Sunday, 17 April 2011

ग़ज़ल


क्या बताऊँ दोस्तों क्या मांगती हूँ 
मैं ख़ुशी का एक लम्हा मांगती हूँ 

वक़्त की इस धूप से बेज़ार होकर 
थक गई हूँ कोई साया मांगती हूँ 

हर तरफ मतलब का इक बाज़ार है
जो सवारे मुझे वो मसीहा मांगती हूँ

कुछ नहीं तुझसे खुदाया सुन ज़रा 
प्यार आख़िर एक सच्चा मांगती हूँ 

लोग कहते है मुझे पागल "सिया'
ज़िन्दगी से जाने क्या क्या मांगती हूँ 




सिया

3 comments:

  1. bahut khub kha hai siya ji nice one

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  2. TUJH SE TUJHKO MAAG RAHA HAI KOI..... AUR TU KAHATI HAI PAGAL SIYA KE MAIN MAANGTI HUN KHUDA SE....TU TO DENE WALON MAIN HAI MANGNEWALON MAIN HARGIZ NAHIN....

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  3. tarif karna suraj ko diya dikhane ke barabar hai isliye mere pas lafz nahi hai

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