ज़िंदगी में मेरी तूफ़ान उठाता क्यूँ है
दिल में सोये हुए जज़्बों को जगाता क्यों है
एक ही मौज बहा कर इसे ले जायेगी
रेग ए साहिल पे घरौंदों को बनाता क्यूँ है
उस पे क्या होगा दिल ए ज़ार तेरे ग़म का असर
ग़ैर है ग़ैर से उम्मीद लगाता क्यूँ है
मैंने कब उससे रिआयत की गुज़ारिश की थी
वो हर इक बात पे एहसान जताता क्यूँ है
दिल ए नादाँ तू ज़रा ज़ब्त भी कर लेना सीख
बेबसी अपनी ज़माने को सुनाता क्यूँ हैं
बेबसी अपनी ज़माने को सुनाता क्यूँ हैं
राख का ढेर ही कर दे के बिखर जाऊ मैं
गीली लकड़ी की तरह मुझको जलाता क्यूँ है
हो चुका तर्क ए ताल्लुक़ तो सिया ज़ालिम दिल
अब भी पहले की तरह मुझको सताता क्यूँ हैं
zindgi mein meri tufaan uthata kyun hai
Dil me'n soye hue jazbo'n ko jagaata kyo"n hai
Ek hi mauj baha kar ise le jaaegi
Reg-e-saahil pe gharaunde ko banata kyo'n hai.
Us pe kyo'n hoga dil-e-zaar tere gham ka asar.
Ghair hai ghair se ummid lagata kyo'n hai.
Mai'n ne kab us se ri'aayat ki guzaarish ki thi
Woh har ek baat pe ahsaan jataata kyo'n hai
Dil-e-naadaa'n too Zara zabt bhi kar lena seekh
bebsi apni zamane ko sunata kyun hai
bebsi apni zamane ko sunata kyun hai
raakh ka dher hi kar de ke bikhar jaun main
geeli lakdi ki tarah mujhko jalata kyun hai
Ho chuka tark-e-t'alluq to Siya zaalim dil
Ab bhi pahle ki tarah mujhko sataata kyo"n hai
मैंने कब उससे रिआयत की गुज़ारिश की थी
ReplyDeleteवो हर इक बात पे एहसान जताता क्यूँ है ..
वाह .... बहुत ही लाजवाब शेर इस ग़ज़ल का ...