Monday, 30 June 2014

नज़्म ....बेज़ारी


सूना सूना जहान लगता है 
वक़्त भी बदगुमान लगता है 
कोई लगता न जाना पहचाना 
सारा माहौल मुझ से बेगाना 
अपना साया भी हो जुदा  जैसे 
रूठा रूठा सा हो ख़ुदा जैसे 
जैसे दम घोटती हो तन्हाई 
हो गयी क्या वो बज़्म आराई 
ज्यों बिखर जाये दिल के सब पारे 
ज़ख्म खुल जायें एकदम सारे 
दिल पे अब इख़तियार है भी कहाँ 
खुद पे अब ऐतबार हैं भी कहाँ 
जैसे दामन किसी का छूट गया 
सब्र का बांध जैसे टूट गया 


Soona soona jahaan lagta hai.
Waqt bhi badgumaan lagta hai.
Koi lagta  na jana pahchana 
Saara mahaul mujh se begaana.
Apna saaya bhi ho juda jaise.
Rootha rootha sa ho khuda jaise.
Jaise dam ghont'ti ho tanhaai.
Ho gai kya wo  bazm aaraai.
Jyo'n bikhar jaaye'n  dil ke sab paare.
Zakhm khul  jaaye 'n ekdam saare.
Dil pe ab ikhtiyaar hai bhi kahaa'n.
Khud pe ab aitabaar hai bhi kahaa'n.
Jaise daaman kisi ka chhoot gaya.
Sabr ka baandh jaise  toot gaya 

नज़्म वोह औरत ...........................................................

घर की इज़्ज़त का भरम रखती रही वोह औरत 
ज़िंदगी जीती रही अपनी संभाले हुरमत 
अपने बच्चों के लिए जीती रही थी अब तक 
ज़हर हालात का ख़ुद पीती रही थी अब तक 
उम्र भर ज़ुल्म ओ सितम हँसते हुए सहती रही 
अपने ही आप से, गुज़री जो, उसे कहती रही 
सिर्फ इक छत ही मिली प्यार का साया न मिला 
मुतमईन ज़ीस्त का गुंचा न कभी दिल का खिला 
बाल बच्चे भी जवाँ हो के हुए बेगाने 
माँ पे क्या बीत गयी इस से रहे अंजाने 

लेकिन ये तौक़ ए ग़ुलामी उसे अब तोडना है 
वक़्त के धारे को अपनी ही तरफ मोड़ना है 
अब जियेगी वो यहाँ ज़ात की ख़ातिर अपनी 
एक दिन ख़ुद से मुलाक़ात की ख़ातिर अपनी 
अपनी पहचान पे पैकर पे ये दिल वारेगी 
हारती आयी है अब और नहीं हारेगी 

Ghar ki izzat ka bharam rakhti rahi woh aurat.
Zindagi jeeti rahi apni sanbhaale hurmat.
Apne bachcho'n ke liye jeeti rahi thi ab tak.
Zahr halaat ka khud peeti rahi thi ab tak.
Umr bhar zulm-o-sitam hanste hue sahti rahi.
Apne hi aap se , guzri jo , use kahti rahi.
Sirf ek chhat hi mili pyaar ka saaya na mila.
Mutmain zeest ka ghuncha na kabhi dil me'n khila.
Baal bachche bhi jawa'n ho ke hue begaane.
Maa'n pe kya beet gayi is se rahe anjaane.

Lekin ye tauq-e-ghulaami use ab todna hai.
Waqt ke dhaare ko apni hi taraf modna hai.
Ab jiyegi wo yahaa'n zaat ki khaatir apni.
Ek din khud se mulaqaat ki khaatir apni.
Apni pahchaan pe paikar pe ye dil waaregi.
Haarti aayi hai ab aur nahi'n haaregi.

Saturday, 28 June 2014

hindi ghazal ......फिर भी त्रुटियों की बड़ी आलोचना है

यूँ तो  हर व्यक्ति ही त्रुटियों से बना है 
फिर भी  त्रुटियों की बड़ी आलोचना है 

कर्म की विश्राम तो अवहेलना है 
चैन की इक साँस लेना भी मना है 

दीप  आशा का कभी बुझने न देना 
सुन',घने तम से उजाला ही छना है 

है नयी कृति में समाहित कोई सपना 
हर नए चिंतन के पीछे कल्पना है 

क्या करेगा शत्रु यदि ईश्वर न चाहे 
बज रहा है जो बहुत थोथा चना है 

ढालना है उसको अब कविता में अपनी  
शब्द जो मैंने विचारों से चुना है 

स्वार्थ से आराधना है दूर मेरी 
मन में निश्छल प्रेम की ही भावना है 

 अग्रसर हो उन्नति के पथ पे बच्चें 
इस नयी पीढ़ी से ही संभावना है 

इस नदी में डूब कर मोती मिलेंगे 
योग है कविता "सिया" का मानना है 

Friday, 27 June 2014

क्यूँ मेरी ज़िंदगानी से नहीं जाती परेशानी

मैं जितना सोचती हूँ बढ़ती जायें उतनी हैरानी 
 नहीं जाती है मेरी ज़िंदगी से क्यों परेशानी 

ये आते जाते हँसते मुस्कुराते लोग क्या जाने 
अजब से रंग की फैली है मेरे दिल में वीरानी 

कहानी अपने बचपन की मैं छोङ आई बहुत पीछे 
वो शहज़ादे वो परियाँ गुड्डे गुड़िया और शैतानी 

ख़लिश इस दिल की मुझको उम्र भर यूहीं सताएगी 
किया तुझपे यक़ीन मैंने यहीं थी मेरी नादानी

खज़ाना ग़म की दौलत का मिला तेरी बदौलत ही
इनायत शुक्रिया तेरा करम तेरे मेहरबानी

बरसती है जो आँखों से घटा बरसात के जैसी
ये आँसू है हमारे तुम समझते हो जिसे पानी

मैं दुनियाँ भर के रस्ते भूल सकती हूँ सिया लेकिन
मगर उसकी गली तो आज भी है जानी पहचानी

main jitna sochti hoon badhti jaaye utni hairaani
 nahi.n jati hai  meri zindgi  se kyun  preshani

ye aate jaate hanste muskurate log kya jaanein
ajab se rang ki phaili hai mere dil me wiraani .

kahani apne bachpan ki main chodh aayi bahot peeche
wo shahzade wo pariyaan ,gudde gudiyan aur shaitani

khalish is dil ki mujhko umr bhar yuheen satayegi
kiya tujhpe yaqeen maine yaheen thi meri naadani

khazana gham ki daulat ka mila teri badulat hi
inayat ..shukria tera... karam tere meharbani

barasati hai jo aankho se ghata barsaat ke jaisi
ye aansu hai hamare tum samjhte ho jise paani

main duniya bhar ke raste bhool sakti hoon siya lekin
magar uski gali to aaj bhi hai jaani pahechaani

Wednesday, 25 June 2014

नज़्म' बेमानी रिश्ते



जैसे माहौल में इन्सां का गुज़र होता है 
उसके किरदार में वैसा ही असर होता है 
जिनको काबू नहीं होता है ज़बाँ पर अपनी  
पार करते हैं हदें , वहमो गुमान पर अपनी 
सिर्फ लफ्ज़ो पे वफ़ा का जो भरम रखते हैं 
अमली दुनिया में वो कब अपने क़दम रखते हैं ?

हक़ के इज़हार पे हर वक़्त जो इंकार करें 
हर किसी बात पे जो तंज़ भरे वार करें
एक इक सांस का लेना भी जो आज़ार करें
ज़िंदा रहने की तमन्ना भी जो दुश्वार करें
घर का सुख क्या है रवादारी किसे कहते हैं
जानते जो नहीं खुद्दारी किसे कहते हैं
बेहिसी ऐसी के खुद का भी नहीं करते यक़ीं
आसमानो की ललक से ही खिसकती है ज़मी

siya

Monday, 23 June 2014

आपका ग़म भी सौगात है'

थोड़ी ख़ुद्दार सी ज़ात है 
बस यहीं मेरी औकात है 

क्या कहूँ ?आपकी बात है 
आपका ग़म भी सौगात है'

तुम मिले हो तो ऐसा लगा 
ज़िंदगी से मुलाक़ात है 

आँखों आँखों में है गुफ़्तगू 
ये अभी तो शरुवात है

ख़ूबियाँ मुझ में आये नज़र
तेरी नज़रों की ख़ैरात है

अब्र की ज़द में चाँद आ गया
आँसुवों से भरी रात है

ज़र्रे ज़र्रे में पिन्हा है तू
जगमगाती तेरी ज़ात है

thodi khuddar si zaat hai
bas yahee,n meri auqaat hai

kya kahon ? aap ki baat hai ..
aap ka gham bhi soughaat hai .

tum mile ho to aisa laga
zindagi se mulaqaat hai

aankhoN aankhoN me hai guftagu
yeh abhi to shurvaat hai

khoobiya'n mujh mein aaye nazar?
teri nazro'n ki khairaat hai

abr ki zad me chaand aa gaya
.aansuwo se bhari raat hai

zarre zarre me pinhaa .n hai too
jagmagati teri zaat hai...

होठ सी कर भी बोलता हूँ मैं

देख लो मुझको आइना हूँ मैं 
होठ सी कर भी बोलता हूँ मैं 

पूछती रहती हूँ पता ख़ुद से 
एक मुद्दत से लापता हूँ मैं 

आईने में नहीं हूँ मैं मौजूद
अस्ल क़िरदार से जुदा हूँ मैं 

हादसे क्या बुझायेगे मुझको 
एक उम्मीद का दिया हूँ मैं

सच तो ये हैं की इस कहानी में
इब्तिदा तू हैं इन्तेहाँ हूँ मैं

सब मुझे ढूढने से है क़ासिर
इक अजब शहरे_गुमशुदा हूँ मैं

राह मंज़िल की जो दिखाता है
उस मुसाफ़िर का नक्शे_प़ा हूँ मैं

देखने वाले मुझको ग़ौर से देख
अपनी तस्वीर से जुदा हूँ मैं

तूने मक़बूल कर दिया मुझको
दिल से निकली हुई दुआ हूँ मैं

इक ज़रा मान दे दिया उसको
मुझसे कहता है देवता हूँ मैं

पहले इंसान ठीक से बनिए
आप कहते है की ख़ुदा हूँ मैं

लोग कुछ भी कहे 'सिया' लेकिन
मैं समझती हूँ खूब क्या हूँ मैं ...

dekh le mujhko aaina hoon main
hoth see kar bhi bolta hoon main

poochti rahti hoon pata khud se
ek muddat se la pata hoon main

aaine mein nahi hoon main moujood
asl kirdaar se juda hoon main

hadse kya bhujayege mujhko
ek umeed ka diya hoon main

sach to yeh hai ke is kahani mein
ibteda too hai intehaan hoon main

sab mujhe dhudhne se hai qasir
ik ajab shahre gumshuda hoon main

raah manzil ki jo dikhata hai
us musafir ka nakshe _paa hoon main

dekhne wale mujh ko ghour se dekh
apni tasweer se juda hoon main

too ne maqbool kar diya mujh ko
dil se nikli huwi duwa hoon main

ik zara maan de diya usko
mujh se kahta hai dewata hoon main

pahle insaan theek se baniye
aap kahte hain ke khuda hoon main

log kuch bhi kahe siya lekin
main samjhti hoon khoob kya hoon main

मैं जो भी दिल में अपने ठानती हूँ

उसे पूरा ही करके मानती हूँ 
मैं जो भी दिल में अपने ठानती हूँ

तुम्हारी हर अदा पहचानती हूँ 
ज़ियादा तुमसे तुमको जानती हूँ

मुझे ख़ामोशियों से मत टटोलो 
मैं आँखों की ज़बां पहचानती हूँ

मैं कर के अनसुनी खुद अपने दिल की 
कहा तेरा हुआ सब मानती हूँ

ज़रा सी बात पर मुँह फेर लेना
ये आदत है तुम्हारी जानती हूँ

उम्मीदें ढाल के साँचे में दिल के
मैं अरमानों की मिट्टी छानती हूँ

सिवा तेरे नहीं मेरा कोई अब
तुम्ही को सिर्फ अपना मानती हूँ

ख़िज़ाँ गुलशन को मेरे छू न पाये
मनौती अपने रब से मानती हूँ

use pura hi karke manti hoon
main jo bhi dil mein apne thanti hoon

tumahari har ada pahchanti hoon
ziyada tumse tumko janti hoon

mujhe khamooshiyon se mat tatolo
main aankho ki zaba .n pahechaanti hoon

main kar ke ansuni khud apne dil ki
kaha tera hua sab manti hoon

zara si baat par munh fer lena
ye aadat hai tumahari janati hoon

ummede'n dhaal ke sanche mein dil ke
main armano ki mitti chanati hoon

siwa tere nahi;n mera koyi ab
tumhi ko sirf apna manti hoon

khiza'n gulshan ko mere chhu na paaye
manauti apne rab se manti hoon
siya..

Tuesday, 10 June 2014

अब खुद को देखती हूँ तुम्हारी नज़र से मैं

वाक़िफ़ न अपनी रात , न अपनी सहर से मैं 
अब खुद को देखती हूँ तुम्हारी नज़र से मैं 

उनसे निगाह मिलते ही पल में बिखर गई 
खुद को बहुत संभाल के निकली थी घर से मैं 

रहती हूँ सादगी की हिफाज़त में हर घड़ी 
खुद को बचाये रखती हूँ दुनिया के शर से मैं

परवान   चढ़ रहा है मेरी ज़िन्दगी का क़द 
इक बेल की  तरह से हूँ लिपटी शजर से मैं 

ये कौन सा मक़ाम तेरी चाहतों का है 
हद्दे निगाह तू ही है गुजरूं जिधर से मैं 

जिस से मुझे मिली है  नई  ज़िन्दगी  सिया 
क्यूँ  उसका   हाथ  छोड़  दूँ दुनिया के डर  से मैं 


waqif n apni raat, n apni sahar se main 
ab khud ko dekhti hoon tumahari nazar se main 

unse nigaah milte he pal mei'n bikhar gayi 
khud ko bahut sambhal ke nikali thi ghar se main 

rahti hooN sadgi ki hifazat mein har ghadi 
khud ko bachaye rakhti hoon duniya ke shar se main 

parwan chadh raha hai meri zindgi ka qad 
ik bel ki tarah se hi lipti shazar se main 

ye kaun sa maqaam teri chahto ka hai 
had e nigaah tu he hai guzru'n jidhar se main 

jisse mujhe  mili hai nayi zindgi siya 
kyu'N uska hath chhod du'N duniya ke dar se main ..

इक तजरूबे के बाद समझ में वो आयी बात

जिनकी हँसी में हमने हमेशा उड़ायी बात 
इक तजरूबे के बाद समझ में वो  आयी बात 

तुमने अजीब वक़्त पे अपनी उठायी  बात 
यह शोर है के देती नहीं कुछ सुनायी बात 

मैं ख़िदमत ए सुखन में रही हर्फ़ की तरह 
फिर लफ्ज़ लफ्ज़ जोड़ के मैंने कमायी बात 

जब तक ज़बाँ से निकली नहीं थी ,मेरी ही थी 
मुँह से निकल के हो गयी पल में परायी बात 

अब क्या हुआ के खुल के जो कहते नहीं हो कुछ 
तुम से कभी भी हमने न कोई छुपायी बात 

इक पल  में मेरी बात का अफ़साना कर दिया 
कितने यक़ी से आपको मैंने बतायी बात 

नफरत लिए बिछड़ने से बेहतर है ये सिया 
तुम भी भुला दो मैंने भी सारी भुलायी बात 

ये सच बोलना तो बग़ावत नहीं है ?

सदाक़त पे तर्ज़ ऐ हुकूमत नहीं है 
ये सच बोलना तो  बग़ावत नहीं है 

मुझे  सर झुकाने की आदत नहीं है 
किसी का  लूँ एहसां ज़रुरत नहीं है 

दिलों में ख़ुलूस ओ मोहब्बत न शफ़क़त 
निगाहों में भी अब मुरव्वत नहीं है 

बहुत खो चुकी हूँ खुदा अब रहम कर 
बस अब और खोने की हिम्मत नहीं है 

सभी गुम हैं अपनी ही दुनिया में ऐसे 
किसी को किसी की ज़रूरत नहीं है 

मिली है तबाही से ये आगही भी 
किसी के भी बस में ये क़ुदरत नहीं है 

मेरे राह में आके  काँटे बिछाये 
किसी शख़्स में इतनी जुर्रत नहीं  है 

सिया शायरी मेरी पहचान होगी 
मुझे झूठी शोहरत की चाहत नहीं है

sadaqat pe tarz  e hukumat .nahi'n  hai 
ye sach bolna to  baghawat nahi'n  hai  ?

mujhe sar  jhukane  ki  aadat nahi'n  hai  
kisi ka loon  ehsaa.n ...zaroorat nahi'n  hai  

dilo mein khulus-o-muhabbat na shafqat 
nigaho'n  mein bhi ab murwwat nahi'n  hai 

bahut kho chuki hoon khuda ab rahm kar 
bus Ab aur khone ki Himmat nahi'n  hai 

sabhi gum hai'N apni hi duniya mein aise 
kisi ko kisi ki zaroorat nahin hai

mili hai Tabaahi se ye aagahi bhi 
 kisi ke bhi bus mein ye qudrat nahin hai

meri raah mein aake kaante bichaaye 
kisi shkhs mein itni jurat nahin hai

siya shayari meri pahchan hogi 
mujhe jhoothi shoharat ki chahat nahi'n  hai ,,

मुझे जो तराशे वो आज़र कहाँ है

कोई संग हो मुझसे बेहतर कहाँ है 
मुझे जो तराशे वो आज़र कहाँ है 

फ़क़त तीरगी है दिलों में समायी 
यहाँ रौशनी अब मय्यसर कहाँ है ..

तेरे नाम करनी थी ये ज़िंदगानी 
मगर मेरा ऐसा मुक़द्दर कहाँ है 

मोहब्बत की दस्तार तो मुंतज़िर है 
मगर इसके लायक़ कोई सर कहाँ है

है दीवार ओ दर और छत इस मकाँ में
जिसे घर कहा जाए वो घर कहाँ है

गुनहगार आँखे छलकती नहीं क्यों
ख़ुदा की तलब है तो फिर डर कहाँ है

मेरे दिल के एहसास ज़िंदा है अब तक
सिया का है दिल कोई पत्थर कहाँ है

koyi sang ho mujhse behtar kaha'n hai
mujhe jo tarashe wo aazar kaha'n hai

faqat teergi hai dili mein samaayi
yahan roshni ab mayysar kaha'n hai

tere naam karni thi ye zindgani
magar mera aisa muqddar kahan hai

mohabat ki dastaar tou muntazir hai
magar iske laayeq koi sar kahan hai

hai deewar o dar aur chat is makaa'n mein
jise ghar kaha jaaye wo ghar kahan hai

gunahgaar aankhein chalakti nahi kiyon ?
khuda se talab hai to phir dar kahan hai?

mere dil ke ehsaas zinda hai ab tak
siya ka hai dil, koyi patthar kaha'n hai

मुक़दस प्यार के रिश्ते की तुमने क़द्र कब जानी

रहे महरूम ए मंज़िल दरबदर की खाक़ ही छानी
मुक़दस प्यार के रिश्ते की तुमने क़द्र कब जानी

जो कल मुखलिस था मेरा आज वो ही गैर लगता है 
मुझे बदले हुए इस तौर पर होती है हैरानी

अगर एहसान होते याद तो ऐसा नहीं होता 
मगर अफ़सोस शायद मर गया है आँख का पानी

मुझे ख़्वाहिश थी जिसकी सरबलन्दी और शोहरत की 
मगर अफ़सोस उसकी बेहिसी मैने न पहचानी

बता इसके सिवा या रब तेरी तख़लीक़ में क्या है
हवा है खाक है आकाश है ,है आग और पानी

हुनर मेरा मुझे ज़िंदा रक्खेगा उम्र भर यूही
इसे समझे अना मेरी या समझेँ कोइ मनमानी

मुझे तनहा ही लड़ना अपने मक़सद के लिये होगा
सुखन के नाम पे देती रहूँगी अपनी क़ुर्बानी

सिया अब रोक कर कोइ दिखाये रास्ता मेरा
है मेरा अज़्म आँधी सा मेरा जज़बा है तूफ़ानी

rahe mahroom e manzil .darbadar ki khaakh hi chaani .
muqadas pyaar ke rishte ki tumne qadr kab jani

jo kal mukhlis tha mera aaj kyun wo ghair lagta hai
mujhe badle hue is taur par hoti hai hairaani

agar ehsaan hote yaad to aesa nahi hota ...
magar afsos shayed mar gaya hai aankh ka paani

mujhe khwahish thee jiski Sar balandi aor shohrat ki
magar afsos uski behisi maine na pahechaani

bata iske siwa ya rab teri takhleeq mein kya hai
hawa hai khaak hai akaash hai, hai aag aur paani

hunar mera mujhe zinda rahkega .umr bhar yon hi
ise samjhe ana meri ,ya samjhe koyi man maani

mujhe tanha hi ladna .apne maqsad ke liye hoga
sukhan ke naam pe deti rahoongi apni qurbaani

siya ab rok kar koi dikhaey raasta mera
hai mera azm aandhi sa mera jazba hain tufaani
.

शामिल हैं हम भी अहल ए जुनूँ की क़तार में

अहल ए सितम को हक़ है रक्खें जिस शुमार में 
शामिल हैं हम भी अहल ए जुनूँ की क़तार में

आज़ाद हो तो ये भी ख़लाओं में जा बसे
जो रूह क़ैद है अभी मिटटी के ग़ार में

देखा उसे जो ख्वाब में महसूस ये हुआ 
इक लम्हा ए यक़ीन मिला था उधार में

मैं गीत गा रही थी ख़ुशी का के दफ़तन 
आवाज़ मेरी दब गयी चीख ओ पुकार में

उफ़ उसके जीतने की ख़ुशी मुझसे पूछिये
कितना सुकूँ मिला है मुझे अपनी हार में

उसके सिवा किसी को नहीं पूजती सिया
बसता है मेरा राम ही सांसों के तार में

ahl e sitam ko haq hai rakhein jis shumaar mein
shamil hain hum bhi ahl e junoo.n ki qataar mein

azaad ho to ye bhi khalao'n me ja basei.n
jo rooh qaid hai abhi mitti ke ghaar me

dekha usse jo khwaab me , mahsoos ye huwa
ik lamha e yaqeen mila tha udhaar mein

main geet ga rahi thee khushi ka ke dafatan
aawaaz meri dab gai cheekh o pukaar mein

uff uske jeetne ki khushi mujh se poochiye
kitna sukoo.n mila hai mujhe apni haar mein

uske siwa kisi ko nahi poojti siya
basta hai mera ram hi sanso'n ke taar me

Sunday, 8 June 2014

कभी ख़ुशियों को मेरी ज़ीस्त का उन्वान कर या रब

मसायब से भरी ये ज़िंदगी आसान कर या रब 
 कभी ख़ुशियों को मेरी ज़ीस्त का  उन्वान कर या रब 

मैं तन्हा थक चुकी हूँ हर क़दम पर कोई उलझन है 
मुझे तू रहमतों के साये में परवान कर या रब 
तेरा ही ज़िक्र तेरा ही बयाँ विर्द ए ज़ुबाँ कर लूँ
हो तेरा नाम लब पर , तब मुझे बेजान कर या रब

बस इक मुख़लिस रिफ़ाक़त उम्र भर काफी रहे मुझको
सभी मौक़ा परस्तों से मुझे अन्जान कर या रब

मैं अपना हाल ए दिल और आरज़ू तुझसे ही कहती हूँ
सभी कुछ मान कर तुझको ,तुझी को जान कर या रब

चदरिया पर कोई धब्बा न मेरा मन ही मैला है
मैं ख़ुद को लेके आई हूँ फटक कर छान कर या रब

मेरी बेचैन बेक़स रूह ओ जाँ में वहशतें भर दे
मेरे ये दिल की आँखे और भी हैरान कर या रब

ये दो नैना तो बस सावन का मंज़र पेश करते हैं
सिया के मुस्कुराने का भी कुछ सामान कर या रब

masayab se bhari ye zindgi aasan kar ya rab
kabhi khushiyon ko meri zeest ka unwaan kar ya rab
main tanha thak chuki hoon har qadam par koi uljhan hai .
mujhe tu rahmaton ke saaey mein parwaan kar ya rab
tera hi ziqr tera hi bya'n vird e zubaa'n kar lun
ho tera naam lab par tab mujhe bejaan kar ya rab
bas ik mukhlis rifaqat umr bhar kafi rahe mujh ko sabhi mouqa parasto'n se mujhe anjan kar ya rab
main apna hal e dil aur aarzoo tujhse hi kahti hoon sabhi kuch maan kar tujhko,tujhi ko jaan kar ya rab
Chadariya par koi dhabba na mera man hi maila hai 
Mai'n khud ko le ke aayi hoo'n phatak kar chhaan kar yaa Rab
meri bechain beqas rooh o jaan mein wahshate'n bhar de
mere ye dil ki aankhe aur bhi hairaan kar ya rab
ye do nayna to bus saawan ka manzar pesh karte hain . siya ke muskurane ka bhi kuch saamaan Kar ya rab

Wednesday, 4 June 2014

andhero se ab ham ujalo me aaye

tere naam se naam walo me aaye . andhero se ab ham ujalo me aaye

khushi dho rahi sahn e dil aansuwo se palatkar wo ghar itne salon me aaye
yuheen sath doge ?mera har qadam par agar chandi si mere balon me aaye

yaqee'N kar liya tha meri saadgi ne ye dil ab kisi ki na chalo me aaye

paka kar khilaati thi hatho se jo maa
.wo lazzat na sheeri niwalon me aaye

तेरे नाम से नाम वालों में आये
अंधेरों से अब हम उजालों में आये 

ख़ुशी धो रही सहन ओ दिल आँसुओं से
पलट कर वो घर इतने सालों में आये
यूहीं साथ दोगे मेरा हर क़दम पर ?
जो चाँदी कभी मेरे बालों में आये
यक़ीं कर लिया था मेरी सादगी ने
ये दिल अब किसी की न चालों में आये
पका कर खिलाती थी हाथों से जो माँ
वो लज़्ज़त न शीरी निवालों में आये

ये सच बोलना तो बग़ावत नहीं है ?

सदाक़त पे तर्ज़ ऐ हुकूमत नहीं है
ये सच बोलना तो  बग़ावत नहीं है ?

मुझे  सर झुकाने की आदत नहीं है
किसी का  लूँ एहसां ज़रुरत नहीं है

दिलों में ख़ुलूस ओ मोहब्बत न शफ़क़त
निगाहों में भी अब मुरव्वत नहीं है

बहुत खो चुकी हूँ खुदा अब रहम कर
बस अब और खोने की हिम्मत नहीं है

सभी गुम हैं अपनी ही दुनिया में ऐसे
किसी को किसी की ज़रूरत नहीं है

मिली है तबाही से ये आगही भी
किसी के भी बस में ये क़ुदरत नहीं है

मेरे राह में आके  काँटे बिछाये
किसी शख़्स में इतनी जुर्रत नहीं  है

सिया शायरी मेरी पहचान होगी
मुझे झूठी शोहरत की चाहत नहीं है


sadaqat pe tarz  e hukumat .nahi'n  hai
ye sach bolna to  baghawat nahi'n  hai  ?

mujhe sar  jhukane  ki  aadat nahi'n  hai
kisi ka loon  ehsaa.n ...zaroorat nahi'n  hai

dilo mein khulus-o-muhabbat na shafqat
nigaho'n  mein bhi ab murwwat nahi'n  hai

bahut kho chuki hoon khuda ab rahm kar
bus Ab aur khone ki Himmat nahi'n  hai

sabhi gum hai'N apni hi duniya mein aise
kisi ko kisi ki zaroorat nahin hai

mili hai Tabaahi se ye aagahi bhi
 kisi ke bhi bus mein ye qudrat nahin hai

meri raah mein aake kaante bichaaye
kisi shkhs mein itni jurat nahin hai

siya shayari meri pahchan hogi
mujhe jhoothi shoharat ki chahat nahi'n  hai



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