशी ख़ाक हुई पल भर में 
हाँ सिया उसने बड़ी शान से हारा है मुझे 

tujh se rishta hai jo wo jaan se pyaara hai mujhe
Kab ta'alluk tera ghairon se gawara hai mujhe

Sari khushiyan meri wabasta hain tere dam se
ek tera hi to dunniya mein sahara hai mujhe

main ne jis taraha bhi barta hai tujhe, jaane de
zindagi tu ne ajab tour guzara hai mujhe

mujh pe duniya ki khuli talkh haqeeqat jab se
dard ne gahre samandar me utara hai mujhe

Jane kis soch mein baithi thi main tanha yun hi
kaisi aahat si hui kisne pukaara hai mujhe

jeet jaane ki khushi khaak hui pal bhar mein 
haan siya usne badi shaan se haara hai mujhe 

siya sachdev

Saturday, 22 November 2014

मेरे पैरोँ तले ज़मीं भी है

कुछ गुमाँ भी है कुछ यक़ीं भी है 
मेरे पैरोँ तले ज़मीं भी है 

वहशत ए दिल का क्या करूँ मैं ईलाज
पास है और वो नहीं भी है 

जा बजा उसको ढूढ़ती हूँ मैं
और मेरे दिल में वो मक़ीं भी है

ज़िंदगी तेरा ऐतबार नहीं
मौत पर तो मुझे यक़ी भी है

ये तो अच्छा नहीं तरीक़ा भी 
हाँ भी करते हो और नहीं भी है 

मैं पुजारन हूँ वो है रब मेरा 
ढूँढ लूँगी जहाँ कहीं भी है 

क्यों ख़फ़ा रहती है सिया ख़ुद से 
देख दुनिया बड़ी हसीं भी है 


kuchh gumaaN bhi hai kuchh yaqeeN bhi hai
mere pairoN tale zameeN bhi hai

wahshat e dil ka kya karu'n main ilaaj
paas hai aur wo nahi'n bhi hai 

 ja baja usko dhudhnti hoon main 
aur mere dil mein wo Maqee'N bhi hai 

zindgi tera aitbaar nahi 
  Maut par to mujhe Yaqee'n,Bhi Hai

 ye to acha nahin  tarika bhi 
haan bhi karta hai aur nahiN bhi hai


main pujaran hoon rab hai tu mera
dhudh lungi jahan kaheen bhi hai 

kyun khafa rahti hai siya khud se 
dekh duniya badi hansi bhi hai



Thursday, 20 November 2014

अब तरसते हैं मुस्कुराने को

खेल समझे थे दिल लगाने को 
अब तरसते हैं मुस्कुराने को
मुस्तैद है हँसी उड़ाने को 
आग लग जाए इस ज़माने को 

एक लम्हे में याद आती है 
मुद्दतें चाहिये भुलाने को 

आप महफ़िल सजाइये अपनी 
हम है तैयार दिल जलाने को 

जिनके अंदर हैं खामियाँ लाखों 
ऐब आये मेरे गिनाने को 
khel samjhe the dil lagane ko 
ab tarasate hain muskuraane ko 

"Mustayad hai hansi udaane ko 
aag lag jaaye is zamaane ko 

ek lamhe mein yaad aati hai
muddaten chahiye bhulaane ko 

aap mehfil sajaiyen apni 
hum hai taiyaar di jalane ko

jinko andar hain khamiya.n lakho'n 
aib aaye mere ginanae ko 

Tuesday, 18 November 2014

यहीं सोचती हूँ की क्या बात होगी

कभी आपसे जो मुलाक़ात होगी
यहीं सोचती हूँ की क्या बात होगी
भले दूर होंगे वोह मेरी नज़र से
मगर याद उनकी मिरे साथ होगी
मेरा दिल दुखाया तो ये जान लेना
इन आँखों से अश्कों की बरसात होगी
किसी की शिकायत करूँ भी तो कैसे
मेरे सामने खुद मेरी ज़ात होगी
जुबां बंद कर लीजिये होगा बेहतर
ज़ुबाँ मैं जो खोलूं बहुत बात होगी
इसी मशग़ले में गुज़रती है घड़ियाँ
अभी दिन ढलेगा अभी रात होगी
तेरे अश्क मैं अपने दामन में भर लूँ
मोहब्बत की ये भी तो सौग़ात होगी
सिया ये मुक़द्दर के हैं खेल सारे
किसे शह मिलेगी किसे मात होगी
kabhi aapse jo mulaqat hogi
yaheen sochti hoon ki kya baat hogi
Bhaley door hongey woh meri nazar se
Magar yaad unki mire saath hogi
mera dil dukhya to ye jaan lena
in aankhon se ashkon ki barsaat hogi.
Kisi ki shikayet karu'n bhi to kaise ?
Mere samne khud meri zaat hogi
zaba'N band kar lijiye hoga behter
zaba'n main jo kholu'n bahot baat hogi
Isi masghaley meiN guzarteeN haiN ghadiyaaN
Abhi din dhalega abhi raat hog
tere ashk main apne daaman mein bhar lu'n
mohbbat ki ye bhi to saughat hogi
siya ye Muqddar ke hai'n khel saare
kisey shah milegi kisey maat hogi

Monday, 17 November 2014

वो उंगुलियों पे हर एक दिन शुमार करता है

mufaailaatun faoolun mufaailun felun..
12121... 122.... 1212... 22

बिछड़ के मुझसे मेरा इंतज़ार करता है
वो उंगुलियों पे हर एक दिन शुमार करता है
बिछा दिया मिरी राहों में अपना दिल तूने
ये काम वो है जो इक जाँ _निसार करता है
कोई सितारा ए सहरी है या मेरी यादे
कोई तो है जो उसे बेक़रार करता है
उबूर करता है हर इक भंवर को तेरा ख्याल
बगैर नाव के दरिया को पार करता है
यहाँ तो जिसकी ज़ुबाँ पर मैं ऐतबार करूँ
वोही यक़ीं को मेरे तार तार करता है
दुखा के दिल को तेरे आया कब क़रार मुझे
मिरा ज़मीर मुझे शर्मसार करता है
ताल्लुक़ात में दौलत न लाइयें साहेब
ये पैसा रिश्तों में पैदा दरार करता है
वो दुश्मनों के इरादों को भांप कर उन पर
बड़े सधे हुए हाथो से वार करता है
सिया मैं जान भी दे दू तो इससे क्या होगा
वो दोस्तों में मुझे कब शुमार करता है
bichhad ke mujhse mera intzaar karta hai
wo unguliyo'n pe har ek din shumaar karta hai
bichha dia miri raho'n meiN apna dil tune
ye kam wo hain jo ik jaan_nisaar karta hai
koyi sitara e sahri hai ya meri yaadeN
koyi to hai jo use beqarar karta hai
uboor karta hai har ik bhaNvar ko tera khayal
bagair naav ke dariya ko paar karta hai
yahan to jiski zubaan par main aitbaar karun
wohi yaqee'N ko mere taar taar karta hai
dukha ke dil ko tere aaya kab qaraar mujhe
mira zameer mujhe sharmsaar karta hai
ta,alluqat me daulat na layiye saheb..
ye Paisa rishto mein paida darar karta hai
wo dushmano ke irado ko bhanp kar un par
bade sadhe hue hatho se waar karta hai
siya main jaan bhi de du to isse kya hoga
wo dosto mein mujhe kab shumaar karta hai
siya sachdev

Friday, 14 November 2014

अपना चैन ओ सुकूँ गवाती हो

failatun ...mufaelun failun ..



सोच में किस की डूब जाती हो 
अपना चैन ओ सुकूँ गवाती हो 

करके  तश'हीर राज़ की अपनी 
तुम ज़माने को क्यूँ सुनाती हो 

जब भी होती हो तुम उदास बहुत 
बेसबब यूँही मुस्कुराती हो 

बैठ तन्हाइयों के साये में 
दर्द के गीत गुनगुनाती हो 

हौसला तुमसे सबको मिलता हैं
अज़्म जीने का तुम सिखाती हो 

किस क़दर है तुम्हें सुख़न का जुनूँ 
अपनी हस्ती को भूल जाती हो 

फैलती जा रही है रुस्वाई 
राज़दाँ सबको क्यूँ बनाती हो 

soch mein kiski doob jaati ho 
  apna  chain o sukooN gawati ho

karke tash’heer raaz ki apni  
tum  zamane ko kyun sunaati ho 

jab bhi hoti ho tum udas bahut 
besabab yuheen  muskurati ho 

baith Tanhaiyon Ke Saaye Mein
dard ke geet gungunaati ho 

hausla tumse sabko milta hain 
azm  jeene ka tum sikhati ho

kis qadar hai tumeh sukhan ka junoo'N 
apni hasti ko bhool jaati ho 

phailati ja rahi hai rusvai 
raazdaa'n  sabko kyun banati ho 

नज़्म --- मोहब्बत ये अधूरी है


वो इक दीवाना सा लड़का
ये किससे प्यार कर बैठा
नहीं सोचा कभी उसने 
किसी की वो अमानत है
किसी के घर की इज़्ज़त है
समझता क्यों नहीं है वो
नहीं मुमकिन ये चाहत है
ये रस्मों से बग़ावत है
क्यूँ अपना दिल दुखाता है
उसे पहरों मनाता है
परस्तिश उसकी करता है
क्यों उसको प्यार करता है
उसी को सोचता है क्यों
उसी को चाहता है क्यों
क्यों करता है वो नादानी
किसी की एक ना मानी
वो जिसका पाक दामन है
परेशान है वो हैरां है
वो बेबस कह नहीं पाती
तेरा दुःख सह नहीं पाती
किसी की राह में कांटे
कभी वो बो नहीं सकती
बस इतना तुम समझ लेना
तुम्हारी हो नहीं सकती
nazm''----Mohabbat ye Adhuri hai
wo ik dewana sa ladka
ye kise pyaar kar baitha
nahi socha kabhi usne
kisi ki wo amanat hai
kisi ke ghar ki izzat hai
samjhta kyun nahi hai wo
nahi mumkin ye chahat hai
ye rasmo'n se -Bagawat hai
kyun apna dil dukhta hai
use pahro'n manata hai
Parastish uski Karta hai
kyun usko Pyar Karta hai
Usi ko sochta hai kyun
usi ko chahta hai kyun
kyun karta hai wo nadaani
kisi ki ek na maani
wo jiska Pak-daaman hai
pareshan hai wo hairan hai
wo Be-Bas kah nahi paati
tera dukh sah nahi paati
kisi ki raah mein kante
kabhi wo bo nahi sakti
bus itna tum samjh lena
tumahari ho nahi sakti
siya sachdev

Sunday, 9 November 2014

नज़्म--हाल ए नासाज़


तन पे ओढ़े हुए चादर ग़म ए तन्हाई की
आज बीमार मैं बिस्तर पे पड़ी सोचती हूँ 
हाल नासाज़ है मेरा ये बताऊ किसको
अपनी तकलीफ़ परेशानी सुनाऊ किसको
जब सहा जाता नहीं दर्द तो उठ जाती हूँ
और फिर उठ के दवा ज़हर सी मैं खाती हूँ
कोई हमदर्द तो होता कहीं नज़दीक मेरे
देखकर दर्द मेरा वो भी परेशां होता
हाथ से अपने दवा देता, सहारा देता
यूँ न घबराओ मुझे कहता दिलासा देता
ठीक हो जाओगी अपने को सम्भालो थोड़ा
और इसरार ये करता चलो खा लो थोड़ा
इस ज़माने में हुई किसकी तमन्ना पूरी
कौन बदहाल की समझा है यहाँ मजबूरी
nazm -- haal-e-nasaaz
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tan pe odhe hue chadar gham e tanhayi ki
aaj beemar main bistar pe padi sochti hoon
haal nasaaz hai mera ye batatu kisko
apni takleef, pareshani sunau kisko
jab saha jata nahin dard to uth jaati hoon
aur phir uth ke dawa zehar si main khati hoon
koyi humdard to hota kaheen nazdeek mere
dekhkar dard mera wo bhi Pareshaa'n hota
Haath Se apne dawa deta,sahara deta
yun na Ghabrao mujhe kahta dilasa deta
theek ho jaogi apne ko sambhalo thoda
aur israar ye karta chalo kha lo to thoda
is zamane mein hui kiski tamnna puri
kaun badhaal ki samjha hai yahan majburi
siya sachdev

Friday, 7 November 2014

नज़्म ----- जो मुमकिन हो अगर ऐसा --------------------------------------------



मुझे लौटा सकोगे तुम
मेरी छोटी सी वो दुनिया 
मेरे एहसास की शिद्दत
मेरे अल्फ़ाज़ की हुरमत
गुज़ारे संग जो लम्हे
मेरी ख़्वाहिश मेरे सपने
वो बेचैनी , वो बेताबी
मिरी आँखों की बेख्वाबी
लबों की वो हँसी मेरी
निगाहों की चमक मेरी
उमंगों से भरी बाते
हसीं वो दिन जवाँ राते
वो रंगो से भरी शामें
बस इक दूजे को हम थामें
जो मुमकिन हो अगर ऐसा
कि बीते दिन भुला पाओ
तो जाओ ह्क़ दिया तुम को
ख़ुशी से तुम चले जाओ !!!!!!
mujhe lauta sakoge tum
meri chhoti si wo duniya
mere ehssas ki shiddat
mere alfaz ki hurmat
guzare sang jo lamhe
meri khwahish mere sapne
wo bechaini wo betabhi
miri aankho ki bekhwabi
labo'n ki wo hansi meri
Nigaahon ki Chamak meri
umangon se bhari bate
haseen wo din jawan raate
wo rango se bhari shame'n
bus ik duje ko hum thame'n
jo mumkin ho agar aisa
wo beete din bhula pao
to jao haq diya tumko
khushi se tum chale jao
siya sachdev

gurunanak ji par kahe dohe

तृप्ता कालू राय की ऐसी ये सन्तान।
करने आये थे यहां ,इस जग का कल्याण।
मैं बाबा मूरख रही ,कैसे करूँ बखान।
तेरी महिमा का बयाँ ,कैसे करे ज़बान।
नारी का तुमने कहा ,सदा करो सम्मान।
सो क्यों मन्दा आखिये ,जिस जम्मे राजान।
वर्ण भेद या ज़ात पर ,क्यों करता अभिमान।
मानस अपने कर्म से ,होता सदा महान।
कल युग में तुमने किया ,गुरुनानक कल्याण।
सबको तुम देते रहे ,सत मारग का ज्ञान।
कर्म कांड पाखण्ड से ,दूर रहो नादान।
तरना है सन्सार ते। गाओ प्रभु के गान।
सबका मालिक एक है ,सब उसकी सन्तान।
नानक की वाणी यही ,सब हैं एक समान।...

Thursday, 6 November 2014

नज़्म - नहीं कोई भी आएगा



ये जो हर रोज़ ओ शब अपनी
हर इक दुःख दर्द की कड़ियाँ
पिरो लेती हूँ शब्दों से 
न जाने क्या क्या कहती हूँ
फ़िज़ूल उलझी ही रहती हूँ
कभी लगता है ऐसा भी
के ये हर पल की वहशत से
कभी थक हार के इक दिन
किसी बेनाम कोने में
चली जाऊँ बहुत ही दूर
जहां अपने सिवा कोई
नहीं पहचान सकता हो
मुझे फिर ढूंढ़ते , आवाज़ देते
तुम चले आओ
कहो आकर मुझे तुम ये
मुझे क्यों छोड़ कर तनहा
बताये बिन चली आई
तुम्हे एहसास है कोई
मेरा क्या हाल था तुम बिन
मगर मैं जानती हूँ ये
नहीं कोई भी आएगा ...

Wednesday, 5 November 2014

छुपा के दिल ही ही रंज ओ मलाल रखती हूँ

मैं तेरे दर्द की दुनिया बहाल रखती हूँ 
छुपा के दिल ही में रंज ओ मलाल रखती हूँ 

हज़ार तल्ख़ियाँ शामिल रही मगर फिर भी 
भुला के ख़ुद को मैं तेरा ख़्याल रखती हूँ 

सबब तो ऐसा नहीं कोई खास भी लेकिन 
मैं अपने ज़ब्त को क़सदन निढाल रखती हूँ 

ज़मीर ओ ज़ात मेरी ज़ुल्म के मुक़ाबिल हैं 
मैं अपने आप में इतनी मजाल रखती हूँ 

सिया ये मुझपे हुआ है मेरे ख़ुदा का करम 
मैं शेरगोई में थोड़ा कमाल रखती हूँ 

main tere  dard ki duniya bahaal rakhti hoon
chupa ke dil hi mein  ranj-o malal rakhti hoon..

Hazaar  talkhiyan shamil rahi magar phir bhi 
Bhula ke khud ko main tera khayaal rakhti hoon

sabab to aisa koyi khas bhi nahi lekin 
main apne zabt ko qasdan nidhal rakhti hoon
zameer o zaat meri zulm ke muqabil hain 
main apne aaap mein inti majaal rakhti hoon 

siya ye mujh pe hua hai mere khuda ka karam 
main shergoyi mein thoda  kamaal rakhti hoon 






Tuesday, 4 November 2014

हर एक ज़र्रे को सोने में ढाल सकती है

वो घर में रह के भी दुनिया संभाल सकती है 
हर एक ज़र्रे को सोने में ढाल सकती है 

वो नेकियों की जो देगी मिसाल बच्चों को
तो मुश्किलों से भी रस्ता निकाल सकती है 

वो एक माँ है जो बच्चों के वास्ते अपने 
ख़ुद अपनी जान भी जोखिम में डाल सकती है.

बुरी नज़र से जो देखेगा उसको बच्चों को
वो उस दरिन्दे की आँखे निकाल सकती है

जो अपने हिस्से की रोटी खिला दे बच्चों को 
वो मुफ़लिसी में भी बच्चों को पाल सकती है 

wo ghar mein rah ke bhi duniya sambhal sakti hai 
har ek zarre ko sone mein dhaal sakti hai 

wo nekiyo'n ko jo degi misaal bacho'n ko 
to mushkilo'n se bhi rasta nikaal sakti hai 

wo ek maa'n hai jo bacho'n ke waste apne 
khud apni jaan bhi jokhim mein daal sakti hai 

buri nazar se jo dekhega uske bacho ko 
wo us darinde ki aankhe'n nikaal sakti hai 

jo apne hisse ki roti khila de bachcho'n ko 
wo muflisi mein bhi bachcho'n ko paal sakti hai

Monday, 3 November 2014

जुदा जब तू हुआ था याद होगा

लुटा दिल रो रहा था याद होगा
जुदा जब तू हुआ था याद होगा
कभी अपना कहा था याद होगा
कोई वादा किया था याद होगा
बहुत पहले मुक़द्दर बन चुकी थी
तू मसरूफ़ ए दुआ था याद होगा
तेरा लहजा अभी बदला हुआ है
तू मेरा हमनवा था याद होगा
जुदाई का है तुम्हें अफ़सोस क्यों है
''तुम्हारा फैसला था याद होगा''
तेरी फ़रसूदगी ने तुझको मारा
मेरा लहजा नया था याद होगा
तेरी हर बात मानी थी हमेशा
तो फिर तू क्यों ख़फ़ा था याद होगा
तुझी में देखती थी अक्स अपना
तू मेरा आईना था याद होगा
मुझे तुमसे शिकायत कब थी कोई
तुम्हें ही हर गिला था याद होगा
बिछड़ कर तुझसे मैं ज़िंदा रहूंगी
तुझे मैंने कहा था याद होगा
luta dil ro raha tha yaad hoga
juda jab tu hua tha yaad hoga
kabhi apna kaha tha yaad hoga
koyi wada kiya tha yaad hoga
Bahot pahle muqadar ban chuki thee
tu masroof e dua tha yaad hoga
Tera laheja abhi badla hua hai .
Tu mera hamnawa tha yaad hoga
judayi ka tumhe afsos kyon hai
'Tumhaaraa Faislaa Tha Yaad Hoga'
Teri farsudgi ne tujh ko mara
Mera laheja naya tha .yaad hoga
Teri har baat maani thi hamesha
To phir tu kiyon khafa tha yaad hoga
tujhi mein dekhti thi aks apna
Tu mera aaina tha .yaad hoga
mujhe tumse shikayat kab thi koyi
tumhe hi har gila tha yaad hoga
Bichad kar tujh se main zinda rahoongi .
tujhe maine kaha tha .yaad hoga.

Saturday, 1 November 2014

ख़वाब को पावँ की ज़ंजीर नहीं कर सकते

आरज़ूओं को अनागीर नहीं कर सकते
ख़वाब को पावँ की ज़ंजीर नहीं कर सकते
क्या सितम है की मुक़द्दर लिखा है सब कुछ
फिर भी हम शिकवा ए तक़दीर नहीं कर सकते
जब बुलायेगी हमें मौत चले जायेंगे
हुक्म ऐसा है की ताख़ीर नहीं कर सकते
ये सफर वो है की जो छूट गया छूट गया
फिर उसे पाने की तदबीर नहीं कर सकते
जंग में कैसे टिकेंगे वो भला हस्ती की
जो किसी शाख को शमशीर नहीं कर सकते
आप तो ख़ैर बड़ा आदमी कहलाते हैं
हम तो छोटों को भी तहक़ीर नहीं कर सकते
सब पे पाबन्दी उसूलों की सिया लाज़िम है
सुख़न ओ शेर को जागीर नहीं कर सकते ..
Aarzuo'n ko 'anangeer nahi kar sakte
Khwab ko pau'n ki zanjeer nahi kar sakte
Kya sitam hai ki muqaddar ka lika hai sab kuchh :
Phir bhi ham shikwa-e-taqdeer nahi'n kar sakte
Jab bulaegi hame'n maut chale jaaenge
Hukm aisa hai ki taakheer nahi"n kar sakte.
Ye safar wo hai ki jo chhoot gaya chhoot gaya :
Phir use paane ki tadbeer nahi kar sakte
Jang me"n kaise tikenge wo bhala hasti ki
Jo kisi shaakh ko shamsheer nahi kar sakte
Aap to khair bada aadmi kahlaate hai "n :
Ham to chhoto"n ki bhi tahqeer nahi'n kar sakte
Sab pe pabandi usoolo'n ki siya laazim hai.
Sukhan-o-sh'er ko jaageer nahi'n kar sakt