Saturday, 2 July 2016

नाते पाक

नाते पाक
********
दिल मेरा नूरे अक़ीदत से मुनव्वर हो जाय।
नात जब जब मैं पढ़ूँ पाक मेरा दिल हो जाय।
रौशनी इल्म की भर जाय मिरे सीने में,
आप के दर से ये तौफ़ीक़ मयस्सर हो जाय।
आप चाहें तो पहाड़ों को भी कर दें ज़र्रे,
और अगर चाहें तो क़तरा भी समन्दर हो जाय।
रौज़ये पाक मैं देखूँ ये कहाँ मेरा नसीब,
नाम लूँ आपका और क़ल्ब मुनव्वर हो जाय।
मुझको आजाये अक़ीदत में झुकाना सर को
आपकी चश्मे करम मेरा मुक़द्दर हो जाय।
ख़ाक आ जाय मयस्सर जो मदीना की मुझे,
रेत का ज़र्रा मेरे वास्ते गौहर हो जाय।
गर्मिये वक़्त 'सिया' तुझको न छू पायेगी,
मेहरबाँ तुझपे अगर साक़ीये कौसर हो जाय।
"सिया सचदेव"
NAAT E PAAK
Dil mera noor e aqeedat se munnawar ho jaaye
naat jab jab main padhu pak mera dil ho jaaye
Roshni ilm ki bhar jaay meray seenay mein
Aap ke dar se ye taufeeq mayyasar ho jaaye
aap chahe to pahado ke bhi kar den zarre
aur agar chahen to qatra bhi samandar ho jaaye
Roza e paak ko dekhu ye kaha mera naseeb
Naam Loon aapka or Qalab munnawar ho jaye
mujhko aa jaaye aqeedat mein jhukana sar ko
Aap ki chashm e karam mera muqaddar ho jaaye
khaak ho jaay muyassar jo Madinay ki mujhay
Rait ka zrra meray waste gohar ho jaaye
garmiye waqt siya tujh ko na chhu paayegi
mehrbaan tujhpe agar saakiye kausar ho jaaye
siya sachdev

Monday, 20 June 2016

झाँक कर देखें मेरी आँखों की ये गहराइयाँ

झाँक कर देखें मेरी आँखों की ये गहराइयाँ
इन में आयेंगी नज़र बस आपकी परछाइयाँ
सिर्फ पीछे मुड़ के देखा है ज़रा सा उम्र ने
हसरतें लेने लगी हैं आज फिर अंगड़ाइयाँ
दिल का ये आलम अभी से क्या है ये मत पूछिये
क्या करेगी सुब्ह तक ये शाम की तन्हाईयाँ
तू गुलिस्तां तू बहाराँ तू ही हैं बादे सबा
फूल ख़ुश्बू रंग क्या हैं सब तेरी परछाइयाँ
इश्क़ में जाता है दिल होशो ख़िरद ताबो तवां
और मिलता भी है क्या ? तन्हाईयाँ रुसवाईयाँ
दर्द फिर से दे रहा है मेरे दिल पर दस्तकें
ऐसा लगता हैं की फिर चलने को है पुरवाइयाँ
jhank kar dekhe'n meri aankho ki ye Gehraiyan
in mein aayegi nazar bus aapki parchaiyan
Sirf peechhe mud ke dekha hai zara sa umr ne
hasraten lene lagi hain aaj phir Angdaiyan
dil ka ye aalam abhii se hai ki kuch mat puchiye
kya karegi subh tak ye Shaam Ki Tanhaiyan
tu gulistaN tu bahaarN tu hi hai baade saba
phool khushbu rang kya haiN/sab teri parchaiyaaN
ishq me jata hai dil hosh o khirad tab o tawaaN
aur milta bhi hai kya ? tanhaiyaN ruswaiyaN
Dard phir se de raha hai mere dil par dastaken
aisa lagta hai ki phir chalne ko 

ik punjabi ghazal


Terian yaadan ne dhaya qahar , das main kee Karaa'n?
faaye lag javaan ki khava zehr das main ki Karaan
Hun kisay v than te teray baajo dil lgda nahi
chadh gaya ankha,n da teri sehr das main ki Karaa'n
Par je honday pohnch jandi main udari mar ke
Tu vasaya door jake shahr das main ki karaa'n
ho gaya sunjha banera kaaN vi hun nayi bolde
rovan kulavan hun atthay pehr das main ki kraa'n
Vekh lai tu aake aape haal hoya ki mera
dil to uthdi dard di ik lahar das main ki karaa'n
تیریاں یاداں نے ڈھایا قہر، دسّ میں کی کراں
پھائے لگّ جاواں کے کھاواں زہر دسّ
میں کی کراں
ہن کسے وی تھاں تیرے باجھوں دل نئیں لگدا
چھڈّ گیا اکھاں دا تیری سحر دسّ میں کی کراں
پر جے ہندے پُہنچ جاندی میں اڈاری مار کے
توں وسایا دور جا کے شہر دسّ میں کی کراں
ہو گیا سنجا بنیرا کاں وی ہن نئیں بولدے
روواں، کُرلاواں ہن اٹھے پہر دس میں کی کراں
ویکھ لے توں آکے آپے حالَ ہویا کی میرا
دل تو اٹھدی درد دی اک لہر دس میں کی کراں
ਤੇਰੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਨੇ ਢਾਇਆ ਕਹਿਰ, ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾ ?
ਫਾਏ ਲੱਗ ਜਾਵਾਂ ਕੇ ਖਾਵਾਂ ਜ਼ਾਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਹੁਣ ਕਿਸੇ ਵੀ ਥਾਂ ਤੇਰੇ ਬਾਝੋਂ ਦਿਲ ਨਹੀ ਲਗਦਾ
ਛੱਡ ਗਿਆ ਅੱਖਾਂ ਦਾ ਤੇਰੀ ਸਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਪਰ ਜੇ ਹੁੰਦੇ ਪੋਹੰਚ ਜਾਂਦੀ ਮੈਂ ਉਡਾਰੀ ਮਾਰ ਕੇ
ਤੂੰ ਵਸਾਇਆ ਦੂਰ ਜਾ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਹੋ ਗਿਆ ਸੁੰਜਾ ਬਨੇਰਾ ਕਾਨ ਵੀ ਹੁਣ ਨਹੀ ਬੋਲਦੇ
ਰੋਵਾਂ ਕੁਰਲਾਵਾਂ ਹੁਣ ਅਠੇ ਪਹਿਰ ਦਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਵੇਖ ਲੈ ਤੂੰ ਆਕੇ ਆਪੇ ਹਾਲ ਹੋਇਆ ਕੀ ਮੇਰਾ
ਦਿਲ ਤੋ ਉਠਦੀ ਦਰਦ ਦੀ ਇਕ ਲਹਿਰ ਦਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਸੀਆ ਸੱਚਦੇਵ

Thursday, 26 May 2016

ज़ह्र को जो दवा समझता है

ज़ह्र को जो दवा समझता है
वो मरज़ को शिफ़ा समझता है
क्या उदासी है मेरे चेहरे पे
मेरा दुःख आइना समझता है
कितनी तनहा हूँ मैं हुजूम में भी
तू कहाँ जानता समझता है
हूक उठती है मेरे सीने से
और वो क़हक़हा समझता है
जिससे वाबस्ता हूँ मैं शिद्दत से
क्या वो हर्फ़ ए वफ़ा समझता है
अस्ल में शेर कहने वाला ही
दर्द तख़लीक़ का समझता है
कोई देखे तो अंदरून उसका
खुद को जो पारसा समझता है
जाने क्या क्या गुमान हैं उसको
जाने वो ख़ुद को क्या समझता है
नाव को किस जगह डुबोना हैं
ये मेरा नाख़ुदा समझता है
उसकी मन्ज़िल हूँ मैं मगर ज़ालिम
वो फ़क़त रास्ता समझता है
राय उसको सिया मैं देती हूँ
जो मेरा मश्वरा समझता है
siya

Friday, 13 May 2016

ghazal रूबरू जब आ गया हैआईना

रूबरू जब आ गया हैआईना
खुद से ही मिलवा गया है आईना
वहशते बेचैनियाँ हैरानियाँ
देख कर घबरा गया है आईना
एक लम्हा लिख गया चेहरे पे कुछ
मुददतों देखा गया है आईना
अस्ल सूरत भी नज़र आती नहीं
इस क़दर धुँधला गया है आईना
झूठ के चेहरे की रंगत उड़ गयी
असलियत दिखला गया है आईना
दिल के जज़्बों की ख़ुदाया ख़ैर हो
संग से टकरा गया है आईना
सबके चेहरों पर बनावट की अदा
आज धोखा खा गया है आईना
साफ़गोई की मिली है ये सज़ा
आये दिन तोड़ा गया है आईना
rubroo jab aa gaya hai aaina
khud se hi milva gaya hai aaina
wehshate;n bechaniyan hairaniyan
dekh kar ghabra gaya hai aaina
ek lamha likh gaya chehre pe kuch
muddton dekha gaya hai aaina
asl surat bhi nazar aati nahi
is qadar dhundhla gaya hai aaina
jhooth ke chehre ki rangat ud gayi
asliyat dikhla gaya hai aaina
dil ke jazbo ki khudaya khair ho
sang se takra gaya hai aaina
sabke chehro par banavat ki ada
aaj dhokha kha gaya hai aaina
saafgoyi ki mili hai ye saza
aaye din toda gaya hai aaina

Friday, 6 May 2016

श्रमिक दिवस पर लिखी एक नज़्म


तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बदहाली का जीवन जीने पर मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
झुलसा देने वाली भीषण गर्मी हो
हाड़ कंपाने वाली चाहे सर्दी हो
दर-दर की ठोकर खाने को हैं मजबूर .
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
भूख प्यास पीड़ा को वो क्या समझेंगे
मजबूरों के दुःख को वो क्या जानेंगे
बड़ी बड़ी बाते कर के जो हैं मशहूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बेबस और बेहाल यहाँ पर इतने हैं
जल संकट के कारण जाने कितने हैं
दूषित पानी पीने पर भी हैं मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
पड़ी आपदा फसलें सब बर्बाद हुई
उस बेबस से कहाँ कहाँ फ़रियाद हुई
आत्महत्या करने पर जो है मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
सिसक--सिसक कैसे जीवन जी पायें
कभी चैन के पल दो पल हम भी पायें
इसी आस में बैठे हैं जो थक कर चूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
siya

Saturday, 2 April 2016

जीवन है काँटों का बिछौना
कितना मुश्किल इस पर सोना
उसने जब जी चाहा खेला
दिल को मेरे जान खिलौना
जाओगे या साथ रहोगे !
कुछ तो अपना मूंह खोलो ना !
ज़ालिम प्यार का यहीं नतीजा
दुःख पाना है सुख है खोना
आँसू , आहें और तन्हाई
हिज्र की शब में और क्या होना
ख़ुद ही रस्ता कट जाएगा
तुम भी मेरे साथ चलो ना !
मुझसे एक सहेली बोली
दिल में ख़्वाहिश को मत बोना
सिया ढूँढती हो क्यों कांधा
अच्छा होगा तन्हा रोना
siya