Sunday, 4 November 2012

भिखारी है खज़ाना चाहता हैं

tiri qurbat wo pana chahta hain
bikhari hai khzana chahta hain 

jo qatra bhi na paya abhi tak 
samnadar ko sukhana chahta hain 

diye ki aatma hain ye dhuvan jo 
ab apne ghar ko jana chahta hain 

mere bare mein Afwaahen udakar
wo mera qad ghatana chahta hain

wafao'n ki khuli chat par wo ab bhi
patango ko udana chahta hain

ghubare-e-gham zameen-e-dil se utkar
mujhe badal banana chahta hain

hua udne ke qabil jab parinda
naya ik ashiyana chahta hain

तिरी कुर्बत वो पाना चाहता हैं
भिखारी है खज़ाना चाहता हैं

जो क़तरा भी न बन पाया अभी तक
समंदर को सुखाना चाहता हैं

दिए की आत्मा का हैं धुवाँ जो
अब अपने घर को जाना चाहता है

मेरे बारे में अफवाहें उड़ा कर
वो मेरा क़द घटाना चाहता हैं

वफाओं की खुली छत पर वो अब भी
पतंगों को उडाना चाहता है

गुबार ए ग़म ज़मीं ए दिल से उठ कर
मुझे बादल बनाना चाहता हैं

हुआ उड़ने के काबिल जब परिंदा
नया इक आशियाना चाहता है 

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