Friday, 30 November 2012

उनसे बिछड़ गए है तो जज़्बात मर गए

रिश्तों को जोड़ने में ज़माने गुज़र गए 
मुद्दत में जो बने थे पलों में बिखर गए 

आँखों में इंतज़ार की खुश्की समां गयी
देखे हुए किसी को ज़माने गुज़र गए

हम पर भरी बहार का होता नहीं असर
उनसे बिछड़ गए है तो जज़्बात मर गए

उनसे किसी तरह की भी उल्फत न हो सकी
जो लोग एक बार नज़र से उतर गए

मासूम ख्वाहिशों का गला घोंटने के बाद
जज़्बात के रवां थे जो दरिया ठहर गए

जिसमें लिखी थी मैंने सिया दास्तान ए इश्क़
कल शब् उसी बयाज़ के पन्ने बिखर गए

rishto'n ko jodne mein zamaane guzar gaye
mudaat mein jo bane palo'n mein bikhar gaye

aankho mein intzaar ki khushki sama'n gayi
dekhe hue kisi ko zamane guzar gaye

hum par bhari bahaar ka hota nahi asar
unse bichhad gaye hai to jazbaat mar gaye

unse kisi tarah ki bhi ulfat na ho saki
jo log ek baar nazar se utar gaye

masoom khwahisho'n ka gala ghontne ke baad
jazbaat ke rawan the jo dariya thahar gaye

jismein likhi thi maine siya daastaan e ishq
kal shab usi byaaz ke panne bikhar gaye 


Wednesday, 28 November 2012

ये खुला आसमान है लोगों


हसरतों की उडान है लोगों 
ये खुला आसमान है लोगों 

हर तरफ खून क़त्ल बर्बादी 
फिर भी भारत महान है लोगों  

कुछ न कोई बिगाड़ पायेगा 
वक़्त जब मेहरबान है लोगों  

हम जहाँ पर क़याम करते है 
वो ज़मीं आसमान है  लोगों  

ज़ख्म जो था वो भर गया लेकिन 
दिल पे अब भी निशान है लोगों  

उसके दिल में भी झाँक कर देखो 
जिसकी मीठी ज़बान है  लोगों  

उनकी  तस्वीर क्या बनाऊ मैं 
कैनवस  पर थकान है लोगों 

हर मर्ज़ का ईलाज है मुमकिन 
सब ग़मों का निदान है लोगों 

अपने क़द का भी जायज़ा लेलो 
कितनी झूठी ये शान है लोगों 

मुझको दुनिया से क्या ग़रज़ है सिया 
मेरा अपना जहान है लोगों 

hasratoN ki udan hai logo'N  ye khula asman hai logo'N 
har taraf khoon qatl barbadi phir bhi bharat mahaan hai logo'N kuchh na koi bigad payega waqt jab mehrbaan hai logo'N ham jahan par qayam karte hai wo zameeN asman hai logo'N  zakhm jo tha wo bhar gaya lekin dil pe ab tak nishan hai logo'N  uske dil men bhi jhaNk lete zara jiski meethi zabaan hai logo'N  teri tasveer kya banauN main   canvas par thakaan hai logo'N 

har maraz ka ilaaj hai mumkin sab ghamoN ka nidaan hai logo'N  apne qad ka bhi jayeza lelo kitni jhoothi ye shan hai logo'N 

mujh ko duniya se kya gharaz hai siya mera apna jahan hai logo'N 







ज्ञान से रोशन हो जाए ये सारा संसार



ज्योतिर्मय सबको करे दूर करे अन्धकार
ज्ञान से रोशन हो जाए ये सारा संसार 
दमक ये ज्योति-पर्व की आलोकित संसार
दीपों की जगमग से हैं  फैला सा उजियार
कैसे छोटा सा दीपक दूर करे अंधियार
तिमिर मिटाता जगत से , रोशन हो संसार
सच्चे दिल से जो करे दीन के हित उपकार
लक्ष्मी जी खुद आयेगी चल कर उसके दवार
लो आया है फिर से दीपों का त्यौहार
हसी ख़ुशी के साथ मनाये ,संग  पूरे परिवार ..
मनभावन रंगोली से सजा हुआ है द्वार
सब में नव उत्साह है उल्लासित है परिवार
चारो ओर प्रकाश हो चमक गया संसार
आओ मिलकर सदगुण को भी कर ले अंगीकर
खुशियाँ लेकर आया है फिर से ये त्यौहार
मन हर्षाये देख कर दीपों सजी कतार 

उस ज़मीं पर भी हम संभलते हैं


जिसपे जाकर सभी फिसलते हैं 
उस ज़मीं पर भी हम संभलते हैं 

तेरी यादों के गुमशुदा साये 
धूप ढलने पे ही निकलते हैं 

इत्तेफ़ाक़न हमें वो मिल जाये 
आरजू लेके हम निकलते हैं 

इनसे बहती हैं राख ख्वाबों की
आँख से अश्क़ जब निकलते हैं

मेरे बच्चे ज़हीन है इतने 
ये खिलौनों से कब बहलते हैं 

युहीं बहती है वक़्त की नद्दी 
हम फ़क़त कश्तियाँ बदलते हैं 

तंज़ खुद पे ही कर किया जाए 
आइये ज़ायेका बदलते हैं 

आँख जब मूंदती  हूँ तो दिल में 
तेरी यादो के दीप जलते हैं

आंधियां जो दिए जलाती है 
वो दिए ज़ुल्मतों को खलते है 

रेत पर नाम लिखा और मिटाया तुमने

मेरी रुसवाई का यूं जश्न मनाया तुमने 
रेत पर नाम लिखा और मिटाया तुमने 

फिक्र की धूप में झुलसी हूँ कई सदियों तक
मैंने पाया है तुम्हे मुझको न पाया तुमने

मैंने जब चाहा भुला दूं तिरी यादों को तभी
दर्द का गीत मुझे आके सुनाया तुमने

इश्क ने सुध ही भुला थी मेरे तन मन की
टूट ही जाती मगर मुझको बचाया तुमने

वक़्त ने मुझ से उसी वक़्त हंसी छीनी है
जब भी रोती हुई आँखों को हंसाया तुमने

खौफ़ ने आ के वहीं मिरे पावं वहीं रोक दिए
जब मिरी सम्त कभी हाथ बढाया तुमने ..

meri ruswayi ka yun jashn manaya tumne
ret par naam likha aur mitaya tumne

fiqr ki dhoop mein jhulsi hoon kayi sadiyo'n se
maine paya hai tumeh mujhko na paya tumne

maine jab chaha bhula du'n tiri yado'n ko tabhi
dard ka geet mujhe aake sunaya tumne

ishq ne sudh hi bhula thi mere tan man ki
toot hi jaati magar mujhko bachaya tumne

waqt ne mujh se usi wqat hansi cheeni hai
jab bhi roti hui aankho ko hansaya tumne

khauf ne aake mire pavn wahin rok diye
jab miri samt kabhi hath badhya tumne ..

नज़्म ...तसव्वुर टूट जाता है .



सभी को यूं तो दुनिया में हजारों लोग मिलते है मगर इस भीड़ में मुझको नज़र तुम ही नहीं आते तुम्हे मैं ढूढती फिरती हूँ सहराओं में गुलशन में चमन में और बियाबाँ में जहाँ तक रौशनी सूरज की पहुंची है वहां तक भी वहां तक फ़िक्र की परवाज़ पहुची है जहाँ तक भी तुम्हे ढूढा नदी के पानियों की इन रवां लहरों में तुम हो क्या ? न जाने क्यों मुझे अक्सर यहीं एहसास होता है ज़मीं से ता _फ़लक नज़रों में इक इक पल तुम्हें ढूंढा तुम्हे ढूंढा तमन्नाओं के उन गुस्ताख लम्हों में संजोया है जिन्हें दिल के निहां खानों में खुद मैंने , मगर अफ़सोस होता है तुम्हे पाने की हसरत में मैं खुद को ही गवां बैठी मगर तुम मिल नहीं पाए कभी तो आके धीरे से मेरी वीरान आँखों में कोई इक दिलनशीं सा ख्वाब बन कर ही समां जाओ कभी तो हौले हौले से मेरी बे रब्त सांसो में नयी खुशबू बनो और रूह में तहलील हो जाओ किसी दिन यूं अचानक से मुझे आकर ये समझाओ ये कैसा हाल कर बैठी ये चेहरा ज़र्द सा क्यूँ है ये चेहरे से उलझते गेसुओं की जिंदगी कैसी अगर बेनूर है आँखे तो कोई रौशनी कैसी कभी मैं खिलखिलाती थी किसी मासूम बच्चे सी हमेशा मुस्कुराती थी कभी गुंचा _दहन जैसी 
जो मेरी जान था कल तक वो ख़ुद गाफ़िल हुआ शायद कभी तो कहदे वो आ कर तेरे बिन जी नहीं सकता इसी उम्मीद में अक्सर बिखर कर टूट जाती हूँ नहीं था जिस्म से मतलब मुझे थी रूह से निस्बत नज़र आता नहीं कोई कहीं पर भी तेरे जैसा तस्सवुर जब खयालों में तेरी सूरत बनाता है वो सूरत देखती हूँ मैं न उस में रंग है तेरा न तेरे जिस्म की खुशबू तसव्वुर तो फ़क़त इक अक्स है मुबहम ख्यालों का जो अक्सर टूट जाता है मैं बेबस देखती रहती हूँ झूठे अब्गीनों को जो अक्सर फूट जाते है फलक से कहकशाँ बन कर सितारे टूट जाते हैं sabhi ko yuN to duniya meiN
hazaro'n log milte hai
magar is bheed men mujhko
nazar tum hi nahi aate
tumeh main dhoondti phirti hooN
sehraoN meN gulshan meN
chaman meN or biyabaaN men
jahaN tak roshni sooraj ki pahuNchi he
wahaN tak bhi
wahan tak fiqr ki parwaz pahunchi hai 
jahan tak bhi tumhe dhundha 
nadi ke paniyoin rawan lahro'n mein
tum ho kya?
na jane kyo mujhqsar yaheen ehsaas hota hai
zame'n se ta_falaq nazro'n mek ik ik pal 
tumhe dhudha 

tunheN dhoonda tamannaoN ke
un gustaakh lamhoN meN
sanjoya hai jinhe dil ke nihan khano mein
khud maine 
magar afsos hota he
tumheN pane ki hasrat meN
meN khud ko hi gaNwa baithi
magar tum mil nahi paye
kabhi to aake dheere se miri veeran aankhoN men
koi ik dilnasheeN sa khwab bankar hi sama jao
kabhi to hole hole se meri berabt saaNsoN men
nayi khushbu bano aur rooh mein tehleel ho jao
kisi din yuN achanak se
mujhe aakar ye samjho
ye kaisa haal kar baithi
ye chehra zard sa kyo hai 
ye chehre se uljhte gesuon ki zindgi kaisi 
agar benoor hai aankhe to koyi roshni kaisi 
kabhi main khilkhilati thi kisi masoom bachche si
hamesha muskurati thi kisi ghuncha_dahan jaisi 
jo meri jaan tha kal tak
wo khud gafil hua shayad 
kabhi to keh de wo aakar
tere bin jee nahi sakta 

isi ummid men aksar bikhar kar tut jaati hoon
nahi tha jism se matlab 
mujhe thi rooh se nisbat 
nazar aata nahi koyi
kaheen par bhi tere jaisa 
tasawwur jab khyaalo'n mein 
teri surat banata hai 
wo surat dekhti hoon main 
na us mein rang hai tera 
na tere jism ki khushboo 
taswwur to faqat ik aks hai 
mubham khayalo'n ka 
jo aksar tu jaata hai
main bebas dekhti rahti hoon
jhoothe "AabgeenoN" ko 
jo aksar Fhoot jate hai 
falaq se kahkashan ban kar
sitare Toot jaate hai'n

Sunday, 4 November 2012

मेरी आँखों में जो आंसू है गुहर जैसा है


shab guzeeda hai magar fir bhi sahar jaisa hai
meri aankho mein jo aansu hai guhar jaisa hai 

mulq bantne se bhi haalaat nahi badle hai
haal jo sabka idhar hai wo udhar jaisa hai 

nabz madham hai tawazun mein nahi hai dhadkan 
in dino haam mera zer o zabar jaisa hai 

ghurti rahti hai pinzre ki salakhe mujhko 
ab to mahaoul qafas bhi mere ghar jaisa hai 

 tu mere saath mere gham mein khushi mein hain shreeq 
tujhse rishta ye mera sheer o shkar jaisa hai 

raudati rahti hoon apna hi main lasha hardam 
mere qadmo'n mein jo hai mere hi sar jaisa hai 

tere daaman ki havao'n se bhadak jaayege 
dil ka har zakhm mere dost sharar jaisa hai .(.misra tahah)

misra e tarha tha dushvaar magar fir bhi siya 
pesh to kar hi diya maine hunar jaisa hai 


शब् गुज़ीदा है मगर फिर भी सहर जैसा है 
मेरी आँखों में जो आंसू है गुहर जैसा है 

मुल्क़ बंटने से भी हालात नहीं बदले है'
हाल जो सबका इधर है वो उधर जैसा है 

नब्ज़ मद्धम है तवाज़ुन में नहीं है धड़कन 
इन दिनों हाल मेरा ज़ेर ओ ज़बर जैसा है ..

घूरती रहती है पिंजरे की सलाखे मुझको 
अब तो माहौल ए क़फ़स भी मेरे घर जैसा है ................

तू मेरे साथ मेरे ग़म में ख़ुशी में है शरीक़ 
तुझसे रिश्ता मेरा कुछ शीर ओ शकर जैसा है 

रौंदती रहती हूँ अपनी ही मैं लाशा हरदम 
मेरे क़दमों में जो है मेरे ही सर जैसा है 

तेरे दामन की हवाओं से भड़क जायेगे 
दिल का हर ज़ख्म मेरे दोस्त शरर जैसा है 

मिसरा ए तरहा था दुश्वार मगर फिर भी सिया 
पेश तो कर ही दिया मैंने हुनर जैसा है ................

उसकी के साए में रहती है जिंदगी महफूज़


हमेशा रखती है इंसान को मौत ही महफूज़ 
उसकी के साए में रहती है जिंदगी महफूज़

असीर ए गर्दिश ए अयाम है ये रोज़ ओ शब् 
न कोई दिन रहा कायम न रात भी  महफूज़ 

बहा के ले गया सब सैल ए आब अश्कों का 
नहीं है आँख में अब एक ख्व़ाब भी महफूज़ 

अजब निज़ाम ए गुलिस्तां है बागबां  तेरा 
उजड़ गया है कोई ,हो गया कोई महफूज़ 

न एहतेमाम ए तकद्दुस,न एहतराम ए बहार 
रहेगी कैसे गुलों की शगुफ्तगी महफूज़ 

उजाले बांटता रहता  है जो ज़माने को 
उसी चराग़ के नीचे है तीरगी महफूज़ 


hamesha rakhti hai insaan ko maut he mehfooz
usi ke saaye mein rahti hai zindagi mehfooz
aseer e gardish e ayyam hai ye roz o shab
na koi din raha qayam na raat bhi  mehfooz

baha ke le gaya sab sail e aab ashkoN ka
nahiN hai aaNkh meN ab ek khwab bhi mehfooz

ajab nizaam e gulistaN hai baaghbaaN tera
ujad gaya hai koi, ho gaya koi mehfooz

na ahtimam e taqaddus, na ehtram e bahaar
rahegi kaise guloN ki shaguftagi mehfooz

ujale bant'ta rahta hai jo zamane ko 
usi charag ke neeche hai teergi mehfooz 


वो ज़ख्म रूह के अन्दर है क्या किया जाए

क़दम क़दम यहीं मंज़र है क्या किया जाए 
हर एक शख्स सितमगर है क्या किया जाए 

कभी ये वक़्त से पहले न आएगी हरगिज़ 
क़ज़ा का वक़्त मुक़र्रर है क्या किया जाए 

हमारे अश्क़ उसे मोम कर ना नहीं सकते 
के उसका दिल नहीं पत्थर है क्या किया जाए 

अता न कर सका अब तक कोई मुझे चेहरा 
अजीब जिद्द पे वो आज़र है क्या किया जाए

ये होता जिस्म पे शायद तो भर भी सकता था
वो ज़ख्म रूह के अन्दर है क्या किया जाए

पलट के जाऊ भी आखिर तो मैं कहाँ जाऊ
हर एक सम्त तेरा दर है क्या किया जाए

हमारे वास्ते ग़म है ख़ुशी तुम्हारे लिए
ये अपना अपना मुकद्दर है क्या किया जाए

वी जिसके हाथ रंगे है अवाम के खून से
वो आज कौम का रहबर है क्या किया जाए

उन्देलती ही रही मैं दर्द अपना काग़ज़ पर
ये क़ैद ओ बंद जबाँ पर है क्या किया जाए

कोई वजूद नहीं जिसको ढूढ़ लू मैं सिया
वो शख्स खाक़ का पैकर है क्या किया जाए

qadam qadam yaheen manzar hai kya kiya jaae
har ek shakhs sitamgar hai kya kiya jaae

kabhi ye waqt se pahle na aayegi hargiz
qaza ka waqt muqrrar hai kya kiya jaae

hamare ashq use mom kar nahi sakte
ke uska dil nahi patthar hai kya kiya jaae

ata na kar saka ab tak koyi mujhe chehra
ajeeb zidd pe wo aazar hai kya kiya jaae

ye hota jism pe shayad to bhar bhi sakta tha
wo zakhm rooh ke andar hai kya kiya jaae

palat ke jaau bhi aakhir to main kahan jaau
har ak samt tera dar hai kya kiya jaae

hamare waaste gham hai khushi tumahare liye
ye apna apna muqddar hai kya kiya jaae

wo jiske haath range hai awaam ke khoo'n se
wo aaj qaum ka rehbar hai kya kiya jaae

undelati rahi dard apna kaghaz par
ye qaid o band jabaan par hai kya kiya jaae

koyi vajood nahi jisko dhudh lu main siya
wo shkhs khaq ka paiqar hai kya kiya jaaye 

तू मेरे ज़िस्म का हिस्सा हुआ है

जो मेरा था वो सब तेरा हुआ है 
तू मेरे ज़िस्म का हिस्सा हुआ है 

ख़ुदा अब लाज रखना दोस्ती की 
बड़ी मुद्दत से वो अपना हुआ है

मोहब्बत की नज़र से जब भी देखो 
यक़ीनन ग़ैर भी अपना हुआ है 

ताज्ज़ुब है मेरी खामोशियों का 
ज़माने में बहुत चर्चा हुआ है

खड़ी हूँ लाश पर अपनी मैं ख़ुद ही
मेरा क़द आपसे ऊँचा हुआ है

बुरा कुछ भी नहीं है इस जहां में
हुआ जो कुछ बहोत अच्छा हुआ है

ये गुंचा सिर्फ मुरझाने के डर से
सकूते शाख पर सहमा हुआ है

दिखायेगा हमें वो रास्ता क्या
जो ख़ुद ही राह से भटका हुआ है

बना लेगा ख़ुद अपनी राह बेशक
वो पानी जो सिया बहता हुआ है

jo mera tha wo sab tera hua hai
tu mere zism ka hissa hua hai

khuda ab laj rakhna dosti ki
badi muddat mein wo apna hua hai

mohbbat ki nazar se jab bhi dekha
yaqeenan gair bhi apna hua hai

ta'ajub hai meri khaamoshiyo'n ka
zamaane mein bahot charcha hua hai

khadi hoon lash par apni main khud hi
mera qad aapse uncha hua hai

bura kuch bhi nahi hai is zahan mein
hua jo kuch bahot achcha hua hai

ye guncha sirf murjahne ke dar se
saqoote shakh par sahma hua hai

dikhayega hame wo rasta kya
jo khud he raah se bhatka hua hai

bana lega khud apni raah beshaq
wo pani jo siya bahta hua hai ..

भिखारी है खज़ाना चाहता हैं

tiri qurbat wo pana chahta hain
bikhari hai khzana chahta hain 

jo qatra bhi na paya abhi tak 
samnadar ko sukhana chahta hain 

diye ki aatma hain ye dhuvan jo 
ab apne ghar ko jana chahta hain 

mere bare mein Afwaahen udakar
wo mera qad ghatana chahta hain

wafao'n ki khuli chat par wo ab bhi
patango ko udana chahta hain

ghubare-e-gham zameen-e-dil se utkar
mujhe badal banana chahta hain

hua udne ke qabil jab parinda
naya ik ashiyana chahta hain

तिरी कुर्बत वो पाना चाहता हैं
भिखारी है खज़ाना चाहता हैं

जो क़तरा भी न बन पाया अभी तक
समंदर को सुखाना चाहता हैं

दिए की आत्मा का हैं धुवाँ जो
अब अपने घर को जाना चाहता है

मेरे बारे में अफवाहें उड़ा कर
वो मेरा क़द घटाना चाहता हैं

वफाओं की खुली छत पर वो अब भी
पतंगों को उडाना चाहता है

गुबार ए ग़म ज़मीं ए दिल से उठ कर
मुझे बादल बनाना चाहता हैं

हुआ उड़ने के काबिल जब परिंदा
नया इक आशियाना चाहता है