Friday, 12 December 2014

फ़रेब ए आरज़ू ही खा रही हूँ

फ़रेब ए आरज़ू ही खा रही हूँ 
मैं अपने आप को झुठला रही हूँ

किसी  के ग़म में घुलती  जा रही हूँ 
संभल जा दिल तुझे समझा रही हूँ 

मेरे ग़म दर्द आहें और आंसू 
इन्ही से खुद को मैं बहला  रही हूँ 

इन्ही सदमों का दिल पे बोझ लेकर 
तुम्हारी ज़िंदगी से जा रही हूँ

किसी के नाम से रुसवा रही हूँ
किसी को चाह के पछता रही हूँ

ये चाहत,ये वफायें ये तड़पना
मैं इनके नाम से घबरा रही हूँ

हैं क्यूँ उलझे हुए रिश्तों के धागे
इसी उलझन को मैं सुलझा रही हूँ

कोई साथी कोई महरम नहीं था
भरी दुनिया में भी तन्हा रही हूँ

समझना ही नहीं जो चाहता कुछ
उसी पत्थर से सर टकरा रही हूँ

ख़लिश बन कर खटकते हैं जो अब भी
उन्ही ज़ख्मो को मैं सहला रही 




नज़्म ---उदासी से भरा आलम



वही हैरान सी ख़ामोशियाँ है
वही चारों तरफ मायूसियाँ है 
लगे सिमटा हुआ हर एक लम्हा 
हाँ तन्हा जिस्म और ये जान तन्हा 
बहुत बेरंग सा मौसम लगे है 
उदासी से भरा आलम लगे है 
 मेरे दिल की चुभन जाती नहीं है 
कोई भी शय मुझे भाती नहीं है 
वो उठ कर रात को चुपचाप रोना 
फिर एहसासों को लफ़्ज़ों में पिरोना 
गिनू घड़िया कटेगी रात ये कब 
सह्ऱ की आस में बैठी हूँ मैं अब 

न जाने कब वो आएगा सवेरा 
कि ये जीना, मुकम्मल होगा मेरा 

wahi hairan si khamoshiya.n hai
wohi  chaaron taraf maayusiya. n hai 
lage  Simta hua  har ek lamha
hain tanha jism aur ye jaan tanha 
bohot berang sa mausam lage  hai 
udasi se bhara aalam lage hai 
mere dil ki chubhan jati nahi hai
koyi bhi shay mujhe bhati nahi hai
wo uth kar raat ko chupchap rona
phir ehsaso'n ko lafzo'n mein pirona
ginu ghadiya kategi raat ye kab 
Sehr ki aas mein baithi hoon main ab 

na  jaane  kab wo aaey ga sawera 
ki  ye jeena ... ,mukammal hoga  mera  




Monday, 8 December 2014

आपका साथ बा ख़ुदा है ना !

ख़वाब आँखों ने इक बुना है ना !
आपका साथ बा ख़ुदा है ना !
मेरी मरती हुई उम्मीदों को
ज़िंदगी का दिया पता है ना !
गुमशुदा थी कई ज़माने से
मुझ को मुझसे दिया मिला है ना !
वक़्त की आग ने जला कर यूँ
तुमको कुंदन बना दिया है ना !
थी खुले सायबान की चाहत
तुमने रास्ता दिखा दिया है ना !
दिल भी अपनी तरफ झुका लेना
मैंने सर तो झुका लिया है ना !
जिस्म हारा है जान बिस्मिल है
मेरी उल्फत का ये सिला है ना
फिर रही थी तलाश ए हस्ती में
मेरी मंज़िल का तू पता है ना !
khwaab ankho ne ik buna hai na !
aapka saath bakhuda hai na !
Meri marti hui umeedoN ko
zindgi ka diya pata hai na !
gumshuda thi main ik zamane se
mujhko mujhse diya mila hai na !
waqt ki aag ne jala kar yun
tumko kundan bana diya hai na !
dil bhi apni taraf jhuka lena
maine sar to jhuka liya hai na
thi khule saaibaan ki chahat
tumne rasta dikha diya hai na !
jism hara hai jaan bismil hain
meri ulfat ka ye sila hai na !
phir rahi thi Talaash-e-hasti mein
meri manzil ka tu pata hai na !
siya

Sunday, 7 December 2014

मेरा दामन तो दाग़दार नहीं

ज़ात से अपनी शर्मसार नहीं
मेरा दामन तो दाग़दार नहीं

रूह पर बोझ ज़िंदगी का है
मौत पर भी तो इख़्तियार  नहीं

नफ़्स का हम न कर सके सौदा
ये हमारा तो कारोबार नहीं

देखते हो पलट पलट कर क्यूँ
मेरा चेहरा है इश्तेहार नहीं

लोग गुम है हवस परस्ती में
ख़ून के रिश्तों में भी प्यार नहीं

हाल ए दिल इत्मिनान से कहिये
मुतमइन हूँ मैं बेक़रार नहीं

ख़त्म जब राब्ते सिया  सारे 
फिर किसी का भी इंतज़ार नहीं

zaat se apni sharmsaar nahi'n 
mera  daaman to daaghdaar nahi'n 

Rooh par bojh ziNdgi ka hai
maut par bhi to Ikhtiyaar nahi'n 

Nafs ka ham na kar sake sauda
 ye hamara to kaarobaar nahi'n

dekhte ho palat palat kar kyun
mera chehra hai ishtehaar nahi'n

log gum hai'n  hawasparsti  mein 
Khooni rishto me bhi to peyaar nahi

Haal e dil itminan se kahiye
Mutmaiin hoon main beqarar nahi

khatm jab rabte siya saare 
 phir kisi ka bhi  intezaar nahin

Sunday, 30 November 2014

हर कोई अपना आप गिनाने में रह गया

हर सिम्त तमाशा ही ज़माने में रह गया 
हर कोई अपना आप गिनाने में रह गया 

इल्ज़ाम सिर्फ़ मुझपे लगाता रहा है वो 
मेरा ही नाम सारे ज़माने में रह गया ?

ख़ुद अपने आपको नहीं देखा टटोल कर 
वो दूसरों के पाप गिनाने में रह गया 

दुनिया में नफरतों के अलावा है और कुछ 
क्या बस ख़लूस मेरे घराने में रह गया ?

कब की निकाल दी है ये दुनिया तेरे लिए 
इक तेरा नाम दिल के ख़ज़ाने में रह गया 

हासिल हुई थी, उसने मगर खो दिया मुझे 
फिर उसके बाद वो मुझे पाने में रह गया 

खिड़की पे बैठी सोच रही थी वो कुछ कहे 
गाड़ी चली वो हाथ हिलाने में रह गया 

मंज़िल पे गामज़न थे ये मेरे क़दम सिया 
वो रस्ते से मुझको हटाने में रह गया 

Har simt tamasha hi zamane mein rah gaya
Har koi apna aap dikhane mein  rah gaya

Ilzaam sirf mujh pe lagata raha hai wo
mera hi naam saare zamane mein  rah gaya???

khud apne aap ko nahi dekha tatol kar 
wo Doosron ke paap ginane mein rah gaya 

Duniya me nafrato.n ke ilawa hai aur kuch
Kya bas khuloos mere gharaane mein rah gaya ?

Kab ki nikaal di hai ye duniya tere liye
Ik tera naam dil.ke khazane mein rah gaya

Hasil huwi thee ..uss ne magar kho diya mujhe ..
Phir uske baad wo mujhe paane mein  rah gaya

 manzil pe gamzan the ye mere qadam siya 
wo raste se mujhko hatane mein rah gaya

चंद लम्हों की ख़ुशी आज चुराई मैंने

ख़ुद को जीने की अदा यूँ भी सिखाई मैंने 
चंद लम्हों की ख़ुशी आज चुराई मैंने 

साथ चलती रही महरूमी ए किस्मत मेरी 
ज़िंदगी तुझसे बहुत खूब निभायी मैंने 

कोई ढूँढे जो कमी उसमें बुरा लगता है 
क्या कोई की है कभी उसकी बुरायी मैंने 

उसकी रुस्वाई से घर की मेरी रुस्वाई है 
उसका हर ऐब बुराई भी छुपाई मैंने 

एक मुद्दत हुई उम्मीद न रक्खी उससे 
अपनी हर एक तमन्ना ही दबायी मैंने 

Wednesday, 26 November 2014

दरमियाँ कितने ज़माने आये


फिर वो मौसम न सुहाने आये 
दरमियाँ कितने ज़माने आये 

काश टूटे तो किसी तौर जमूद 
कोई दीवार गिराने आये 

रंज ओ ग़म पर ये तमाशाई मिरे 
जश्न मातम का मनाने आये

मेरी ख़ुद्दारी ने मुँह मोड़ लिया 
मेरे क़दमों पे ख़ज़ाने आये 

उम्र लम्हों में सिमट आई थी 
आप जब मुझको मनाने आये 


घर किराये का है फ़ानी दुनिया 
चार ही दिन तो बिताने आये 



Phir wo mausam na suhaane aaye.
Darmiyaa'n kitne zamaane aaye.

Kaash toote to kisi taur jamood.
Koi deewaar giraane aaye .

Ranj-o-gham par ye tamaashai mire 
jashn maatam ka manane aaye

Meri khuddari ne munh mod liya .
Mere qadmo .n pe khazane aaey

Umr lamho 'n me simat aayi thee .aap jab mujh ko manane aaye


Ghar kiraaye ka hai faani duniya
Char hi din to bitaane aaye.



siya