Friday, 29 April 2011

ये जीवन तनहा- तनहा सा


ये जीवन तनहा- तनहा सा
अनजाना सा अनचाहा सा
इक आस लगाये रखता है
मनमीत मिले कोई मन सा
क्यों ख्वाब सजाए रहता है
जो दिल में हैं वो हो सच सा ..ये जीवन
इस जीवन में क्या हासिल है 
ग़म, दर्द लगा बस चाहत सा
एक ग़ज़ल का बंद लिफाफा
मुझको लगता था ख़ुद सा ... ये जीवन 


उम्मीद जगाये रहता हैं 
जीवन हो जाये बेहतर सा
सबकुछ मिल जाये आखिर में
बस कुछ न लगे कमतर सा.. ये जीवन 


सबको हासिल हो बस खुशियां 
कोई ना गमख्वार रहे 
ऐसा तो तब ही होगा जब 
पल पल  होगा  जन्नत सा ...ये जीवन 

सिया 

क्या हुआ माँ जो मैं बेटी हूँ .

क्या हुआ माँ जो मैं बेटी हूँ ......

क्यों दिल ये तुमने हार दिया
क्यों अज़नमा मुझको मार दिया
इतना भी क्यों ना सोचा माँ
तू भी तो इक औरत हैं
क्यों ना दिखाई दुनिया मुझको
क्यों कोख को अपनी उजाड़ दिया
इक बेटी हे माँ का दुःख हरती
क्यों बेटी ही फिर कोख में मरती
इक लड़की ही हैं वंश बढ़ाती
फिर भी लोगो को लाज ना आती
बेटी माँ बाप का दर्द समझती
बेटे से वो बढ़ के वो निकलती
माँ क्यों ना ये तुने ध्यान किया
क्यों अजन्मा मुझको मार दिया

सिया

दुनिया का दस्तूर


ना कुरेदो मेरे जख्मो को ये नासूर हुआ
तुझको माना था मसीहा ये  कसूर हुआ

वक्त मरहम है हर इक दर्द का सुना मैंने
हिज्र का गहरा ज़ख्म सहने पे मजबूर हुआ

क्या कमी थी मेरी उल्फत में बताना तो था
क्यों निगाहों से गिराया .दिल से यू दूर हुआ

आइना _दिल में सजा रक्खी थी तस्वीर तेरी
क्या हुआ क्यूं ये  मेरा ख़्वाब ऐसे ही चूर  हुआ

तेरी बातो से क़यामत से गुज़रती दिल पर
क्यों 'सिया' दे दुहाई ये दुनिया का दस्तूर हुआ

Wednesday, 27 April 2011

अधूरी चाहत





कुछ ऐसी अधूरी चाहत जो हो ना सकी पूरी
क्यों ऐसी तमन्ना करता दिल जो हो सके पूरी

क्यों ऐसी उड़ान भरे ये मन जिसकी तय ना कर पाए दूरी
लाख मनाये इस दिल को ये इक ना माने मेरी

मन  की पीड़ा मन में छुपाये .जग में नकली सा मुस्काए
क्या तलाश क्यों भटके हैं मन राह मिले ना मेरी

कोई सिया को राह दिखाए कोई मेरी मंजिल बतलाये
क्या तलाश ?क्यों भटके हैं मन राह मिले ना मेरी 

तेरा हसीन साथ

तेरा हसीन साथ जब जब मिला मुझे
सच सच मैं बोलती हूँ अच्छा लगा मुझे .

दीवानापन ये मेरा आख़िर को देखिये
क्यूं है मुहब्बतें कुछ ये भी सोचिये
महबूब से मेरे क्यूं हो गिला मुझे

टूटे कभी जुड़े कभी खुद ही में खो गए
देखो तुम्हारे प्यार में पागल से हो गए
अच्छा ये वफाओ का सिला मिला मुझे

तेरी तलाश थी मेरी जिंदगी सनम
तेरी मोहब्बते हैं मेरी बंदगी सनम
तुझे पाके हमने जाना की खुदा मिला मुझे

खामोश लब

लबों को सी के जो खामोश बने बैठे हैं
हम भी दीवाने हैं मदहोश बने बैठे हैं.

जिसको हम पर भरोसा अब नहीं कायम 
उस एक शख्स हम आगोश बने बैठे हैं

प्यार क्या खाक करेंगे उन्हें तो होश नहीं
नज़र से पीते हैं मयनोश बने बैठे हैं

जानते हैं मुझे जलाते हैं तंज़ करते है
बात करना हो तो बेहोश बने बैठे हैं

जिनसे दिल नहीं मिलता "सिया" का 
वो जुनूं में भी है पुरजोश बने बैठे हैं.

सिया 

Tuesday, 26 April 2011

हमदम ना हमनवा

ना तो हमदम ना हमनवा की तरह
वो मिला मुझको आसमान की तरह

हमने महबूब उसको माना मगर
पेश वो आया दो जहाँ की तरह

अब मोहब्बत गुनाह सी होगी
बात निकली हैं दास्ताँ की तरह

ग़म जिसे आप लोग कहते है
साथ होते है कारवां की तरह

जिसके लफ्जों से फूल खिलते हैं
वो सिया क्यूं हैं बेजुबान की तरह

सिया

Friday, 22 April 2011

यूँ न ताने दीजिये !!!!!!

आपके पहलू में आने दीजिये 
कुछ हमें दिल की सुनाने दीजिये 

हैं कई ग़म अब हमारे चारसू
उनको थोड़ा सा भुलाने दीजिये 

आप तो दिलबर हमारे हैं मगर 
अब जगह अपने सिरहाने दीजिये 

दिल की शम्मा जल रही है आज फिर 
हाँ वो शम्मा अब बुझाने दीजिये 

हम  "सिया" हैं दिल की बातें कह गए 
आप ना बेकार ताने दीजिये 
सिया 

तबाह -दिल

दिल भी क्यूं कर तबाह कर डाले
तुमने कितने गुनाह कर डाले

दिल की बस्ती न हो कभी वीरां
दर्द दिल में तो चाह का डाले

उसकी रहमत में हमको कर शामिल
जो सितारों को माह कर डाले

रोशनी उसको रास ना आई
उसने कमरे सियाह कर डाले

हम "सिया" क्या बताएं अब तुमको
हमने रस्ते भी गाह कर डाले
सिया

Thursday, 21 April 2011

गुज़रे ज़माने


याद हमको आज वो गुज़रे ज़माने आ गए 
जो हमें ठुकरा चुके थे हक़ जताने आ गए

अब हमें जब रास जीना उनके बिन आने लगा
ज़िन्दगी में फिर से वो हलचल मचाने आ गए

छोड़कर तन्हा जो हमको चल दिए थे राह पर
आज लौटे हैं थके से फिर सताने आ गए
आपको लगता यही था जी नहीं पायेंगे हम
देखिये हम जी रहे हैं... क्यूं रुलाने आ गए

अब "सिया' के साथ हैं उसकी ग़ज़ल ओ शायरी
हमको भी आख़िर यूँ जीने के बहाने आ गए
सिया

रफ्ता रफ्ता


देखिये दिल किस क़दर अब बेख़बर होने लगा
आपके ख़्वाबों में रातों का सफ़र होने लगा

क्या है ये दुनिया क्या दुनियादारियां किसको पता
अब हमारा उन ख़तों में बस गुज़र होने लगा

क्या ख़ुशी कैसी मसर्रत इस जहां में दोस्तों
रफ्ता रफ्ता दर्द ही जब हमसफ़र होने लगा

ज़िन्दगी से हम ख़ुशी की भीक क्यूं मांगे भला
जब ये रिश्ता प्यार का ही मुख़्तसर होने लगा

उफ़ ये दुनिया प्यार के माने कभी समझी नहीं
तंज़ आख़िर अब सिया के अश्क पर होने लगा

दर्दो -हिज्र के लम्हे


किसी बे _दिल से लगाकर दिल बहोत पछता गए है हम
कहीं मंजिल कहीं रास्ता कहाँ पर आ गए है हम

तुम्हे बस ये ही आता हैं ज़ख्म देना मज़ा लेना
तुम्हारे इश्क में खुद को बहुत उलझा गए है हम

ये दर्दो -हिज्र के लम्हे किसी को क्या बताएं अब
हैं  नाज़ुक  फूल  लेकिन  अब  बड़े  मुरझा  गए  हैं  हम 

जिसे लिखा था चाहत में मगर लिखा अधूरा था
वही नगमा मुहब्बत में ज़रा सा गा गए हैं हम

हकीकत मैं ना मिल पाओ , तो शिकवा अब नहीं होगा
"सिया रातों को ख़्वाबों में बहोत कुछ पा गए हैं हम

सिया

अधूरे रिश्ते


कच्चे बखिये से उधड़ जाते झूटे  रिश्ते 
दिल को तकलीफ़ ही देते हैं  टूटे रिश्ते 

दर्द  का एक खजाना मिला हैं क़र्ज़  मुझे 
किश्त के जैसे चुकाना है अधूरे  रिश्ते  

मुझको अपनों ने किया हवाले किसके 
देखिये आज मुझसे ही हैं रूठे  रिश्ते 

आईना एक अगर हो तो मैं चेहरा देखूं 
छन से टूटा जो ये शीशा तो फूटे रिश्ते 
 
मैं "सिया" हूँ, मुझे अपनी न बताओ बातें 
मुझको दरकार नहीं थे कभी मैले रिश्ते 

Tuesday, 19 April 2011

मंज़र शनासी

दिन तडपता रात प्यासी ले गया
वो मेरी सारी उदासी ले गया

दे गया कुछ ख़्वाब आँखों में मेरी
नींद लेकिन अच्छी खासी ले गया

दिल जिसे कहते हैं हम तुम प्यार में
चीज़ है आख़िर ज़रा सी ले गया

अब गुजरना वक़्त का आसां नहीं
वो मेरी मंज़र शनासी ले गया

कर गया एक खेल चाहत का "सिया"
दिल से लेकिन वो दुआ सी ले गया










सिया

आ सवारू मैं तुझे


तुझे निहारूं हर पल मैं बस एक तुझसे  ही प्यार करूं 
आजा तुझको ऐसे  मैं सवारूँ तेरा सोलह सिंगार करू 

बालो को गज़रे से  सजा दू, माथे पे चाँद का  टीका सजा दू
सूरज से दमके तेरी बिंदिया ,लब को लाल गुलाब करू 

कानो में झुमके भी डोलें , लब खुले पर कुछ ना बोलें
 मांग में तेरी सितारे भर दूँ,नयन  तेरे  कजरारे करू 

सुर्ख जोड़े में लिपटी ऐसे कमल खिला हो कोई जैसे     
नाक में झूले नथ ये बोले मैं ये दरिया पार करू 

हाथ हिना से लाल बताये की साजन की तू प्यारी  
छन छन कर कंगना कहता कब से तेरा इंतज़ार करू

पायल की छम छम बोले ये..अब  साजन के  द्वार चलू
जीने के अब इस दुनिया में अपने मैं आसार करूँ 

 लम्हा लम्हा  ना सरक जाये  तुझे ऐसे मैं गिरफ्तार करू 
सिया पा के तुझे चाहू मैं यहीं हर पल  मैं तेरा दीदार करू 


सिया 

इश्क से जिंदगी हसीन हैं


इश्क कहने को दो अल्फाज़ है 
ये ही जीने का सबसे हसीन राज़ हैं  

इसको शिद्दत से चाहो  तो बंदगी है
ना दिल में हो तो क्या जिंदगी है  

इसमें  उतरो तो गहरा सागर है 
 डूब जाओ  इसमें  तो जिंदगी है 

यू तो कहना इसे आसान लगे 
 निभा पाओ तो बहुत मुश्किल है 

इश्क से जिंदगी में रौशनी है 
ना मिले  तो तनहा सी जिंदगी है 

ईश्क में ही सच्ची ख़ुशी है 
इश्क से जिंदगी हसीन हैं 

कडवी _मीठी यादे


वक़्त गुज़रा है कुछ कडवी _मीठी  बाते  देकर
कभी खुशियों के पल कभी ग़म की सौगाते देकर

जिंदगी भी ये कैसे से नए रंग दिखाती है यहाँ
कहीं मातम जनाज़े का, कहीं पे जशन बरातें देकर

हाय जीना यहाँ मुश्किल नहीं दुश्वार भी हैं
जीत हासिल भी हुई है तो दर्द की मातें देकर

हमने सीखा है ज़िन्दगी को भी कई सालों में
इक मदरसे में रहे कैद हम जमातें देकर

जब सिया कोई ज़माने में ना रहा अपना
दिल को बहलाया हमने सब्र की   राते  देकर 

हर इरादा जानते हैं आपका

हर इरादा जानते हैं आपका
हम हुनर पहचानते हैं आपका

आप तो लोगों की ख़ातिर हैं मगर
हम भी एहसां मानते हैं आपका

आंसुओं की नमी पाई है बस
जब भी चेहरा छानते हैं आपका

आप हासिल अब हमें कर जाओगे
हम जुनूं भी जानते हैं आपका

हम "सिया" रहते कहाँ हैं फिर भला
हाथ जब जब थामते हैं आपका

सिया

थोड़ी सी राहत

ग़ज़ल 
दिल दीवाना या कि ज़ीनत चाहिए 
आपको कैसी मुहब्बत चाहिए 

नींद  है तो ख़्वाब भी होंगे मगर 
ख़्वाब में थोड़ी हक़ीक़त चाहिए 

ऐ ख़ुदा मुझको बता दे आज तू 
इश्क़ में क्यूं कर इबादत चाहिए 

क्यूं भला शरमिंदा करते हो हमें 
आपको हमसे नसीहत चाहिए 

आपके दिल में हसीं एहसास और 
आपके कदमों में जन्नत चाहिए 

अब "सिया" दुनिया से शिकवा तो नही 
बस हमें थोड़ी सी राहत चाहिए 

Sunday, 17 April 2011

ग़ज़ल


क्या बताऊँ दोस्तों क्या मांगती हूँ 
मैं ख़ुशी का एक लम्हा मांगती हूँ 

वक़्त की इस धूप से बेज़ार होकर 
थक गई हूँ कोई साया मांगती हूँ 

हर तरफ मतलब का इक बाज़ार है
जो सवारे मुझे वो मसीहा मांगती हूँ

कुछ नहीं तुझसे खुदाया सुन ज़रा 
प्यार आख़िर एक सच्चा मांगती हूँ 

लोग कहते है मुझे पागल "सिया'
ज़िन्दगी से जाने क्या क्या मांगती हूँ 




सिया

Friday, 15 April 2011

मन की उलझन

तू क्या चाहे कैसी उलझन
क्या हैं तेरे मन में आया सा
पहचान ज़रा की क्या हैं तू
क्यों वक़्त करे यूँ जाया सा
मैं चाहू एक ऐसा साथी
जो हो मेरा हमसाया सा
जो मेरे दिल को समझ सके
हो धुप में संग मेरे साया सा
मेरे सुख में हो जाये सुखी
मेरे ग़म से घबराया सा
हो साथ सिया जो वो ऐसा लगे
बिन मांगे ही सब पाया सा

सितारों झिलमिला जाओ


अँधेरी रात तारों तुम ज़रा सा झिलमिला जाओ 
मैं तन्हा हूँ मेरे पेहलू में तुम  ही मुस्कुरा जाओ 

तुम्हारी बेरुखी पे हम अगर रोये तो क़िस्मत है
तुम्हे हक़ है कभी आओ मेरा ये दिल जला जाओ 

ये आंसू है मेरे बारिश नहीं है आस्मां की ये 
अगर हो प्यार मुझसे तो कभी आकर मना जाओ 

मेरा हर गीत तुम्हारे अक्स का आईना है शायद 
मेरा नगमा भी है तन्हा तुम्ही आकर सुना जाओ

तुम्हारी  एक चुप्पी भी मुझे नागन सी डसती है 
अरे बोलो, ज़रा बोलो कोई तो गुल खिला जाओ 

दुआ में हो असर तो संग भी आखिर चटकते हैं 
"सिया" की इस दुआ में तुम असर बनकर ही आ जाओ 

Saturday, 9 April 2011

ग़ज़ल ....अब नहीं आसां..!!!!

तुमको इस दिल से भुला पाना अब नहीं आसां
ज़ख्म दिल के ये दिखा पाना अब नहीं आसां

हम तो अपनों के दिए ग़म ही संभाले बैठे

इनको लफ़्ज़ों में बता पाना अब नहीं आसां

जो नहीं मिलता हम उसकी जुस्तजू में रहे

इस दिले जार को समझाना अब नहीं आसां

हमने आँखों के इशारे से जताया है मगर

जुबां से बात ये बतलाना अब नहीं आसां

चराग-ए-  आरज़ू रोशन है चारसू मेरे

ऐ सिया उसको बुझा पाना अब नहीं आसां

सिया

Wednesday, 6 April 2011

प्यार के रंग

आ मेरी ज़िन्दगी में प्यार के कुछ रंग भर दे 
मैं अधूरी हूँ मुझे आ तू मुक़म्मल कर दे 

 होश उड़ जाये तेरे, इतना मैं चाहूँ तुझको
अपनी चाहत से मुझे यार तू पागल कर दे 

मैंने मेहंदी से हथेली पर तेरा नाम लिखा
तू मेरे सर पे अपने नाम का आँचल कर दे 

मेरे माथे पे सजे बिंदिया पिया तेरे लिए
मेरी आँखों में अपने प्यार का काजल भर दे 

उम्र भर यूँ ही तेरा साथ निभाएगी "सिया"
अपनी पलकों में बसा दुनिया से ओझल कर दे 

सिया





Tuesday, 5 April 2011

उफ़ ! ये ज़िन्दगी

हरेक शख्स के चेहरे पे थकन सी क्यूं है.
इस शहर की गलियों में घुटन सी क्यूं है.

हर तरफ छाई है कैसी अजब ये मायूसी
दिल में शोले हैं आँखों में अगन सी क्यूं है.

हर तरफ भागते लोगो का हुजूम है देखो
ये दुनिया ख़ुद ही में देखो तो मगन सी क्यूं है

नींद में ख़्वाब का आना बड़ा हसीं हैं मगर
जागती आँखों में इस तरह जलन सी क्यूं है.

नहीं बदलते ये हालात चाहे कुछ भी करें
मगर उमीद की दिल में ये किरण सी क्यूं है

"सिया" ने टूट के चाहा है ज़िन्दगी में जिसे
उसी के दिल में मगर एक  चुभन सी  क्यूं है


सिया 

 

Sunday, 3 April 2011

तन्हा दिल


अपनों की हर बात ही आख़िर दिल को दुखाने आई है

और फिर उस पर तन्हाई भी दिल दहलाने आई है !!

रुसवा तो हम यार बहुत हैं, क्या बतलाएं दुनिया को
एक कहानी फिर से आख़िर कुछ दोहराने आई है !!

आप न आए वादा करके हम को थी तकलीफ़ यही
मौसम की सरगोशी शायद कुछ बतलाने आई है !!

दिल की हर दीवार में सीलन, आँखों में सैलाब सा है
इस रुत की ये बारिश रब्बा क्या समझाने आई है !!

आज हरेक महफ़िल में आख़िर उसकी बातें होती हैं
एक "सिया"रिश्तों को देखो ख़ुद सुलझाने आई है !!

सिया

Saturday, 2 April 2011

इक इल्तिजा

इस प्यार को ज़मीं पे उतारा न कीजिये
हमको यूँ सरे- राह पुकारा न कीजिये 

जीना हुज़ूर आपसे सिखा करेंगे हम 
लेकिन ये शर्त हमसे किनारा न कीजिये 

अब आप कह रहे हो मुहब्बत नहीं हमें 
ज़िन्दा किसी को यार यूँ मारा न कीजिये 

दिल में है कोई और तो ऐसा फ़रेब क्यूं
इक इल्तिजा है हमको संवारा न कीजिये 

लिक्खा हुआ "सिया' का पढता नहीं कोई 
ज़र्रा हूँ इक ज़मीं का सितारा न कीजिये 

Friday, 1 April 2011

बेमानी राहे


कुछ जिंदगी से  ऐसे घबरा  गए   हैं हम 
रिश्ते वो साथ में हैं घुटता है जिनसे  दम

जिस राह पर कदम धरे अनजान सी  लगी 
मंजिल थी कोई और कहाँ आ गए हैं हम 

पतझर में जैसे शाख पर पत्ता हरा ना हो 
मौसम बहार का हैं  मुरझा  गए  है हम 

एहसास होगा भूले से तुमको भी एक दिन 
जब दूर तुमसे दूर चले जायेगे जो हम

उसको  कहाँ है  फुर्सत कि दिल वो ले सिया 
लब सी लिए हैं हमने खामोश हैं  सनम

सिया