Wednesday, 3 September 2014

दिल में सोये हुए जज़्बों को जगाता क्यों है

ज़िंदगी में मेरी तूफ़ान उठाता क्यूँ है 
दिल में सोये हुए जज़्बों को जगाता क्यों है 

एक ही मौज बहा कर इसे ले जायेगी 
रेग ए साहिल पे घरौंदों को बनाता क्यूँ है  

उस पे क्या होगा दिल ए ज़ार तेरे ग़म का असर 
ग़ैर है ग़ैर से उम्मीद लगाता क्यूँ है 

मैंने कब उससे रिआयत की गुज़ारिश की थी 
 वो हर इक बात पे एहसान  जताता क्यूँ है 

दिल ए नादाँ तू ज़रा ज़ब्त भी कर लेना सीख 
बेबसी अपनी ज़माने को सुनाता क्यूँ हैं 

राख का ढेर ही कर दे के बिखर जाऊ मैं 
गीली लकड़ी की तरह मुझको जलाता क्यूँ है

हो चुका तर्क ए ताल्लुक़ तो सिया ज़ालिम दिल 
अब भी पहले की तरह मुझको सताता  क्यूँ हैं 

zindgi mein meri tufaan uthata kyun hai
Dil me'n soye hue jazbo'n ko jagaata kyo"n hai

Ek hi mauj baha kar ise le jaaegi
Reg-e-saahil pe gharaunde ko banata kyo'n hai.

Us pe kyo'n hoga dil-e-zaar tere gham ka asar.
Ghair hai ghair se ummid lagata kyo'n hai.

Mai'n ne kab us se ri'aayat ki guzaarish ki thi
Woh har ek baat pe ahsaan jataata kyo'n hai

Dil-e-naadaa'n too Zara zabt bhi kar lena seekh
bebsi apni zamane ko sunata kyun hai

raakh ka dher hi kar de ke bikhar jaun main 
geeli lakdi ki tarah mujhko jalata kyun hai

Ho chuka tark-e-t'alluq to Siya zaalim dil
Ab bhi pahle ki tarah mujhko sataata kyo"n hai

2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04-09-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1726 में दिया गया है
    आभार

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  2. मैंने कब उससे रिआयत की गुज़ारिश की थी
    वो हर इक बात पे एहसान जताता क्यूँ है ..
    वाह .... बहुत ही लाजवाब शेर इस ग़ज़ल का ...

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