Friday, 29 April 2011

दुनिया का दस्तूर


ना कुरेदो मेरे जख्मो को ये नासूर हुआ
तुझको माना था मसीहा ये  कसूर हुआ

वक्त मरहम है हर इक दर्द का सुना मैंने
हिज्र का गहरा ज़ख्म सहने पे मजबूर हुआ

क्या कमी थी मेरी उल्फत में बताना तो था
क्यों निगाहों से गिराया .दिल से यू दूर हुआ

आइना _दिल में सजा रक्खी थी तस्वीर तेरी
क्या हुआ क्यूं ये  मेरा ख़्वाब ऐसे ही चूर  हुआ

तेरी बातो से क़यामत से गुज़रती दिल पर
क्यों 'सिया' दे दुहाई ये दुनिया का दस्तूर हुआ

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