Sunday, 4 November 2012

वो ज़ख्म रूह के अन्दर है क्या किया जाए

क़दम क़दम यहीं मंज़र है क्या किया जाए 
हर एक शख्स सितमगर है क्या किया जाए 

कभी ये वक़्त से पहले न आएगी हरगिज़ 
क़ज़ा का वक़्त मुक़र्रर है क्या किया जाए 

हमारे अश्क़ उसे मोम कर ना नहीं सकते 
के उसका दिल नहीं पत्थर है क्या किया जाए 

अता न कर सका अब तक कोई मुझे चेहरा 
अजीब जिद्द पे वो आज़र है क्या किया जाए

ये होता जिस्म पे शायद तो भर भी सकता था
वो ज़ख्म रूह के अन्दर है क्या किया जाए

पलट के जाऊ भी आखिर तो मैं कहाँ जाऊ
हर एक सम्त तेरा दर है क्या किया जाए

हमारे वास्ते ग़म है ख़ुशी तुम्हारे लिए
ये अपना अपना मुकद्दर है क्या किया जाए

वी जिसके हाथ रंगे है अवाम के खून से
वो आज कौम का रहबर है क्या किया जाए

उन्देलती ही रही मैं दर्द अपना काग़ज़ पर
ये क़ैद ओ बंद जबाँ पर है क्या किया जाए

कोई वजूद नहीं जिसको ढूढ़ लू मैं सिया
वो शख्स खाक़ का पैकर है क्या किया जाए

qadam qadam yaheen manzar hai kya kiya jaae
har ek shakhs sitamgar hai kya kiya jaae

kabhi ye waqt se pahle na aayegi hargiz
qaza ka waqt muqrrar hai kya kiya jaae

hamare ashq use mom kar nahi sakte
ke uska dil nahi patthar hai kya kiya jaae

ata na kar saka ab tak koyi mujhe chehra
ajeeb zidd pe wo aazar hai kya kiya jaae

ye hota jism pe shayad to bhar bhi sakta tha
wo zakhm rooh ke andar hai kya kiya jaae

palat ke jaau bhi aakhir to main kahan jaau
har ak samt tera dar hai kya kiya jaae

hamare waaste gham hai khushi tumahare liye
ye apna apna muqddar hai kya kiya jaae

wo jiske haath range hai awaam ke khoo'n se
wo aaj qaum ka rehbar hai kya kiya jaae

undelati rahi dard apna kaghaz par
ye qaid o band jabaan par hai kya kiya jaae

koyi vajood nahi jisko dhudh lu main siya
wo shkhs khaq ka paiqar hai kya kiya jaaye 

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