Wednesday, 22 April 2015

दिल मेरा क्यूँ दर्द में डूबा होता है

शाम का मंज़र जब बोझिल सा होता है 
  दिल मेरा क्यूँ दर्द में डूबा होता है 
 
दुनिया दारी की इन झूठी रस्मो से 
अक्सर इंसानो को धोखा होता है

मर्ज़ी के आज़ाद जवाँ बच्चो सुन लो 
बूढी आँखों में भी सपना होता है 

जो  रिश्ते  एहसास से ख़ाली होते हैं 
उन रिश्तों को भी तो ढोना  होता है

दूर तीरगी  करता है जो बस्ती की 
उस  दीपक के तले  अँधेरा होता है 

नज़रे बद  से ख़ुदा बचाये बच्चों  को 
रोज़ यहाँ पर एक हादसा होता है

याद किया जाता हैं उनको सदियों तक 
जिनका नाम अदब में  लिक्खा होता है 

Tuesday, 21 April 2015

तेरी यादों का जब लश्कर गया है 
मेरे एहसास ज़ख़्मी कर गया है 

मेरी आँखों में छाई हैं उदासी 
कोई सपना अचानक  मर गया है 

नमी आँखों की जाती ही नहीं है
 तेरा ग़म दिल में ही घर कर गया है 

कोई सतही चुभन लगती नहीं ये  
ये कांटा रूह के अंदर गया है 

मुझे रास आयी न दुनिया फ़रेबी 
वफ़ाओं से मेरा दिल डर गया है 

कोई ताजा हवा का एक  झोंका 
मेरे एहसास को छूकर गया है 

गुनाहों पर पड़ा है  तेरे पर्दा
हर इक इल्ज़ाम मेरे सर गया है 



  

Sunday, 19 April 2015

बेमानी इस रिश्ते से मैंने तुमको आज़ाद किया

ये तो  रब ही जाने है किसने किसको बर्बाद किया 
बेमानी इस रिश्ते से मैंने तुमको  आज़ाद किया 

तिनका तिनका चुन कर मैंने ख़्वाब-नगर को जोड़ा था 
इक पल में तूने आखिर कैसे इसको  बर्बाद किया

मेरे गुलशन की वीरानी खून के आंसू रोती है 
गुलचीं । तूने माली बनकर खूब सितम ईजाद किया

 ख़ुद के साथ कभी इक पल को भी मैं न जी पायी थी 
मैं ने तो तेरे जीवन का हर लम्हा आबाद किया

मुझको जब मालूम थी तेरी फ़ितरत तेरी सच्चाई 
 फिर भी तेरी यादों ने क्यों हर लम्हा नाशाद किया 

भूखी नंगी खुशियों पे इतराना मेरा काम नहीं 
अपनी छोटी सी दुनिया को ग़म से  ही आबाद किया 

ऐसे में क्या कीजे कुछ मालूम नहीं पड़ता दिल को
जितना तुझको भूलना चाहा उतना दिल ने  याद किया 

क्या कमिया क्या ख़ामी है बस यहीं ढूढ़ते हो मुझ में 
नया-  तरीका रोज़ रुलाने का मुझको ईज़ाद किया 

मेरी फुरक़त मेरी तन्हाई पे तेरा क़ब्ज़ा हैं 
तेरे दर्द ओ ग़म की दौलत से ही  दिल को शाद किया 

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तेरा फरेब मुझे रौशनी में ले आया

अजब सा शोर मेरी ख़ामशी में ले आया 
वो खींच कर मुझे फिर ज़िंदगी में ले आया 

भले ही देर से लेकिन खुली तो हैं आँखे 
तेरा फरेब मुझे रौशनी में ले आया

भटक रही थी मैं एहसास के अँधेरों में 
तेरा ख्याल मगर चाँदनी  में ले आया 

भले ही देर से लेकिन खुली तो हैं आँखे 
तेरा फरेब मुझे रौशनी में ले आया

सबब न पूछ तू   मुझसे मेरी उदासी की 
ये दर्द कौन मेरी ज़िंदगी में ले आया 

 दिलो ओ दिमाग़ पे हावी था एतबार तेरा 
तेरा यक़ीन मुझे गुमरही में ले आया 

हमारे ज़ख्मों को आखिर जुबान मिल ही गयी 
हमारा दर्द हमें शायरी में ले आया 

तेरा ही सबपे करम है  तेरी ही रहमत है 
तेरा ही नूर हमें रौशनी में ले आया 

भटक रही थी मैं एहसास के अँधेरों में 
तेरा ख्याल मुझे बंदगी में ले आया 

ज़रा सी बात थी लेकिन समझ न पायी सिया 
वो बदगुमानियाँ क्यूँ  दोस्ती में ले आया

Tuesday, 14 April 2015

उसके लफ़्ज़ों का मेरे दिल से गुज़र पूछो मत


कैसे उजड़ा है मोहब्बत का नगर पूछो मत
उसके लफ़्ज़ों का मेरे दिल से गुज़र पूछो मत

कैसे अजदाद की  तहज़ीब हुई हैं तक़सीम 
कैसे काटा गया आँगन का शजर मत पूछो 

ख्वाब सब उनके  इशारों पे निछावर कर के 
मैंने क्यों काट दिए अपने ही पर पूछो मत

मुफलिसी मुझको दिलासे तो दिलाती है मगर 
कैसे कटते है मेरे शामो सहर पूछो मत

 देखना हैं तो ये ताऱीख  उठा कर देखो 
किसने छीना मेरे हाथों का हुनर पूछो मत


मुश्किलें मुझसे गले मिल के चली जाती हैं 
कितना उलझा रहा जीवन का सफर पूछो मत

पर्देदारी के हुनर से हैं बख़ूबी वाक़िफ़ 
हमको मालूम है सब हमसे मगर पूछो मत 

कैसे तन्हाई टपकती है मेरे कमरे में 
काटता रहता है हर वक़्त ये घर पूछो मत

दिल ए हस्सास में चुपके से चला आता है 
हाय इस दर्द का अंदाज़ ए हुनर पूछो मत

रेंगती ज़ीस्त की सच्चाई यही है आखिर 
जाने कब ख़त्म हो साँसो का सफ़र पूछो मत

पागलों जैसे जो आसार सिया है मेरे 
कौन से ग़म का हुआ दिल पे असर पूछो मत

उन्हीं के दर्द को हम ढो रहे हैं

हमारे साथ अक्सर जो रहे हैं 
उन्हीं के दर्द को हम ढो रहे हैं 

नयी ताबीर के होने के डर से 
पुराने ख्वाब ज़िंदा हो रहे हैं 

जब उन से फासले बढ़ने लगे तो 
हम अपने दायरों में खो रहे हैं

तसव्वुर तक नहीं अपनों का कोई 
दीवारों से लिपट कर रो रहे हैं 

 ज़रा दीवानों की हिम्मत तो देखो 
लुटा के दिल की दुनिया सो रहे हैं 

हमारा साथ यूँ छोड़ा ख़ुशी ने 
उदासी के पलों में  खो रहे हैं 

चुराते है वहीं नज़रें सिया से 
निगाहों में बराबर जो रहे हैं 
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ज़ख्म फ़िर भी मेरे उभरते हैं

क्या करें  जितना सब्र करते हैं 
ज़ख्म फ़िर भी मेरे  उभरते हैं 

मौत का कोई दिल में ख़ौफ़ नहीं 
हम तो इस ज़िंदगी से डरते हैं 

शोर करती हैं दिल की धड़कन भी 
जब ख्यालों से वो गुज़रते हैं  

हमने मोहतात कर लिया खुद को 
क्योकि रुसवाइयों से डरते हैं 

रोज़ जीते हैं थोड़ा थोड़ा हम रोज़ ही थोड़ा थोड़ा मरते है

खुद को आया हुनर न जीने का  
 और दुनिया पे तंज़ करते हैं 

ए ख़ुदा तू ही अब हिफाज़त कर 
 घर की देहलीज़ पार करते हैं