Tuesday, 18 November 2014

यहीं सोचती हूँ की क्या बात होगी

कभी आपसे जो मुलाक़ात होगी
यहीं सोचती हूँ की क्या बात होगी
भले दूर होंगे वोह मेरी नज़र से
मगर याद उनकी मिरे साथ होगी
मेरा दिल दुखाया तो ये जान लेना
इन आँखों से अश्कों की बरसात होगी
किसी की शिकायत करूँ भी तो कैसे
मेरे सामने खुद मेरी ज़ात होगी
जुबां बंद कर लीजिये होगा बेहतर
ज़ुबाँ मैं जो खोलूं बहुत बात होगी
इसी मशग़ले में गुज़रती है घड़ियाँ
अभी दिन ढलेगा अभी रात होगी
तेरे अश्क मैं अपने दामन में भर लूँ
मोहब्बत की ये भी तो सौग़ात होगी
सिया ये मुक़द्दर के हैं खेल सारे
किसे शह मिलेगी किसे मात होगी
kabhi aapse jo mulaqat hogi
yaheen sochti hoon ki kya baat hogi
Bhaley door hongey woh meri nazar se
Magar yaad unki mire saath hogi
mera dil dukhya to ye jaan lena
in aankhon se ashkon ki barsaat hogi.
Kisi ki shikayet karu'n bhi to kaise ?
Mere samne khud meri zaat hogi
zaba'N band kar lijiye hoga behter
zaba'n main jo kholu'n bahot baat hogi
Isi masghaley meiN guzarteeN haiN ghadiyaaN
Abhi din dhalega abhi raat hog
tere ashk main apne daaman mein bhar lu'n
mohbbat ki ye bhi to saughat hogi
siya ye Muqddar ke hai'n khel saare
kisey shah milegi kisey maat hogi

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-11-2014 को चर्चा मंच पर तमाचा है आदमियत के मुँह पर { चर्चा - 1803 } में दिया गया है
    आभार

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