Saturday, 14 December 2013

तिरी मासूम फ़ितरत को हुआ क्या



अदावत में शराफ़त को हुआ क्या
तिरी मासूम फ़ितरत को हुआ क्या

हवस रखते थे माल-ओ-ज़र की कितनी
गए दुनिया से दौलत का हुआ क्या

मुसलसल तोहमतें मुझ पर लगाना
यक़ीं करने कि आदत को हुआ क्या

जिधर देखो उधर रुस्वाइयाँ है
मोहब्बत तेरी अज़मत को हुआ क्या

मैं अपने आप से हूँ क्यूँ पशेमाँ
न जाने मेरी ग़ैरत को हुआ क्या

वफ़ा को आज़माता है मिरी क्यों
तेरी बेलौस चाहत को हुआ क्या

यक़ीं क़तरे को है दरियादिली पर
समंदर तेरी ग़ैरत को हुआ क्या

गुमां तुमको बुलंदी पे बहुत था
ज़वाल आया तो अज़मत को हुआ क्या

अनैतिक काम को जायज़ कहे है
अरे तौबा अदालत को हुआ क्या

जिधर देखो उधर ख़ूंरेज़ मंज़र
मिरे ख़ालिक़ की रहमत को हुआ क्या

ज़रा सी बात पर नेज़ा बकफ़ थे
मियाँ अब उस शुजाअत को हुआ क्या { शुजाअत यानि बहादुरी }

जिसे बेचा है तुमने मुददतों तक
तुम्हारी उस इबादत को हुआ क्या। {आसाराम जैसे ढोंगी लोगो के लिए }

हवस कि गोद में तू भी पड़ा है
तिरी सब्र ओ क़नाअत को हुआ क्या

बहुत मग़रूर थे अपनी अना पर
सो अब अंदर की क़ुव्वत को हुआ क्या

मैं तन्हाई में अक्सर सोचती हूँ
शराफ़त को मुरव्वत को हुआ क्या

ये कैसी बेबसी,कैसी उदासी
सिया इस दिल की हालत को हुआ क्या

Tuesday, 10 December 2013

ज़ब्त को अपने आज़माने की

हमको आदत है चोट खाने की 
ज़ब्त को अपने आज़माने की 

तुम कहो तो कहो अदा इसको 
है तो तरकीब दिल जलाने की 

आज के दौर में उम्मीद ए वफ़ा 
बात करते हो किस ज़माने की

मेरी खुशियाँ तुम्हे खटकती हैं
बात करते हो दिल दुखाने की

अब किसी पर यकीं नहीं होता
देख धोखा घडी ज़माने की

सारी दुनिया में तुमने ज़ाहिर की
बात थी वो ज़रा छुपाने की

गर बुरा कुछ नहीं किया तुमने
क्या ज़रूरत हैं मुँह छुपाने की

वो तो मुझ पर ही आज़माएंगे
सूरतें सारी दिल दुखाने की

दो घडी तो सिया कि सुन लेते
इतनी जल्दी भी क्या थी जाने की

humko aadat hai chot khane ki
zabt ko apne aazmane ki

tum kaho to kaho ada isko
hai to tarkeeb dil jalaane ki

aaj ke dau mein umeed e wafa
baat karte ho kis zamane ki

meri khushiyaaN tumheN khatakti hain
baat karte ho dil dukhane ki

ab kisi par yakeen nahiN hota
dekh dhokha ghadi zamane ki

saari duniya mein tumne zahir ki
baat thi wo zara chupaane ki

gar bura kuch nahiN kiya tumne
kya zarurat hai munh chupaane ki

wo to mujh par hi aazmayegeN
surteN sari dil dukhane ki

do ghadi to siya ki sun lete
itni jaldi bhi kya thi jaane ki...

Saturday, 7 December 2013

मगर तुमने मुझे परखा नहीं था

मेरे क़िरदार पर धब्बा नहीं था 
मगर तुमने मुझे परखा नहीं था 

मेरी आँखों में भी इक रतजगा था
मगर वोह भी तो कल सोया नहीं था

गवां दी अपनी हस्ती जिसकी ख़ातिर
मेरी दुनिया का वो हिस्सा नहीं था

भटकना ही रहा किस्मत में मेरी
कोई मंज़िल कोई रस्ता नहीं था

खुली आँखों से जो देखा था मैंने
हक़ीक़त थी कोई सपना नहीं था

मेरी मुश्किल में काम आया था जो कल
वो कोई ग़ैर था अपना नहीं था

ये चेहरे कि उदासी कह रही थी
वो टूटा था मगर बिखरा नहीं था

लगी थी चोट उसके दिल पे फिर भी
वो मेरे सामने रोया नहीं था

वो मेरा ग़म समझता भी तो कैसे
सिया मुझसा तो वो तन्हा नहीं था

mere qirdaar par dhabba nahi'N tha
magar tumne mujhe parkha nahi'N tha

meri ankhon mein bhi ik ratjaga tha
magar woh bhi to kal soya nahi'N tha

ganwa di apni hasti jis ki khatir
meri duniya ka woh hissa nahi'N tha

bhatakna hi raha kismat mein meri
koi manzil koi rasta nahi'N tha

khuli ankhon se jo dekha tha maine
haqeeqat thi koi sapna nahiN tha

meri mushkil main kaam aaya tha jo kal
wo koi ghair tha apna nahi'N tha

woh mera gham samajhta bhi to kaise
wo mujhsa to kabhi tanha nahi'N th

ye chehre ki udaasi keh rahi thi
wo toota tha magar bikhra nahi'N tha

lagi thi chot uske dil pe phir bhi
wo mere samne roya nahi.N tha

woh mera gham samajhta bhi to kaise
siya mujhsa to wo tanha nahi,N tha

Friday, 6 December 2013

मेरी उड़ान को कोई अम्बर नहीं मिला

मैं जिसको ढूढ़ती थी वो अवसर नहीं मिला
मेरी उड़ान को कोई अम्बर नहीं मिला

अनुचित थे जिसके काम गलत आचरण भी थे
उसको समाज में कभी आदर नहीं मिला

मासूम बच्चियां भी सुरक्षित नहीं यहाँ
इंसान और दरिंदे में अंतर नहीं मिला .

खिलने से थोड़ा पहले ही मुरझा गए थे फूल 
वो जिनको साँस लेने का अवसर नहीं मिला

पैसा नहीं था इतना पिता दे सके दहेज़
बेटी गरीब की थी तभी वर नहीं मिला -

साँसो का क़र्ज़ था सो यहीं पर दिया उतार
हम थे किराएदार हमें घर नहीं मिला

अट्टालिकाएं कितनी बनायीं हैं रात दिन
लेकिन ज़मीन के सिवा बिस्तर नहीं मिला

siya

Sunday, 1 December 2013

मुझपे रब की बड़ी इनायत है

ये जो दुनिया में मेरी शोहरत है 
  मुझपे रब की बड़ी  इनायत है 

आज बेचैन भी नहीं ये दिल 
बाद मुद्दत के थोड़ी राहत है 

मैं ये सुनती रहीं बुजुर्गों से 
इश्क़ करना तो इक इबादत है

अपनी आँखों को खोल कर देखो 
ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है 

पढ़ सको तो कभी पढ़ो इसको 
मेरे चेहरे पे जो इबारत है

ज़िंदगी के सफ़र में ए हमदम 
हर क़दम पर तेरी ज़रूरत है 

भूल जाओ कहा सुना मेरा 
दिल में थोड़ी सी ग़र मुरव्वत है

आप ने ज़ुल्म की हिमायत की 
आपकी ज़ेहनियत पे हैरत है 

आईना बनके ज़िंदगी करना 
मेरे माँ बाप कि नसीहत है

आपके इस निज़ाम ए हस्ती में 
मौत सबसे बड़ी हकीक़त है

शेर गोई नहीं कोई आसाँ 
इल्म की भी ज़रा ज़रूरत है 

अब मै इल्ज़ाम दूँ तो किसको दूँ 
आज कल हर जगह सियासत है

आईना बनके ज़िंदगी करना 
मेरे माँ बाप कि नसीहत है

हौसला देख कर सिया मेरा 
हर मुसीबत के दिल में हैरत है


Saturday, 23 November 2013

hindi ghazal .....रब तू मेरे पास बहुत है

रब तू मेरे पास बहुत है तुझपे ही विश्वास बहुत है सर्वत का हो भला जगत में बस इतनी अरदास बहुत है
मन में प्रेम भले ही न हो कहने को वो खास बहुत है
खुशियाँ भूल गयी दर मेरा 
इस दुःख का आभास बहुत है
दुष्कर्मी सड़को पर घूमें मन में ये संत्रास बहुत है
अब आज़ाद हुई है नारी ? झूठ है ये बकवास बहुत है
भूख, गरीबी, मज़बूरी हैं इस घर में उपवास बहुत है

सरस्वती वंदना

जय वीणा पुस्तक धारिणी उपकार कर 
दे ध्यान भक्ति ज्ञानपुँज अपार कर  

जय विद्या ज्ञान प्रदायनी माँ शारदे 
ये ज्ञान चक्षु खोल दे उद्धार कर 

मन नेह और विश्वास के दीपक जले 
जगतारिणी अब तूही बेडा पार कर

हम सत्य सयंम त्याग का जीवन चुने 
हो प्रेम सबके मन में, नेक विचार कर 

हम  स्वाभिमानी बन के साहस से जिए 
हे सरस्वती  सुखमय मेरा  संसार कर 

इस कंठ से गीतों की यूँ सरिता बहे  
वीणा से अपनी ऐसी तू झंकार कर 



Monday, 18 November 2013

मेरे नसीब का सूरज निकाल दे या रब

जो मुश्किलात हैं उनको ज़वाल दे या रब 
मेरे नसीब का सूरज निकाल दे या रब 

मेरे क़लम से मसावात के चराग़ जलें  ...(..masawaat ..yani samanta )
तू मेरे ज़ेहन को ऐसे ख़याल दे या रब 

भॅवर के बीच  फँसी है हयात की कश्ती 
करम से अपने इसे भी  निकाल दे या रब 

फरेब ओ मकर के जाले उतार दे सब लोग 
मेरे बयान में ऐसा कमाल दे या रब 

मेरी पसीने की रोटी सुकूँ की ज़ामिन  है 
मुझे तू जो भी दे,रिज़क ए हलाल  दे या रब 

हवा ए दहर से मुझको बचाये जो हर वक़्त 
करम की अपनी मुझे ऐसी शाल दे या रब 

jo mushkilaat haiN unko zawaal de ya rab 
mere naseeb ka suraj nikaal de ya rab 

mire qalam se masawaat ke charaagh jaleN
tu mere zehan ko aise khyaal de ya rab 

bhaNvar ke beech fansi hai hayaat ki kashti 
karam se apne ise bhi  nikaal de ya rab 

fareb o makar ke jaale utaar de sab log 
mere bayaan mein aisa kamaal de ya rab

meri paseene ki roti sukooN ki zaamin hai
mujhe tu jo bhi de rizq-e-halaal de ya rab......

hava e dahar se mujhko bachaye jo har waqt 
karam ki apni mujhe aisi  shaal de ya rab

Sunday, 17 November 2013

मिली शोहरत तो क्या बहका हुआ है

तेरा लहजा जो यूँ  बदला हुआ है 
तेरे सर में तक्कबुर आ गया है 

क़दम पड़ते नहीं हैं अब ज़मीं पर
मिली शोहरत तो क्या बहका हुआ है 

रक्खा क्यूँ हाथ दुखती रग पे मेरी 
पुराना ज़ख्म फिर ताज़ा हुआ   है 

मैं अब बुनती नहीं हूँ कोई सपना 
हकीकत से ही मेरा वास्ता है 

ए मेरी कजरवी कुछ तो बता दे। 
मेरी मंज़िल का गर तुझको पता है 

उजालों के परस्तारो  ये सोचो 
अंधेरों का भी लंबा सिलसिला है

हमारे ज़ब्त की मत बात पूछो 
तुम्हारा  हर सितम  हंस कर सहा है 

सभी के धुँधले से लगते है चेहरे 
अंधेरें चारसू फैला हुआ है 

ये दानवता का जो पसरा है साया 
हर इक इंसान क्या सोया हुआ है 

तुम अपनी आँख खोलो तब दिखेगा 
ख़ुदा चारों तरह बिखरा हुआ है 

 न इसकी क्यूँ ख़बर ली बाग़बाँ ने 
खिले बिन फूल ये मुरझा गया है 

नया है  दौर अब  माँ बाप की भी 
कहाँ अब कोई बच्चा मानता है
 
जला दंगो में है घर बार जिसका 
वो सर्दी में ठिठुरता कांपता  है 


tera lahja jo yun badla hua hai 
 ke tujh mein ab takkabbur aa gya hai 

qadam padte nahiN haiN ab  zameen par 
mili shohrat to kya behka hua hai 

rakkha kyun haath dukhti rag pe meri
purana zakhm phir taza  hua hai

main ab bunti nahi hooN koi sapna 
haqeeqat se hi mera wasta hai 

  aye meri kajrawi kuch to bata de 
meri manzil ka gar tujhko pata hai 
 
ujaloN  ke paristaro ye socho 
andheron ka bhi lamba silsila hai 

hamare zabt ki na baat pucho
tumahara har sitam hans kar saha hai 

sabhi ke dhundhleN se lagte hai chehre 
andhera charsu faila hua hai 


ye danvata ka jo pasra hai jo saya 
har ik insan  kya soya hua hai 

Tum apni  aankh  kholo to dikhega
khuda charoN taraf bikhra hua hai 

na iski kyun khabar li baghbaan ne 
 khlie bin phool ye murjha gaya hai


naya hai daur ab ma baap ki bhi 
kahaN koi bhi bachcha manta hai
 
jala dange mein hai ghar baar jiska 
wo sardi mein thithurta kanmpta hai



त्यों लगदा हैं जगत बेगाना





ज्यों ज्यों अपने अंतर जाना 
त्यों लगदा हैं जगत बेगाना 

वेख फकीरां ने कि मंगना 
खुश ओ पा के  फटा पुराना 

धी पुतरा तो एहीं  मंगदा 
मान ज़रा जा वड्डा सयाना 

प्यार जो मिलदा सी वडया तो 
हुन ओ कित्थे रया ज़माना

इक  आक्खे ते दूजा मनलें 
क्यों झगड़े ते  गल्ल वधाना 

मिट्टी दा ए तन है बन्दया 
मिट्टी दे विच ही मिल जाना 

कद तक कोई साथ निभान्दा 
इक दिन सबना ही टुर  जाना 


 jyo'N jyo'N apne antar jana 
tyo'N lagda hai jagat begana 

vekh faqeeraN ne ki mangna 
khush o pa ke fata puarana 

dhee puttra to aiheeN mangda 
maan zara ja vadda sayaana 

pyaar jo mida si vadya to 
hun o kitthe raya zamana 

ik aankheN te duja man laye 
kyo jhagde te gall  vadhana 

mitti da aye tan ve bandyaN 
mitti de hi vich mil jaana 

kad tak koi sath nibhanda
ik din sabna hi tur jana 





लगता हैं ख़त्म हो गए दिन इंतज़ार के

मुझको बुला रहे हैं सितारे पुकार के 
लगता हैं ख़त्म हो गए दिन इंतज़ार के 

आईना बन गयीं तिरी आँखे मेरे लिए 
मुद्दत के बाद देखा है खुद को सवाँर के 

रिश्तों के ख़ारज़ार में तन्हा खड़ी हूँ मैं 
अब ज़िंदगी से रूठ गए दिन बहार के 

ताज़ीम में झुकाया था सर जिनके सामने 
वो ले गए हैं आज मेरा सर उतार के

पूरी नहीं हुई हैं अभी ज़िम्मेदारियाँ
कुछ दिन ख़ुदा से माँग के देखूँ उधार के

दुश्मन से जीत आयी थी हर जंग मैं सिया
अपने ही घर में बैठी हूँ अपनों से हार के


مجھ کو بلا رہے ہیں ستارے پکار کے
لگتا ہے ختم ہو گئے دن انتظار کے

آئینہ بن گئیں تری آنکھیں میرے لئے
مدت کے بعد دیکھا ہے خود کو سوار کے

رشتوں کے خارذار میں تنہا کھڑی ہوں میں
اب زندگی سے روٹھ گئے دن بہار کے

تعظیم میں جھکایا تھا سر جن کے سامنے
وہ لے گئے ہیں آج میرا سر اتار کے

پوری نہیں ہوئی ہیں ابھی ذمہ داریاں
کچھ دن خدا سے مانگ کے دیکھوں قرضے کے

دشمن سے جیت آئی تھی ہر جنگ میں سیا
اپنے ہی گھر میں بیٹھی ہوں اپنوں سے ہار کے

mujhko bula rahe haiN sitaare pukaar ke 
lagta hai khtam ho gaye din intzaar ke 

aaina ban gayeN tiri aankhe mere liye 
muddat ke baad dekha hai khud ko nihaar ke 

rishtoN ke kharazaar mein tanha khadi hui 
ab zindgi se rooth gaye din bahaar ke 
tazeem mein jhukaya tha sar jinke saamne 
wo le gaye haiN aaj mera sar utaar ke 

puri nahiN hui haiN abhi zimmedariyaaN
kuch din khuda se maang ke dekhu udhaar ke 

dushman se jeet aayi thi har jung main siya 
apne hi ghar mein baithi hoon apno se haar ke 

मिले दो घड़ी उनसे कुछ बात की



निकल आई सूरत मुलाक़ात की 
मिले दो घड़ी उनसे कुछ बात की 

मुसव्विर से तस्वीर कैसे बने 
थकन उसकी आँखों में है रात की 

अगर यूहीं मुँह फेर लोगो तो फिर 
नदी सूख जायेगी जज़्बात की 

हमेशा ही करते हो मनमानियां 
कभी मेरे दिल की कोई बात की

ख़ुदा का दिया सब हैं मेरे तईं
ज़रूरत नहीं मुझको ख़ैरात की

मिलन का मैं वादा वफ़ा क्या करू
झड़ी लग गई आज बरसात की

छलक आयी आँखे भी उनकी सिया
कहानी सुना दी जो हालात की......

nikal aayi surat mulaqaat ki
mile do ghadhi unse kuch baat ki 

musv'vir se tasweer kaise bane 
thakan uski aankho mein hai raat ki 

agar yuheeN mooh fer logo to phir 
nadi sukh jaayegi jazbaat ki 

hamesha hi karte ho manmaniyaaN 
kabhi mere dil ki koi baat ki 

khuda ka dia sab to hai mere taeeN 
zarurat nahi mujhko khairaat ki 

milan ka main wada wafa kya karuN 
jhadi lag gayi aaj barsaat ki 

chhlak aai aankhe bhi unki siya 
kahaani suna di jo halaat ki 

Tuesday, 12 November 2013

nazm ...main aisa kar nahiN sakti

किसी का मैं बुरा सोंचू
किसी का दिल दुखाने की 
किसी को वरगलाने कि 
किसी को झूठ सच बोलूँ 
किसी के दिल से मैं खेलूँ 
मैं ऐसा कर नहीं सकती 

किसी के दर्द को दिल से 
बहुत महसूस करती हूँ 
कोई मुझसे ख़फ़ा हो तो 
मुझे तक़लीफ़ होती है 
जो अपना रूठ जाता है
मेरा दिल टूट जाता है 

कभी ऐसा भी होता है 
न जाने बेसबब ही क्यों 
उदासी घेर लेती है
मैं बैठे सोचती हूँ ये 
सिया ये क्या हुआ मुझको 
मैं क्यों ख़ामोश बैठी हूँ 
चलो कुछ शेर ही कह लूं 
ख्यालों में ज़रा बह लूँ 
तो मैं वो बात लिखती हूँ 
जो मैं महसूस करती हूँ 

kisi ka mai bura sochu kisi ka dil dukhane ki kisi ko wargalane ki
kisi ko jhooth sach bolu kisi ke dil se main khelu bada khud ko dikha kar main kisi ko main kahu chhota main aisa kar nahi sakti
kisi ke dard ko dil se bahut mehsus karti hooN koi mujhse khafa ho to mujhe takleef hoti hai jo apna ruth jaata hai Mera dil toot jata hai
kabhi aisa bhi hota hai na janae besasab hi kyo udaasi gher leti haiN main baithe sochti hooN ye siya ye kya hua mujhko main kyo khamosh baithi huN chaloon kuch sher hi kah looN khayaloN mein zara bah looN to main wo baat likhti hooN jo main mehesus karti hooN

Tuesday, 29 October 2013

मुद्दत से अपने आप को भूली हुई हूँ मैं

रिश्तों कि कायनात में सिमटी हुई हूँ मैं 
मुद्दत से अपने आप को भूली हुई हूँ मैं 

गो ख़ुशनसीब हूँ मेरे अपनों का साथ हैं 
तन्हाइयों से फिर भी क्यों लिपटी हुई हूँ मैं 

दम घोंटती रही  हूँ तमन्ना का हर समय 
इन हसरतों की क़ब्र सजाती रही हूँ मैं 

आती है याद आपकी मुझको कभी कभी 
ऐसा नहीं कि आपको भूली हुई हूँ मैं 

उस चाराग़र को ज़ख्म दिखाऊ या चुप रहूँ 
इस कश्मकश में आज भी उलझी हुई हूँ मैं 

हूँ फिक्रमंद आज के हालात देख कर
बेटी कि माँ हूँ इस लिए सहमी हुई हूँ मैं 

 जज़्बात कैसे नज़्म करू अपने शेर में 
कब से इसी ख्य़ाल में डूबी हुई हूँ मैं 

बेकार ज़िंदगी में ये कैसी ख़लिश सिया
सब कुछ मिला है फिर भी कमी ढूढ़ती हूँ मैं 


rishtoN ki kaynaat mein simti hui hooN main 
muddat se apne aap ko bhuli hui hooN main 

go Khushnaseeb HooN mere apne ka sath hai 
tanhaiyoN se fir bhi kyuN lipti hui hooN main 

dam ghont'ti rahi hooN tamnna ka har samay 
in hasratoN ki qabr sajaati rahi hooN main 

aati hai yaad aapki mujhko kabhi kabhi 
aisa nahiN ki aapko bhuli hui hoon main 

us charagar ko zakhm dikhauN ki chup rahuN 
is kashmaksh mein aaj tak uljhi hui hooN main 

hooN fikrmand aaj ke haalaat dekh kar 
beti ki ma hooN is liye Sehmi Hui hooN main 

 Jazbaat kaise nazm karu apne sher mein 
kab se isi khyaal mein dubi hui hooN main
bekaar zindagi mein ye kaisi khalish 'siya' sab kuch mila haiN,phir bhi kami dhudhti hoon main

Sunday, 27 October 2013

मैं हूँ इन्सां मुझे इन्सान नज़र आता है

मुझको हिन्दू न मुसलमान नज़र आता है 
मैं हूँ इन्सां मुझे इन्सान नज़र आता है 

किस क़दर पावँ पसारे हैं हवस ने हरसू 
आज हर शख्स परेशान नज़र आता है 

एक चेहरा भी दिखाई नहीं देता उसको 
आज तो आईना हैरान नज़र आता है 

आज इंसान तो ढूंढे नहीं मिलता मुझको 
जिस तरफ देखिये हैवान नज़र आता है

आपने सच की हिमायत में उठाया है कलम
हाँ मुझे आपका नुकसान नज़र आता है

रूह ए इन्सां भी दिखाई नहीं देती मुझको
शह्र का शह्र बियांबान नज़र आता है

पूछती है ये सिया मेरे सुखन में तुमको
वाकई क्या कोई इमकान नज़र आता है

mujhko hindu n musalmaan nazar aata hai
main hoon insaaN mujhe insaan nazar aata hai

kis qadar pavN pasaare haiN havas ne harsoo
aaj har shakhs pareshan nazar aata hai

ek chehra bhi dikhayi nahiN deta usko
aaj to aaina hairaaN nazar aata hai

aaj insaan to dhundhe nahiN milta mujhko
aaj har aadmi haivaan nazar aata hai

aapne sach ki himayat mein uthaya hai kalam
haan mujhe aapka nuksaan nazar aata hai

rooh e insaaN bhi dikhayi nahiN deti mujhko
shahr shahr biyabaan nazar aata hai

puchti hai ye siya mere sukhan mein tumko
waqyi kya koi imkaan nazar aata hai

siya

पुराना ज़ख्म फिर होगा हरा क्या

ये तुमने आज मुझसे कह दिया क्या 
पुराना ज़ख्म फिर होगा हरा क्या 

तुम अपने अज्म को मोहक़म करो ख़ुद 
किसी से माँगती हो हौसला क्या 

हमेशा ख़ुद को देखा आईने में 
तुम्हें दुनिया के ग़म से वास्ता क्या 

घने सायें हैं तेरे सर के ऊपर 
तपिश इस धूप की तुमको पता क्या

अभी तक थीं अँधेरे में सिया तुम
समझ अब आई दुनिया हैं बला क्या

ye tumne aaj mujhse kah dia kya
puarana zakhm fir hoga hara kya

tum apne azm ko mohqam karo khud
puarana zakhm fir hoga hara kya

hamesha khud ko dekho aaine mein
tumhe auron ke gham se wasta kya

ghane saayeN haiN tere sar ke upar
tapish is dhoop ki tumko pata kya

abhi tak theeN andhere mein 'siya' tum
samajh ab aayi duniya haiN bala kya ....

Saturday, 5 October 2013

जला है ज्ञान का दीपक उन्ही के जीवन में

जो बरसों डूबे रहें हैं पठन में, चिंतन में 
जला है ज्ञान का दीपक उन्ही के जीवन में 

परम्पराओं की इन बेड़ियों के बोझ तले
कटी है उम्र मेरी हर घड़ी ही उलझन में

यहाँ ग़रीबों को मिलती नहीं है क्यूँ रोटी
ये-वेदना ये व्यथा बस गई मेरे मन में

इसी उमीद पे गुजरी है ज़िंदगी अपनी
कभी तो आप नज़र आयें मेरे दरपन में

बस एक फ़ूल की क़िस्मत की आरजू की थी
तमाम काँटे सिमट आये मेरे दामन में

इस एक सच को समझने में लग गयी सदियाँ
बसे है राम सिया की हर एक धड़कन में

Wednesday, 2 October 2013

अब कोई सिलसिला नहीं बाक़ी

ज़िंदगी की दुआ नहीं बाक़ी 
अब कोई सिलसिला नहीं बाक़ी 

जिंदगी तुझ पे राय क्या दू मैं 
अब कोई तब्सरा नहीं बाक़ी 

वक़्त-बेवक़्त क्यूँ बरसते हैं 
बादलों में हया नहीं बाक़ी 

रंज, उलझन, घुटन, परेशानी 
रोग़ कोई  रहा नहीं बाक़ी 

मेरे दिल में तो बस तुम्ही तुम हो 
अब कोई दूसरा नहीं बाक़ी 

अपनी मंज़िल को छू लिया मैंने 
कोई मक़सद रहा नहीं बाक़ी 

मेरे दुश्मन के क़ल्ब में फ़िलवक़्त 
जंग का हौसला नहीं बाक़ी 

जीत रक्खा है मैंने अपने को 
मुझ में कोई अना नहीं बाक़ी 

अश्क़ आँखों में आ गये हैं सिया 
ज़ब्त दिल पर ज़रा  नहीं बाक़ी 

zindgi ki dua nahiN baaqi 
ab koi silsila nahiN baaqi 

zindgi tujh pe rai kya du main 
ab koi tabsra nahiN baaqi 

waqt bewaqt kyun barasate haiN 
Badlo mein haya nahiN baaqi 

ranj,uljhan,ghutan,pareshani 
rog koi raha nahiN baaqi

mere dil mein to bus tumhi tum ho 
ab koi dusra nahiN baaqi

apni manzil ko chhu liya maine 
koi maqsad raha nahiN baaqi

mere dushman ke qalb mein philwaqt
jung ka housla nahiN baaqi

jeet rakkha hai maine apne ko 
mujh mein koi ana nahiN baaqi....

ashq aankhoN mein aa gaye haiN siya 
zabt dil par zara  nahiN baaqi....

Sunday, 29 September 2013

सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत चाहिए

कब हमें उनकी इनायत चाहिए
सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत चाहिए

थोड़ा लहज़े में नज़ाकत चाहिए 
और आँखों में शराफ़त चाहिए

ख्व़ाबगाहों से निकल आयें जनाब 
ज़िंदगी में कुछ हकीक़त चाहिए

रब से ज़ायद मांगती कुछ भी नहीं 
मुझको बस हस्बे ज़रूरत चाहिए

ज़िंदगी आसान होती जायेगी
रहमत ए आलम की रहमत चाहिए

आप ने सबको नसीहत की जनाब
आपको भी कुछ नसीहत चाहिए

इन बुजुर्गों से सदा हमको सिया
रहनुमाई और शफ़क़त चाहिए

इस ज़बां पर भी ज़रा काबू रहे
दिल में भी थोड़ी मुरव्वत चाहिए

शेर गोई है नहीं आसाँ सिया
इल्म की भी थोड़ी दौलत चाहिए

ऐ सिया क़दमों को मां के चूम लो
तुम को गर दुनिया में जन्नत चाहिए

Tuesday, 24 September 2013

यूं तो जीना मुहाल लगता है

हर तरफ एक जाल लगता है 
यूं तो जीना मुहाल लगता है 

चाँद उदास तनहा सा 
मेरे जैसा निढाल लगता है 

इस बरस सब नजूम उलटे हैं 
साढ़े साती ये साल लगता है

कैसे उसने रिझा लिया सबको 
वो यशोदा का लाल लगता है

तुझसे मिलना है जिंदगी का सबब
तेरा मिलना मुहाल लगता है

बेहिसी का गुबार छँटने लगा
दिल में फ़िर कुछ उबाल लगता है

शौक़ अब बोझ बन गया सर का
ये तो जी का वबाल लगता है

एक एक शेर इस ग़ज़ल का सिया
तेरे दिल का ही हाल लगता है

Har taraf ek jaal lagta hai,
yooN to jeena muhaal lagta hai

chand tu bhi uadaas tanha hai
mere jaisa nidhal lagta hai

Is baras sab nujoom ulte haiN,
Saadhe saati yeh saal lagta hai

Kaise usne rijha liya sabko,
Woh Yashoda ka lal lagta hai.

Tujh se milna, hai Zindagi ka sabab,
Tera milna muhal lagta hai

Behisi ka ghubar chhatne laga,
Dil mein phir kuchh ubaal lagta hai.

Shauq ab bojh ban gaya sar ka
Yeh to ji ka wabaal lagta hai.

ek ek sher is ghazal ka siya
tere dil ka hi haal lagta hai