Friday, 1 April 2011

बेमानी राहे


कुछ जिंदगी से  ऐसे घबरा  गए   हैं हम 
रिश्ते वो साथ में हैं घुटता है जिनसे  दम

जिस राह पर कदम धरे अनजान सी  लगी 
मंजिल थी कोई और कहाँ आ गए हैं हम 

पतझर में जैसे शाख पर पत्ता हरा ना हो 
मौसम बहार का हैं  मुरझा  गए  है हम 

एहसास होगा भूले से तुमको भी एक दिन 
जब दूर तुमसे दूर चले जायेगे जो हम

उसको  कहाँ है  फुर्सत कि दिल वो ले सिया 
लब सी लिए हैं हमने खामोश हैं  सनम

सिया 

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