Wednesday, 28 November 2012

उस ज़मीं पर भी हम संभलते हैं


जिसपे जाकर सभी फिसलते हैं 
उस ज़मीं पर भी हम संभलते हैं 

तेरी यादों के गुमशुदा साये 
धूप ढलने पे ही निकलते हैं 

इत्तेफ़ाक़न हमें वो मिल जाये 
आरजू लेके हम निकलते हैं 

इनसे बहती हैं राख ख्वाबों की
आँख से अश्क़ जब निकलते हैं

मेरे बच्चे ज़हीन है इतने 
ये खिलौनों से कब बहलते हैं 

युहीं बहती है वक़्त की नद्दी 
हम फ़क़त कश्तियाँ बदलते हैं 

तंज़ खुद पे ही कर किया जाए 
आइये ज़ायेका बदलते हैं 

आँख जब मूंदती  हूँ तो दिल में 
तेरी यादो के दीप जलते हैं

आंधियां जो दिए जलाती है 
वो दिए ज़ुल्मतों को खलते है 

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