Tuesday, 3 March 2015

फ़ासलें देख डर रही हूँ मैं

तेरे दिल से उतर रही हूँ मैं
आज महसूस कर रही हूँ मैं
ज़िंदगी बिन तेरे क़बूल नहीं
फ़ासलें देख डर रही हूँ मैं
मौत तो एक बार मारेगी
रोज़ किस्तों में मर रही हूँ मैं
इल्तेजा है के दूर मत जाओ
रेज़ा रेज़ा बिखर रही हूँ मैं
फिर सलीक़े से वादी ए ग़म में
हौले हौले उतर रही हूँ मैं
तुमसे वादा किया था जी लूँगी
आज उससे मुकर रही हूँ मैं
एक नन्हा चराग़ रोशन है
इन हवाओं से डर रही हूँ मैं
तेरी फ़ुरक़त में आज रो रो कर
ज़ख्म अश्कों से भर रही हूँ मैं
siya

Sunday, 1 March 2015

और खुद को मिटा के देख लिया

ख़्वाब झूठा सजा के देख लिया
और खुद को मिटा के देख लिया
ये भी तो आपकी बदौलत है
दर्द से दिल लगा के देख लिया
मैंने अपनी अना भुला कर भी
सर ये अपना झुका के देख लिया
काश मैं कामयाब हो जाती
हाय तुझको भुला के देख लिया
उसने अपना कभी नहीं माना
लाख दिल से निभा के देख लिया
हौसलें तोड़ न सका मेरे
वक़्त ने आज़मा के देख लिया
बज़्म उनकी न कर सकी रोशन
मैंने दिल भी जला के देख लिया
siya
siya

Friday, 27 February 2015

क्या हुआ है ख़ुदा बशर को तेरे

भूल बैठा है आज दर को तेरे 
क्या हुआ है ख़ुदा बशर को तेरे

आग खाती है जैसे लकड़ी को 
खा गया  है हसद हुनर को तेरे.

अपने लोगों में अजनबी है तू 
क्या नज़र लग गयी है घर को तेरे 

हौसला टूटने सा लगता है 
ज़िंदगी देख कर सफर  को तेरे 

मैं भी रखती गयी जबीं अपनी 
पावँ  पड़ते गए जिधर तेरे 

उफ़ ये दस्तार की हवस तौबा 
क्या बचा पाएगी ये सर को तेरे 

मैं  भटकती रही हूँ राहों में 
कोई रस्ता मिला  न घर को तेरे 

फन जिन्हें तूने कल सिखाया था 
आज़माते हैं अब  हुनर को तेरे 

Monday, 23 February 2015

मुख़्तलिफ़ क्यों हैं दिल में सनम आपके

ज़ाहिरा तो हैं दैरो हरम आपके मुख़्तलिफ़ क्यों हैं दिल में सनम आपके बस मेरे पास है बेगुनाही मेरी अदल इन्साफ कुर्सी क़लम आपके ज़िंदगी बोझ लगने लगी दिन ब दिन आप मेरे हुए न और न हम आपके एक वादा वफ़ा आप कर न सके क्या हुए अहद ए लुत्फ़ ओ करम आपके क़द्र उसकी न जानी कभी आपने सुख में दुःख में थी जो हमक़दम आपके हक़ की ख़ातिर उठाऊंगी आवाज़ मैं क्यूँ सहूँगी ये ज़ुल्मो-सितम आपके
सब ग़मो से हमें भी बरी कर दिया मेरे मालिक सिया पर करम आपके

Saturday, 21 February 2015

मुझे तनहा ही रहना भा गया है


मेरा दिल शोर से घबरा गया है 
मुझे तनहा ही रहना भा गया है 

न जाने कब  तलक़ मंज़िल पे पहुँचें
सफ़र से दिल मेरा उकता गया है

उसे रास आई न बाहर की दुनिया 
क़फ़स में फिर परिंदा  आ गया है 

मैं समझी थी भुला बैठी हूँ उसको 
मुझ वो आज फिर  याद आ गया है 

मेरे दिल को नहीं समझा किसी ने 
यहीं ग़म मेरे दिल को  खा गया है-

अबद  तक साथ कब किसने निभाया 
यहाँ से तो हर एक  तनहा गया है 

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Friday, 20 February 2015

सुर्ख़ रंगत तेरी ज़र्द पड़ जायेगी

इतना रोने से सूरत बिगड़ जायेगी 
सुर्ख़ रंगत तेरी ज़र्द पड़ जायेगी 

तल्ख़ लहजे से जो तुमने गुफ़्तार की
साँस मेरी ये फिर से उखड जायेगी  

वक़्त ने तेरे चेहरे पे क्या लिख दिया 
आईना देख हैरत में पड़ जायेगी 

साथ अपनों का मिलता रहा जो उसे
 अपने हालात से भी वो लड़ जायेगी 

ये जो बुनियाद रिश्तों की है खोखली 
कच्चे बखिये की जैसी उधड़ जायेगी 

मुड़ के फिर न पलट करके देखेगी वो 
ज़िद्द पे जो एक दिन अपनी अड़ जायेगी 

तुझसे जिस दिन बिछड़ जायेगी ये सिया 
उस घडी तेरी दुनिया उजड़ जायेगी 

Sunday, 1 February 2015

सभी तनहा हैं जीवन के सफर में

फ़िज़ा रहती है कोहरे के असर में
नहीं कुछ फर्क भी शाम- ओ -सहर में
तुम्हें ये भी नहीं मालूम शायद
सभी तनहा हैं जीवन के सफर में
मुझे मिलना नहीं है अब किसी से
बहुत खुश हूँ मैं तनहा अपने घर में
तेरे दिल तक पहुँचना चाहते हैं
अभी ठहरे हैं हम तेरी नज़र में
फ़क़ीराना तबियत पायी मैंने
ये दौलत ख़ाक़ है मेरी नज़र में
मेरा घर साथ ही चलता है मेरे
कहीं भी मैं अगर निकलूं सफर में