Saturday, 9 April 2011

ग़ज़ल ....अब नहीं आसां..!!!!

तुमको इस दिल से भुला पाना अब नहीं आसां
ज़ख्म दिल के ये दिखा पाना अब नहीं आसां

हम तो अपनों के दिए ग़म ही संभाले बैठे

इनको लफ़्ज़ों में बता पाना अब नहीं आसां

जो नहीं मिलता हम उसकी जुस्तजू में रहे

इस दिले जार को समझाना अब नहीं आसां

हमने आँखों के इशारे से जताया है मगर

जुबां से बात ये बतलाना अब नहीं आसां

चराग-ए-  आरज़ू रोशन है चारसू मेरे

ऐ सिया उसको बुझा पाना अब नहीं आसां

सिया

1 comment:

  1. har chease hai asan koi gar asan samjhe, kahne ki nahin jaroorat koi gar nainon ki bhasha samjhe

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