Saturday, 14 December 2013

तिरी मासूम फ़ितरत को हुआ क्या



अदावत में शराफ़त को हुआ क्या
तिरी मासूम फ़ितरत को हुआ क्या

हवस रखते थे माल-ओ-ज़र की कितनी
गए दुनिया से दौलत का हुआ क्या

मुसलसल तोहमतें मुझ पर लगाना
यक़ीं करने कि आदत को हुआ क्या

जिधर देखो उधर रुस्वाइयाँ है
मोहब्बत तेरी अज़मत को हुआ क्या

मैं अपने आप से हूँ क्यूँ पशेमाँ
न जाने मेरी ग़ैरत को हुआ क्या

वफ़ा को आज़माता है मिरी क्यों
तेरी बेलौस चाहत को हुआ क्या

यक़ीं क़तरे को है दरियादिली पर
समंदर तेरी ग़ैरत को हुआ क्या

गुमां तुमको बुलंदी पे बहुत था
ज़वाल आया तो अज़मत को हुआ क्या

अनैतिक काम को जायज़ कहे है
अरे तौबा अदालत को हुआ क्या

जिधर देखो उधर ख़ूंरेज़ मंज़र
मिरे ख़ालिक़ की रहमत को हुआ क्या

ज़रा सी बात पर नेज़ा बकफ़ थे
मियाँ अब उस शुजाअत को हुआ क्या { शुजाअत यानि बहादुरी }

जिसे बेचा है तुमने मुददतों तक
तुम्हारी उस इबादत को हुआ क्या। {आसाराम जैसे ढोंगी लोगो के लिए }

हवस कि गोद में तू भी पड़ा है
तिरी सब्र ओ क़नाअत को हुआ क्या

बहुत मग़रूर थे अपनी अना पर
सो अब अंदर की क़ुव्वत को हुआ क्या

मैं तन्हाई में अक्सर सोचती हूँ
शराफ़त को मुरव्वत को हुआ क्या

ये कैसी बेबसी,कैसी उदासी
सिया इस दिल की हालत को हुआ क्या

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