Sunday, 18 January 2015

वो दर्द लफ्ज़ की तफ़्सीर में नहीं आया

 लिखा जो अश्क से ,तहरीर में नहीं आया 
 वो दर्द लफ्ज़  की तफ़्सीर में नहीं आया  

अभी कुछ और जकड ,दुश्मनी की बंदिश में 
 लहू  का ज़ायक़ा  ज़ंजीर में नहीं आया 

हो दर्द हल्का तो,झूठी ख़ुशी भी मिल जायें 
इक ऐसा लम्हा भी तक़दीर में नहीं आया 

किसी के हिज्र ने मुफ़लिस बना दिया शायद 
पलट के अपनी वो जागीर में नहीं आया 

वो मेरी आँखों पे क़ाबिज़ रहा सिया लेकिन 
किसी भी ख़्वाब की ताबीर में नहीं आया 

Likha jo ashk se .tahreer me nahi aaya .
Wo dard lafz ki tafseer mein nahi'n aaya

 Abhi kuch aor jakad ,dushmani ki  bandish me .
Lahoo ka zaaeqa zanjeer  me  nahi  aaya

ho dard halka to jhoothi khushi bhi mil jaaye 
ik aisa lamha bhi taqdeer mein nahi aaya 

kisi ke hijr ne muflis bana diya shayad 
palat ke apni wo jageer mein nahi aaya 

wo meri aankho pe qabiz raha siya lekin 
kisi bhi khwaab ki taabeer mein nahi aaya 

Sunday, 11 January 2015

उसी का इक शेर हूँ सिया मैं जो ज़िंदगी की ग़ज़ल रहा है

ख्याल उसका हर एक लम्हा ज़मीन ए दिल पे मचल रहा है 
उसी का इक शेर हूँ सिया मैं जो ज़िंदगी की ग़ज़ल रहा है 

मोहब्बतों का उरूज मुझसे न पूछिये किस मुक़ाम पर हूँ 
वो मेरी नींदों में जागता है,वो मेरे ख़्वाबों में पल रहा है 

मिले जो हम से वो बाद मुद्दत लिपट के हमसे वो रो पड़े हैं 
कई बरस की तपिश का लावा है आँख से जो निकल रहा है 

जिसे मुहाफ़िज़ समझ के तुमने गले लगाया, पनाह दी थी 
समझ में आया तुम्हारा क़ातिल तुम्हारे घर में ही पल रहा है 

उस आने वाले की मुन्तज़िर हैं सिया मेरी आती जाती सांसे 
निगाह देहलीज़ पर टिकी है चराग़ आशा का जल रहा है 

आपसे दिल कभी मिला ही नहीं

कैसे कह दूँ की फ़ासला  ही नहीं
आपसे दिल कभी मिला ही नहीं 

सारी दुनिया की फ़िक्र हैं उसको 
मेरे बारे में सोचता ही नहीं 

कैसे मैं अपने आप को देखूँ 
मेरे कब्ज़े  में आइना ही नहीं

चल दिया फेर कर नज़र ऐसे 
जैसे मुझको वो जानता ही नहीं 

हाथ उठते तो है दुआ के लिए 
और लब पर कोई दुआ ही नहीं 



Thursday, 8 January 2015

अपनी बेचैन तबियत मैं सम्भालूँ कैसे


ख़ुद को इन तल्ख़ी ए हालात में ढालूँ कैसे 
अपनी  बेचैन तबियत मैं  सम्भालूँ कैसे 

ज़ोर इस ज़ेहन पे डालो न सभी कहते है 
फिर घुटन अपनी ये बाहर मैं निकालूँ कैसे 

जिनकी ताबीरों में पिन्हा हैं सदा महरूमी 
अपने सोये हुए ख़्वाबों को जगा लूँ कैसे 

सिर्फ  एहसास  मुक़य्यद  है शिकस्ता  दिल में 
इस  स्याह खाने  में अरमान सजा लूँ कैसे 

रोके रखती हूँ मैं  पलकों पे ही सावन की झड़ी 
ग़म की बरसात को  बाहर मैं निकालूँ कैसे 

 घर के ग़म चैन से जीने नहीं देते मुझ को 
 झूटी खुशियों के लिए ख़ुद को मना लूँ  कैसे 
       
ज़िंदगी रेंगती है  मौत की राहों पे सिया 
जो घडी आये क़ज़ा की तो मैं टालूँ कैसे 

Wednesday, 7 January 2015

नज़्म ----अतीत की चादर


एक रूठी उदास शाम को जब 
कितनी परतें पुरानी यादो की 
कैसे झकझोरती हैं आके मुझे 
खोलने को अतीत की चादर 
घेर लेती है अनायास आकर 
वो जो धुँधली सी हो चुकी है अब 
वोही तस्वीरें उभर आती हैं 
मेरे माज़ी की है जो परछाई 
मेरी आँखों में उतर जाती है 
और मुझको बहुत रुलाती है 
ek ruthi udaas shaam ko jab 
kintni parte'n puaarni yadon ki
kaise jhakjhorti  hai aake mujhe 
kholne ko  ateet ki chadar 
gher leti  hain anayaas aakar 
 wo jo dhundli si  ho chuki hain ab 
wohi  taswere'n ubhar aati hain 
mere mazi ki aake  parchhai 
meri aankhon mein utar  jati hai
Aur mujhko bahut rulati hai '

Monday, 5 January 2015

छोटी-मोटी बाधाओं से क्यूँ घबरायें

अपने दृढ़ निश्चय से आगे बढ़ते जायें
छोटी-मोटी बाधाओं से क्यूँ घबरायें

जो अपनाते दूजे का दुःख और वेदना
सच्चे अर्थों में वो ही मानव कहलाये

खो जाना मायूस न होकर अंधियारों में
बन कर दीपक स्वयं अंधरें दूर भगाये

निखरी हुई कल्पनाओं के पंख लगाकर
खुले आसमानो में पंछी उड़ते जायें

Wednesday, 31 December 2014

नज़्म .... आगे पीछे बस तन्हाई


बीते साल ने छीना मुझसे वीर मेरा वो मेरा भाई
लगता है हर जानिब मेरे फैल गयी मेरी तन्हाई
वक़्त अचानक बदल गया है उम्र लगी है सहसा ढलने 
हाँ कहने को अपने रिश्ते भाषा इनकी लगे परायी
इतने दुःख और ज़ख्म लगे है रूह तलक है छलनी छलनी
जीवन तक कम पड़ जाएगा होगी ना दुःख की भरपाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
क्या ऐसे रिश्ते होते हैं ? आँखे मिर्चों से धोते हैं
बेचैनी की सेज बिछाकर तंज़ भरे काँटे बोते हैं
हार गयी इज़्ज़त की ख़ातिर चुप चुप हूँ ग़ैरत की ख़ातिर
सब्र खड़ा है सर निहुड़ाये वरना फैलेगी रुसवाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
उंगली पकड़ने वाले हाथ भी अब तो अंजाने लगते हैं
दुनिया जिन्हें मेरा कहती है वोह सब बेगाने लगते हैं
सबकी अपनी अपनी दुनिया सबके अपने अपने क़िस्से
सब के कान हुए है बहरे अपना दर्द कहूँ मैं किस से
बचपन में माँ बाप थे बिछड़े और जवानी में ये भाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
कैसा दिसंबर जनवरी कैसी जीवन मिला है सो है जीना
अपना भी अब होश कहाँ है गुज़र रहा है साल महीना
इतना अरसा बीत चूका है कब बदला ये समय हरजाई
सायों से बस भरी हुई है नहीं दिलो में ज़रा समायी
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
siya