Sunday, 28 September 2014

बेसबब ज़िंदगी गँवाते रहे

जान ओ दिल जिनपे हम लुटाते रहे
वो हमें रोज़ आज़माते रहे
प्यार बेवजह तुझसे होना था
बेसबब ज़िंदगी गँवाते रहे
उनको हमने क़रीबतर जाना
हम से जो दूरियां बढ़ाते रहे
उसके आने के वादे झूठे थे
फिर भी दिल का मकाँ सजाते रहे
आज ख़ुद पर मलाल होता है
जान कर क्यों फ़रेब खाते रहे
तेरी सादादिली का लोग सिया
फ़ायदा ही तो बस उठाते रहे
jaan-o-dil jinpe hum lutaate rahe
Wo hame'n roz aazmaate rahe.
Pyar bewaj'h tujh se hona tha.
Besabab zindagi ganwaate rahe
Unko hamne qareebtar jaana
Ham se jo dooriya'n badhaate rahe.
Uske aane ke wa'ade jhoote the
Phir bhi dil ka maka'n sajaate rahe.
Aaj khud par malaal hota hai
jaan kar kyun fareb khaate rahe
Teri saadadili ka log Siya
Faaeda hi to bas uthaate rahe..

Thursday, 25 September 2014

ख़ुदा ही फ़ज़्ल करेगा तो कुछ भला होगा

दराज़ कासा ए दस्त ए दुआ हुआ होगा
ख़ुदा ही फ़ज़्ल करेगा तो कुछ भला होगा
जलाये बैठी हूँ पलकों पे इंतज़ार की लौ
तकूँगी राह चराग़ों से रतजगा होगा
सुकून बह गया सारा लहू की बूँदों में
उसे कुरेद के ज़ख़्मों को क्या मिला होगा
उसे गुमान के सजदा करुँगी मैं उसको
मेरा नहीं वो किसी और का ख़ुदा होगा
कहा तो था कि नए हमसफ़र के साथ न जा
मैं जानती थी तेरे साथ कुछ बुरा होगा
पिए है सब्र के आँसू ही रोज़ ओ शब मैंने
वो आज भी मेरी हालत पे हँस रहा होगा
इधर उधर मैं उसे ढूंढती रही थी सिया
ख़बर न थी मेरे अशआर में छुपा होगा
Daraaz kaasa-e-dast-e-du'a hua hoga
Khuda hi fazl karega to kuchh bhala hoga.
Jalaaye baithi hu'n palko'n pe intizaar ki lau
Takungi raah chiraagho'n se ratjaga hoga
Sukoon bah gaya saara lahu ki boondo'n me'n
Use kured ke zakhmo'n ko kya mila hoga
Use gumaan ki sajda karungi mai"n usko
Mera nahi"n wo kisi aur ka khda hoga.
Kaha to tha ki naye hamsafar ke saath na ja
Main jaanti thee tere saath kuch bura hoga ...
Piye hain sabr ke aansun hi roz o shab main ne
wo aaj bhi meri haalat pe hans raha hoga
Idhar udhar mai'n use dhoondhti rahi thi Siya
Khabar na thi mere ash'aar me"n chhupa hoga
siya

Wednesday, 24 September 2014

दर्द का कुछ और गहरा दिल से रिश्ता हो गया

आपकी यादों का अब साँसों पे पहरा हो गया
दर्द का कुछ और गहरा दिल से रिश्ता हो गया
साथ निकले थे मगर राहें जुदा मंज़िल जुदा
ज़ेह्न ओ दिल में फासला अब आज कैसा हो गया
क्यों यकायक आसमाँ सर पर उठा लेते हैं लोग
गोया शिकवा भी जताना इक तमाशा हो गया
सर्द लम्हे तल्ख़ बातें भूल कर बैठे ही थे
फिर किसी को देख कर हर ज़ख्म ताज़ा हो गया ..
दोस्तों में ज़िक्र जब भी बेवफ़ाई का छिड़ा
रंग चेहरे का तुम्हारे क्यों धुवाँ सा हो गया
मेरी कोशिश को सराहे,कोई भी ऐसा न था
हाँ मेरी नाकामियों का खूब चर्चा हो गया
इश्क़ की मंज़िल के सदमें हमसे मत पूछो सिया
हमको उन राहों से गुज़रे इक ज़माना हो गया
Aap ki yaado'n ka ab saanso 'n pe pahra ho gaya.
Dard ka kuchh aur gahra dil se rishta ho gaya
Saath nikle the magar rahe'n juda manzil juda
Zehn-o-dil me'n faasla ab aaj kaisa ho gaya.
Kyo'n yakayak aasmaa'n sar par utha lete hai'n log
Goya shikwa bhi jataana ik tamaasha ho gaya.
Sard lamhe talkh baate'n bhool kar baithe hi the.
phir kisi ko dekh kar har zakhm taaza ho gaya
Dosto'n me'n zikr jab bhi bewafaai ka chhida
Rang chehre ka tumhaare kyo'n dhua"n sa ho gaya
Meri koshish ko saraahe,koi bhi aisa n tha
haan meri nakaamiyon ka khoob charcha ho gaya
Ishq ki manzil ke sadme'n ham se mat poochho Siya
Ham ko un raaho'n se guzre ek zamaana ho gaya.
siya

Monday, 22 September 2014

सिर्फ एक नज़र ज़ख्म का मरहम तो नहीं है


दामन मेरी उम्मीद का कुछ कम तो नहीं है 
सिर्फ एक नज़र ज़ख्म का मरहम तो नहीं है 

फ़ुरक़त में तेरी दिल का मैं मातम करूँ शब भर 
काम और भी है सिर्फ यहीं ग़म तो नहीं है 

मरहूम मरासिम पे गिरे आँख से आँसू 
बारिश का मगर शहर में मौसम तो नहीं है 

पल भर में करे ख़ुश्क समंदर के बदन को 
हाँ गर्मी ए एहसास मेरा काम तो नहीं है

दुनिया की हक़ीक़त को मैं इक पल में भुला दूँ
तन्हाई का ग़म इतना बड़ा ग़म तो नहीं है

तू सच का मुहाफ़िज़ है सभी है तेरे दुश्मन
इस बात में ए यार कोई दम तो नहीं है

Daaman meri ummid ka kuchh kam to nahi''n hai
Sirf ek nazar zakhm ka marham to nahi'n hai

Furqat me'n teri dil ka main matam karu'n shab bhar
Kaam aur bhi hai'n sirf yahi gham to nahi'n hai.

Marhoom marasim pe gire aankh se aansu
Baarish ka magar shahr me'n mausam to nahi'n hai.

Pal bhar me'n kare khushk samandar ke badan ko
haan garmi e ehsaas mira kam to nahi hai

duniya ki haqeeqat ko mai ik pal mein bhula doon
tanhai ka gham itna bada gham to nahi hai

tu sach ka muhafiz hai sabhi hai tire dushman
is baat mein aye yaar koi dam to nahi'n hai

siya sachdev

Sunday, 21 September 2014

मेरी आँखों में नमी सी रह गयी

दिल में इक हसरत दबी ही रह गयी 
मेरी आँखों में नमी सी रह गयी 

हाल मेरा पूछ कर वो चल दिये 
बात फिर मेरी अधूरी रह गयी 

बाग़बाँ ही जिस चमन के उठ गए 
हर कली उसकी सिसकती रह गयी 

सारे मंज़र वक़्त ने धुँधला दिए 
याद बाक़ी इक पुरानी रह गयी

यूँ तो दुनिया में मिला सब कुछ मगर
ज़िंदगी में जो कमी थी रह गयी

अब कहाँ हासिल किसी भी पल सुकूँ
आपाधापी गहमा गहमी रह गयी

क्या मिला इस ज़िंदगी से ए सिया
आज बैठी सोचती ही रह गयी

Dil me'n ek hasrat dabi hi rah gayi:
Meri aankho'n.me'n nami si rah gayi

Baghbaa'n hi jis chaman ke uth gaye
Har kali uski sisakti rah gayi

Ab kaha'n haasil kisi pal bhi sukoo'n
Aapa dhaapi gahmaa gahmi rah gayi

Haal meraa poochh kar woh chal diye
Baat phir meri adhoori rah gayi.

Saare manzar waqt ne dhndhla diye
Yaad baaqi ek puraani rah gayi

Yoo'n to duniya me'n mila sab kuch magar
Zindagi me"n jo kami thi rah gayi

Kya mila is zindagi se ai Siya
Aaj baithi sochti hi rah gayi

Saturday, 20 September 2014

मैं बहुत खुश हूँ ये अफ़वाह उड़ा दी जाये

मुझ पे हँसने की ज़माने को सज़ा दी जाये 
मैं बहुत खुश हूँ ये अफ़वाह उड़ा दी जाये 

शोर शहरों में बहुत है सुने कोई भी तो क्या 
जाके सन्नाटों को सहरा में सदा दी जाये 

मेरे ख़त उसने जला  डाले चलो अच्छा हुआ 
मेरी हर एक निशानी भी मिटा दी जाये 

मसअला जितना है बात उसपे भी बस उतनी हो 
क्या ज़रूरी है की हर बात बढ़ा दी जाए 

इसको अखलाक़ भी कहते हैं रवादारी भी 
जो भी दिल तोड़े सिया  उसको दुआ दी जाए 

Mujh.pe hansne ki zamaane ko saza di jaaye Main bahut khush hu'n ye afwaah uda di jaaye

Shor shahro'n me bahut hai sune koi bhi to kya. Jaake sannato'n ko sahra me'n sada di jaae

Mere khat us ne jala daale chalo achchha hua Meri.har ek nishani bhi mita di jaaye

Mas'ala jitna ho baat uspe bhi bus utni ho Kya zuroori hai ki har baat badha di jaaye

isko akhlaq bhi kahte hai rawadaari bhi
jo bhi dil tode 'siya' usko dua di jaaye

Sunday, 14 September 2014

और उनको बैर भी मुझसे कोई पुराना था

ग़मों का पास तो पहले से ही खज़ाना था 
और उनको बैर भी मुझसे कोई पुराना था 

कभी था उज़्र कोई और कभी थी मज़बूरी 
तुम्हारे पास नया रोज़ इक बहाना था 

तुम्हारे साथ ने कितनी अज़ीयतें दी हैं 
बिछड़ के तुमसे हमें कुछ सुकून पाना था 

दुआएँ लेती रही हर किसी से मैं हरदम 
मुझे यहाँ भला और क्या कमाना था

हम उठ के आते नहीं यूँ तुम्हारी महफ़िल से
हमारा ज़िक्र तुम्हें भी पसंद आना था

कहीं अँधेरों को दुनिया में रास्ता न मिले
हमें तो इतने दीयों को यहाँ जलाना था

ये शायरी का हुनर जो अता किया रब ने
कि मेरे जीने का वाहिद यहीे बहाना था

तुम्हारे दर पे ही आकर सुक़ून पाया है
तुम्हारा दर ही मेरा आखिरी ठिकाना था

जहाँ लहू की तमाजत भी पड़ गयी ठंडी
कुछ ऐसे रिश्तों को भी ए सिया निभाना था

ghmo'n ka paas to pahle se hi khazana tha
aur unko bair bhi mujhse koyi puarana tha

kabhi tha uzr koyi aur kabhi thi majburi
tumahare paas naya roz ik bahana tha

tumahare sath ne kitni azeeyaten di hain
bichad ke tujhse hame'n kuch sakoon pana tha

Duaein leti rahi har kisi se main har dam .
Mujhe yahaan se bhala aur kya kamana tha

hum uth ke aate nahi yun tumahari mehfil se
hamara zikr tumhe bhi pasand aana tha

.kaheen andheron ko duniya mein rasta n mile
hamen to itne diyo'n ko yahan jalana tha

Ye shairi ka hunar jo ata kiya rab ne .
ki mere jeene ka wahid yaheen bahana tha

Tumhare dar pe hi aa kar sukoon paya hai
Tumhara dar hi mera aakhri thikana tha

jahan lahoo ki tamazat bhi pad gayi thandi
Kuchh aise rishton ko bhi aey siya nibhana tha .

Friday, 12 September 2014

सितारा है मगर टूटा हुआ है


जो आँसू रेत पर टपका हुआ है
सितारा है मगर टूटा हुआ है

लकीरें बस उलझती जा रही है
नज़र का ज़ाविया ठहरा हुआ है

मेरी आसूदगी को प्यास काफ़ी
वो दरिया पी के भी प्यासा हुआ है

उसे हर रुख़ से मैं पहचानती हूँ
वो चेहरा तो मेरा परखा हुआ है

गिरां गुज़रे है दिल पर बेक़ली भी
सिया कुछ दिन से जाने क्या हुआ है

Jo aansu ret par tapka hua hai. 
Sitara hai magar toota hua hai.

lakeerein bas ulajhti ja rahi hain nazar ka zawiya tahara hua hai
Meri aasoodagi ko pyaas kaafi 
Wo dariya pee ke bhi pyaasa hua hai.

Use har rukh se mai'n pahchaanti hu'n. 
Wo chehra to mera parkha hua hai.

Gira'n guzre hai dil par bekali bhi 
Siya kuchh din se jaane kya hua hai.

Wednesday, 10 September 2014

ज़ब्त करना है मुस्कुराना है

बोझ हस्ती का यूँ उठाना है 
ज़ब्त करना है मुस्कुराना है 

तल्ख़ियां दर्मियान कितनी हो 
फिर भी हर हाल में निभाना है 

बाज़ आ दिल ज़रा संभल भी जा 
और कब तक फ़रेब खाना है 

इक तसलसुल है ज़िंदगी दुःख का
ग़म से रिश्ता बहुत पुराना है

सुल्ह हालात से करूँ क्यों कर
क़ुव्वत ए दिल को आज़माना है

मोड़ लूँ रुख मैं इस ज़माने से
झूठ से अब नहीं निभाना है

क्या मिलेगा मिटा के यूँ ख़ुद को
दिल को कब तक 'सिया' जलाना है

Bojh hasti ka yun uthana hai
Zabt karna hai muskurana hai

talkhiyan Darmiyaan kitni ho
phir bhi har haal mein nibhana hai

baaz aa dil zara sambhal bhi ja
aur kab tak fareb khana hai

Ik Tasalsul Hai Zindagi Dukh Ka
Gham se Rishta Bahut purana hai

Sul'h halaat se karoo'n kyo'nkar
Quvvat-e-dil ko aazmana hai

Mod lun Rukh main is zamane se
jhooth se ab nahin nibhana hai

Kya milega mita ke yun khud ko
Dil ko kab tak 'Siya' jalana hai ?

SIYA

Sunday, 7 September 2014

हो कफ़न मेरा सुर्ख़ चादर का

है ये अरमान ज़ेहन ए मुज़तर का 
हो कफ़न मेरा सुर्ख़ चादर का 

दिल से रिसता है अब लहू हर दम 
ज़ख्म भरता नहीं है नश्तर का 

चारसू गुमरही का आलम है 
अब न अपना पता न रहबर का 

दैर को जाऊ मैं की काबे को 
ये पत्थर का वो भी पत्थर का

मैं भी हूँ अपने आप से बाहर
बेघरी सा मिजाज़ है घर का

मैं कहाँ अपने आप को देँखू
आइना हो गया है पत्थर का

फिर वहीं ज़िंदगी के हंगामे
चैन मिलता नहीं है पल भर का

दूसरों को क़सूर क्या दूँ मैं
दोष है सब सिया मुक़द्दर का ..

Hai ye armaan zehn-e-muztar ka
Ho kafan mera surkh chaadar ka

Dil se rista hai ab lahoo har dam
zakhm bhrta nahi hai nashtar ka

chaar soo gumrahi ka aalam hai
ab na apna pata na rahbar ka

dair jo jau main ki kaabe ko
ye bhi patthar ka wo bhi patthar ka

main bhi hoon apne aap se bahar
be-ghari sa mijaz hai ghar ka

main kahan apne aap ko dekhu'n
aaina ho gaya hai patthar ka

phir waheen zindgi ke hangaame
chan milya nahi hai pal bhar ka

dusro'n ko qasoor kya du'n main
dosh hai sab siya muqqdar ka

siya

Wednesday, 3 September 2014

दिल में सोये हुए जज़्बों को जगाता क्यों है

ज़िंदगी में मेरी तूफ़ान उठाता क्यूँ है 
दिल में सोये हुए जज़्बों को जगाता क्यों है 

एक ही मौज बहा कर इसे ले जायेगी 
रेग ए साहिल पे घरौंदों को बनाता क्यूँ है  

उस पे क्या होगा दिल ए ज़ार तेरे ग़म का असर 
ग़ैर है ग़ैर से उम्मीद लगाता क्यूँ है 

मैंने कब उससे रिआयत की गुज़ारिश की थी 
 वो हर इक बात पे एहसान  जताता क्यूँ है 

दिल ए नादाँ तू ज़रा ज़ब्त भी कर लेना सीख 
बेबसी अपनी ज़माने को सुनाता क्यूँ हैं 

राख का ढेर ही कर दे के बिखर जाऊ मैं 
गीली लकड़ी की तरह मुझको जलाता क्यूँ है

हो चुका तर्क ए ताल्लुक़ तो सिया ज़ालिम दिल 
अब भी पहले की तरह मुझको सताता  क्यूँ हैं 

zindgi mein meri tufaan uthata kyun hai
Dil me'n soye hue jazbo'n ko jagaata kyo"n hai

Ek hi mauj baha kar ise le jaaegi
Reg-e-saahil pe gharaunde ko banata kyo'n hai.

Us pe kyo'n hoga dil-e-zaar tere gham ka asar.
Ghair hai ghair se ummid lagata kyo'n hai.

Mai'n ne kab us se ri'aayat ki guzaarish ki thi
Woh har ek baat pe ahsaan jataata kyo'n hai

Dil-e-naadaa'n too Zara zabt bhi kar lena seekh
bebsi apni zamane ko sunata kyun hai

raakh ka dher hi kar de ke bikhar jaun main 
geeli lakdi ki tarah mujhko jalata kyun hai

Ho chuka tark-e-t'alluq to Siya zaalim dil
Ab bhi pahle ki tarah mujhko sataata kyo"n hai

Monday, 1 September 2014

मंज़िल को मेरी और भी दुश्वार कर दिया

बद सूरती ने राह की बेज़ार  कर दिया 
मंज़िल को मेरी और भी दुश्वार कर दिया 

छोटी सी बात थी उसे तकरार कर दिया
किस्सा ये घर का था सर ए बाज़ार कर दिया 

हुस्न ओ कशिश में प्यार की खोया  हुआ था दिल
 ठोकर से अपनी वक़्त ने बेदार कर दिया 

मासूमियत का ओढ़ के आये थे जो  नक़ाब 
 उनको तो दूर से ही नमस्कार कर दिया

कुछ ख़ास दोस्तों के हुए इस तरह करम 
मुझसे  मेरे क़बीले को बेज़ार कर दिया 

आये थे लोग शम ए हिदायत लिए हुए 
हमने तो उनको साहब ए किरदार कर दिया 

है मेरी ख़ुदशनासी ये हरगिज़ अना नहीं 
बस एहतियात ने मुझे ख़ुद्दार कर  दिया 

Badsoorati ne raah ki bezaar kar diya 
Manzil ko meri aur bhi dushwaar kar diya
choti si baat thi use takraar kar diya kissa ye ghar ka tha sar e bazaar kar diya
Husn-o-kashish me'n pyar ki khoya hua tha dil 
Thokar se apni waqt ne bedaar kar diya
masumiyat ka odh ke aaye the jo naqab unko to door se hi namskaar kar diya
Kuchh khaas dosto'n ke hue is tarah karam :
Mujh se mere qabeele ko bezaar kar diya.
Aaye the log sham-e-hidaayat liye hue
Hamne unhe'n bhi saahib-e-kirdaar kar diya
Hai meri khudshanasi ye hargiz ana nahi
bus ehtiyaat ne mujhe khudaar kar diya.