Tuesday, 28 October 2014

नज़्म ----हिदायत (HIDAYAT )


ये पत्थर दिल है ये क्या दर्द जाने
नहीं आते कभी आँसू बहाने
नहीं इनपे असर होता है कोई
बला से इनकी मर जाए जो कोई
बहुत आसान इनके रास्ते है
मोहब्बत खेल इनके वास्ते है
है इनका प्यार झूठा बात झूठी
फरेबी है ये इनकी ज़ात झूठी
है इनका काम बस धोखा ही देना
ना कोई बात इनकी दिल पे लेना
अगर बातों में इनकी आओगी तुम
कसम से फिर बहुत पछताओगी तुम
कभी ऐसा न कोई काम करना
घराने को न तुम बदनाम करना
ग़लत हाथों में खुद को सौंपना मत
कभी इज़्ज़त को मत नीलाम करना
ye ptthar dil hai ye kya dard jaane
nahin aate kabhi aansu bahnae
nahi inpe asar hota hai koyi
bala se inki mar jaaye jo koyi
bahut aasan inke raste hai
mohbbat khel inke waste hai
hai inka pyaar jhootha, baat jhoothi
farebi hai ye inki zaat jhoothi
hai inka kaam bus dhokha he dena
na inki baat koyi dil pe lena
agar bato mein inko aaogi tum
kasam se phir bahut pachtaogi tum
kabhi Aesa koi bhi kaam karna
gharane ko nahi badnaam karna
ghalat hatho mei khud ko saunpna mat
kabhi Izzaat ko mat Neelaam karna

Monday, 27 October 2014

मेरा दिल था एक खिलौना

जीवन क्या ?काँटों का बिछौना
कितना मुश्किल इस पर सोना

जब जी चाहा तुमने खेला
मेरा दिल था एक खिलौना

जाओगे या साथ रहोगे !
अपना मूंह भी तो खोलो ना !

ज़ालिम प्यार का यहीं नतीजा
दुःख पाना और जीवन खोना

सदमें आँसू हिचकी आहें
हिज्र की शब में और क्या होना

यूहीं रस्ता कट जाएगा
तुम भी मेरे साथ चलो ना !

मुझसे सिया सहेली बोली
दिल में ये ख़्वाहिश न बोना

Sunday, 26 October 2014

वो अपनो में मुझे गिनते नहीं हैं

ताल्लुक़ अब वो पहले से नहीं हैं 
वो अपनो में मुझे गिनते नहीं हैं

जिन्हे है वास्ता हमसे न कोई 
 हम उनसे राब्ता रखते  नहीं हैं 

ये  पथरा सी गयी है ख़ुश्क़ आँखे
अब इनसे अश्क भी बहते नहीं हैं 

है बच्चों की तरह फितरत हमारी 
के दिल में ज़हर हम रखते नहीं हैं 

बरस जाते  है आँसू अपने दुःख पर ! 
किसी के ग़म में ये बहते नहीं हैं 

छलक जाते हैं क्यों जज़्बात मेरे 
ये क़ाबू में मेरे रहते नहीं हैं 

ये आँसू ज़ब्त की तौहीन होगी 
सिया अब आह भी भरते नहीं हैं 

Taalluq ab wo pehle se nahi hai
wo apno mein mujhe ginte nahi'n hain

jinhe hai wasta humse na koyi 
hum unse rabta rakhte nahi'n hai'n 

ye pathra si gayi hai  Khushk Aankhe'n 
ab inse ashk bhi bahte nahi  haiN

Hai bachchoN ki tarah fitrat hamaari
K dil meN zahr hum rakhte nahin hain

 baras jaate hai Aansu apne dukhh par ! 
kisi ke gham mein kyun bahte nahi haiN

chalak jaate hai'n kyun jazbaat aksar ?
ye Qabu mein mere rehte nahi haiN

ye aansun zabt ki tauheen hogi 
siya ab aah bhi bharte nahi  haiN

Wednesday, 22 October 2014

ख़ौफ़ तीरगी से है क़ैद हैं उजालों में

खोये खोये रहते हैं जाने किन ख्यालों में 
ख़ौफ़ तीरगी से है क़ैद हैं  उजालों में 

क्या अजब तरीक़ा है उनकी गुफ़्तगू में भी 
तंज़ चुभता रहता है आपके सवालों में 

आपको नहीं फुर्सत याद भी हमें कीजे 
हम भी क्यों रहे ग़ाफ़िल आपके ख्यालों में 

आप हो कभी रुसवा ये तो हम न चाहेंगे 
बंद कर के रक्खेंगे हम ज़ुबाँ को तालों में 

क्या किसी ने दिल का भी हाल उनके जाना है 
जिनको सिर्फ देखा है रेशमी दुशालों में 

दूसरों की ख़ातिर जो ज़िंदगी बिताते हैं 
नाम उनका लेते हैं लोग भी मिसालों में 


khoye khoye rahte hai jaane kin khayalon mein
khauf teergi se hai, qaid hain ujalon mein 

kya ajab tareqa hai unki guftgu mein bhi 
tanz chubhta rahta hai aapke sawalon mein

 aapko nahi fursat yaad bhi hame'n keeje 
Ham bhi kyun rahe'n ghafil , aapke khayalon mein.

aap ho'n kabhi rusva ye to ham na chaehnge 
band kar ke rakhenge ab zubaa'n  ko talon mein.

kya kisi ne dil ka bhi haal unke jana hai 
jinko sirf dekha hai reshmi dushalon mein.

Dusro Ki Khatir jo zindgi bitatae hain 
naam unka lete hain log bhi misalon mein.



ख़ुशी मिलेगी इसी इंतज़ार में गुज़री

हयात कब ये सुक़ून ओ क़रार में गुज़री 
ख़ुशी मिलेगी इसी इंतज़ार में गुज़री

ये और बात गयी तो नहीं वहां पे मगर
तमाम उम्र तुम्हारे दयार में गुज़री

जो ली है साँस भी मैंने तेरी इजाज़त से
तमाम उम्र तिरे इख़्तियार में गुज़री

वो जिसके सामने सारे गुलाब फीके थे 
उसी की उम्र मगर ख़ारज़ार में गुज़री 

जो ली है साँस भी मैंने तेरी इजाज़त से 
तमाम उम्र तेरे इख़्तियार में गुज़री 

पलट के आओगे  यक़ीन है मुझको 
मेरी हयात इसी इंतज़ार में गुज़री 

Hayaat kab ye sukoon o qaraar meN guzri ..
Khusi milegi isi intezaar meN guzri

ye aur baat gayi to nahi waha'n pe main
tamam umr tere ikhtiyar mein guzri

wo jiske samne sare gulaab pheeke the 
usi ki umr magar kharzaar mein Guzri

jo li hai saaNs bhi maiN ne tiri ijaazat se
Tamaam umr tere ikhtiyaar meN guzri

Palat ke aoge ik din yaqeen tha mujhko
meri hayaat isi intizaar me'n guzri.

Friday, 17 October 2014

बोझ हर ग़म का तुझे तनहा उठाना होगा

तू समझती है तेरे साथ ज़माना होगा 
बोझ हर ग़म का तुझे तनहा उठाना होगा

मैं तुझे दिल में बसा भी नहीं सकती अपने 
एक दिन छोड़ के ख़ुद  को मुझे जाना होगा 

अब मोहब्बत की ख़लिश काफी नहीं है दिल को 
दर्द सीने में कोई और जगाना होगा

फूल ही फूल हो किस्मत में ज़रूरी तो नहीं 
तुमको ख़ारों से भी दामन को सजाना होगा 

अजनबी होते हुए अपना नज़र आता है 
उससे लगता है कोई रिश्ता पुराना होगा  

एक सन्नाटा सा आँखों में उतर आया है 
दिल को शायद कोई तूफ़ान उठाना होगा 

फिर सर ए शाम तेरी आहटे महसूस हुई 
रात भर यूँहीं चराग़ों को जलाना  होगा 


tu samjhti  hai tere sath zamana hoga
bojh har gham ka tujhe tanha  uthana hoga 

main tujhe dil mein basa bhi nahi sakti apne 
ek din chhod ke khud ko mujhe jana hoga 

ab mohbbat ki khalish kaafi nahi hai dil ko 
dard seene mein koyi aur jagana hoga 

phool hi phool ho kismat mein zaruri to nahi
tumko Khaaro'n se bhi daman ko sajana hoga

ajnabi hote hue apna nazar aata hai
us se lagta hai koi rishta purana hoga

ek sannta sa aankho mein utar aaya hai
dil ko shayad koyi toofaan uthaana hoga

phir sar e sham teri aahte mehsus hui 
raat bhar aaj charagon ko jalana hoga 


ख़ुद अपने साये से डर लग रहा है

ये दिल उजड़ा हुआ घर लग रहा है
ख़ुद अपने साये से डर लग रहा है
जो अपना था पराया हो गया है
ये क्यूँ तुझसे बिछड़ कर लग रहा है
मुझे तन्हाई ये पागल न कर दे
ये सहरा में भी आकर लग रहा है
महकती ख्वाहिशों के फूल सूखे
चमन भी सारा बंजर लग रहा है
जला डाले न मेरा आशियाना
सुलगता सारा मंजर लग रहा है
सिया बदला हुआ है सारा माहौल
ये घर भी अब कहाँ घर लग रहा है
ye dil ujda hua ghar lag raha hai
khud apne saye se dar lag raha hai
jo apna tha paraya ho gaya hai
ye kyun tujhse bichad kar lag raha hai
mujhe tanhayi ye pagal na kar de
ye sahra mein bhi aakar lag raha hai
mahakati khwahisho'n ke phool sukhe
chaman bhi sara banjar lag raha hai
jala daale na mera aashiyana
sulagata sa jo manzar lag raha hai
siya badla hua hai sara mahoul
ye ghar bhi ab kahan ghar lag raha hai