Saturday, 20 June 2015

दिया जलता रहेगा ये सहर तक

तू आये या न आये मेरे घर तक
दिया जलता रहेगा ये सहर तक
कहाँ पर खो गयी है आते आते
ख़ुशी पहुंची नहीं क्यों मेरे घर तक
अभी कुछ ज़ब्त की ताकत है बाक़ी
अभी पानी नहीं पहुँचा है सर तक
मुलाकातों की फिर क्या बात करते
कोई मिलती नहीं उनकी खबर तक
किसी पर जीते जी जो मर न पाये
उन्हें आया न जीने का हुनर तक
शिकारी का निशाना बन गया क्या
नहीं पहुंचा परिंदा वो शजर तक
जो साहिल पर शिकस्ता हो गयी है
वो कश्ती कैसे पहुँचेगी भँवर तक
बहुत मुश्किल हैं राहें ज़िंदगी की
कई बिछड़े हैं साथी इस सफर तक
बुलंदी ये सिया किस काम की फिर
अगर पहुंचे नहीं उनकी नज़र तक

Wednesday, 17 June 2015

उदास रहने का ढूँढा नया बहाना फिर

पड़ा है भारी बहुत  दिल का ये लगाना फिर
उदास रहने का ढूँढा नया बहाना फिर 

किसी के वास्ते थोड़ा सा मुस्कुराना फिर 
बनेगा दर्द का ये दिल मेरा निशाना फिर 

फ़िर आज अपना ताल्लुक़ किसी से ख़त्म हुआ 
लो हमसे जीत गया आज ये ज़माना फिर 

कुछ और देर अभी उसका  इंतज़ार करो 
वो  आयेगा तो ये  मैयत मेरी उठाना फिर 

गुज़र के कौन गया हैं ये सामने से अभी 
दिखा गया है मुझे ख़्वाब  इक पुराना फिर 

तेरे  मिज़ाज की तब्दीलियाँ अरे तौबा 
वो दो घडी को हँसा कर तेरा रुलाना फिर 

कुछ और देर अभी उसका  इंतज़ार करो 
वो  आयेगा तो ये  मैयत मेरी उठाना फिर 

खुद में खोया हुआ सा लगता है

वो तो दुनिया से जुदा लगता है
खुद में खोया हुआ सा लगता है
चलने लगती है जब भी सर्द हवा
जिस्म तब टूटने सा लगता है
ख्वाइशें तो बहुत सी हैं लेकिन
वक़्त कुछ बेवफा सा लगता है
कितनी दुश्वारियाँ हैं राहों में
घर से निकले तो पता लगता है
ज़र्फ़ हैं उसका कितने पानी में
जब वो बोले तो पता लगता है,
ऐब बस ढूँढ़ते हो तुम मुझमें
और हर शख़्स भला लगता है

दिया जलता रहेगा ये सहर तक

तू आये या न आये मेरे घर तक
दिया जलता रहेगा ये सहर तक
कहाँ पर खो गयी है आते आते
ख़ुशी पहुंची नहीं क्यों मेरे घर तक
अभी कुछ ज़ब्त की ताकत है बाक़ी
अभी पानी नहीं पहुँचा है सर तक
मुलाकातों की फिर क्या बात करते
कोई मिलती नहीं उनकी खबर तक
किसी पर जीते जी जो मर न पाये
उन्हें आया न जीने का हुनर तक
शिकारी का निशाना बन गया क्या
नहीं पहुंचा परिंदा वो शजर तक
जो साहिल पर शिकस्ता हो गयी है
वो कश्ती कैसे पहुँचेगी भँवर तक
बहुत मुश्किल हैं राहें ज़िंदगी की
कई बिछड़े हैं साथी इस सफर तक
बुलंदी ये सिया किस काम की फिर
अगर पहुंचे नहीं उनकी नज़र तक

लग्ज़िशों से मुझे बचा लेगी

याद तेरी मुझे संभालेगी
लग्ज़िशों से मुझे बचा लेगी
तंज़ तो तेरे सह लिए लेकिन
उफ़ ये खामोशी मार डालेगी.
दुश्मनी भी अगर क़रीब आई
हम फ़क़ीरों से बस दुआ लेगी
आँधियों का गुबार छँटते ही
आरज़ू फिर दिया जला लेगी
मौत आएगी बंद पिंजरे में
वो मुझे क़ैद से छुड़ा लेगी
जो भी था पास से दिया तुझको
ज़िंदगी मुझसे और क्या लेगी
फिर क़ज़ा आएगी अचानक से
और मुझको गले लगा लेगी

nazm saraab

सराब
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जाने किसकी तलाश रहती है
कोई अंजाना अक्स क्यों आकर
मन के आंगन में रक़्स करता है
जैसे कोई उदास सी खुशबू
मेरे तन मन में फैल जाती है
लौट जाती हूँ अपने माज़ी में
जाने क्या है जो खो गया मुझ में
जाने क्या है जो भूल बैठी हूँ
याद करती हूँ ख़ूब मैं लेकिन
याद कुछ भी मुझे नहीं आता !!!

Saturday, 30 May 2015

कैसे जीतोगे अगर हार से डर लगता है

क्यूँ  तुम्हें लश्कर ए जर्रार  से डर लगता है 
कैसे जीतोगे अगर  हार से डर लगता है 

एक हल्की सी भी आहट से सहम जाती हूँ 
अब तो हर साया ए दीवार से डर लगता है 

आईने की भी निगाहों  में मुहब्बत  न रही 
 अब  हमें बा ख़ुदा  सिंगार  से  डर  लगता  है

तुम में और हम  में हमेशा से ये ही फर्क  रहा 
जीत से  हम को तुम्हें हार  से  डर लगता है 

सोचे-समझे बिना जो  कुछ भी उगल देते हैं 
उनकी बेबाक़ी ए गुफ़्तार से डर लगता है 

फूल तो ख़ार के दामन से लगे रहते हैं 
फूल ये कैसे कहे ख़ार से डर लगता है .

बात सच कहने को कह दूँ मैं बहरहाल मगर 
सर पे लटकी हुई तलवार से डर लगता है 

नाखुदा से कोई उम्मीद नहीं है बाक़ी 
अब हमें वाकई मंझधार से डर लगता है.

और कितना पढ़े हम  खून से लथपथ खबरें  
अब हमें सुब्ह के अखबार से डर लगता है

 वक़्त के पावं कहीं रौंद न डाले हमको 
ए सिया वक़्त की रफ़्तार से डर लगता है