Saturday, 2 April 2011

इक इल्तिजा

इस प्यार को ज़मीं पे उतारा न कीजिये
हमको यूँ सरे- राह पुकारा न कीजिये 

जीना हुज़ूर आपसे सिखा करेंगे हम 
लेकिन ये शर्त हमसे किनारा न कीजिये 

अब आप कह रहे हो मुहब्बत नहीं हमें 
ज़िन्दा किसी को यार यूँ मारा न कीजिये 

दिल में है कोई और तो ऐसा फ़रेब क्यूं
इक इल्तिजा है हमको संवारा न कीजिये 

लिक्खा हुआ "सिया' का पढता नहीं कोई 
ज़र्रा हूँ इक ज़मीं का सितारा न कीजिये 

2 comments:

  1. siya ka likhha har shabd padta hai koi..hai kon ye koi ye siya jan hi nahi payeee kabhi !

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  2. hi Siya ! sab kuch achha laga hai yahan ek se badkar ek. Ishwar, bhagwan, Allah, wahe guru, God and godess aapko bundiyon se nawajen.

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