Friday, 16 September 2016

sarswati vandna

जय मात, वीणा वादिनी, उद्धार कर हूँ शरण तेरी अब तू , अंगीकार कर तू बुद्धि, ज्ञान प्रदायनी माँ शारदे सबके हृदय में ज्ञान का विस्तार कर दीपक जलें मन में, अटल विश्वास के जगतारिणी भव से हमें भी पार कर हम सत्य, सयंम, त्याग का जीवन चुने मन में दया और प्रेम का संचार कर हम स्वाभिमानी बन जियें सम्मान से इस याचना को माँ मेरी स्वीकार कर हो हर हृदय में भावना अनुराग की माँ शारदे करुणामयी संसार कर तम से हमारे पथ कभी कलुषित न हो सबके हृदय आलोक का भंडार भर इस कंठ से सरिता बहे संगीत की वीणा से तू ऐसी ज़रा झंकार कर

Monday, 29 August 2016

जो दिल दुखाये वो किस्सा तमाम करना है

सुकूँ से जीने का फिर इंतज़ाम करना है 
जो दिल दुखाये वो किस्सा तमाम करना है

लगा रहे हैं जो दुनिया में आग नफरत की 
हमें तो उनका ही जीना हराम करना है 
 
जो नफ़रतों की फ़ज़ाओं में साँस लेते हैं 
मोहब्बतों का उन्हें भी  गुलाम करना है 

जो फूट डालना चाहेंगे  भाईचारे में 
उन्हें तो दूर से  राम राम करना हैं 

बहुत से लोग जिन्हें दोस्ती के परदे में हमारे ख़्वाब हमी पर हराम करना है

जो अम्नो चैन का पैग़ाम दे ज़माने को हमेशा उनका हमें एहतराम करना है

हमें सभी से रवादारियां निभाते हुए 
हर एक शख्स को झुक कर सलाम करना है 




Saturday, 13 August 2016

योमे आज़ादी के मौके पर एक अदना सी काविश

किस तरह कहदे की अब आज़ाद हम 
शाद होना था मगर नाशाद है हम 

जश्न ए आज़ादी पे क्या खुशियां मनाये 
 खोखली होती हुई  बुनियाद है हम 

ख़ौफ़ के साये में कैसे जी रहे हैं 
किस तरह कहदे  अभी आबाद है हम 

देशभक्तों ने किये बलिदान थे जो पूछते है आज वो क्या याद हैं हम।


लुट रही  हैं इज़्ज़ते  बेटी बहन की 
अनसुनी जैसे कोई फ़रियाद है हम 

बेटियों को फैसलों का हक़ नहीं  हैं 
क़ैद रक्खा हैं उन्हें सय्याद है हम 

लड़ रहे हैं मज़हबों के नाम पर सब 
फूट आपस में हैं और बर्बाद है हम 

योमे आज़ादी के मौके पर एक अदना सी काविश

किस तरह कहदे की अब आज़ाद हम 
शाद होना था मगर नाशाद है हम 

जश्न ए आज़ादी पे क्या खुशियां मनाये 
 खोखली होती हुई  बुनियाद है हम 

ख़ौफ़ के साये में कैसे जी रहे हैं 
किस तरह कहदे  अभी आबाद है हम 

देशभक्तों ने किये बलिदान थे जो पूछते है आज वो क्या याद हैं हम।


लुट रही  हैं इज़्ज़ते  बेटी बहन की 
अनसुनी जैसे कोई फ़रियाद है हम 

बेटियों को फैसलों का हक़ नहीं  हैं 
क़ैद रक्खा हैं उन्हें सय्याद है हम 

लड़ रहे हैं मज़हबों के नाम पर सब 
फूट आपस में हैं और बर्बाद है हम 

Saturday, 2 July 2016

नाते पाक

नाते पाक
********
दिल मेरा नूरे अक़ीदत से मुनव्वर हो जाय।
नात जब जब मैं पढ़ूँ पाक मेरा दिल हो जाय।
रौशनी इल्म की भर जाय मिरे सीने में,
आप के दर से ये तौफ़ीक़ मयस्सर हो जाय।
आप चाहें तो पहाड़ों को भी कर दें ज़र्रे,
और अगर चाहें तो क़तरा भी समन्दर हो जाय।
रौज़ये पाक मैं देखूँ ये कहाँ मेरा नसीब,
नाम लूँ आपका और क़ल्ब मुनव्वर हो जाय।
मुझको आजाये अक़ीदत में झुकाना सर को
आपकी चश्मे करम मेरा मुक़द्दर हो जाय।
ख़ाक आ जाय मयस्सर जो मदीना की मुझे,
रेत का ज़र्रा मेरे वास्ते गौहर हो जाय।
गर्मिये वक़्त 'सिया' तुझको न छू पायेगी,
मेहरबाँ तुझपे अगर साक़ीये कौसर हो जाय।
"सिया सचदेव"
NAAT E PAAK
Dil mera noor e aqeedat se munnawar ho jaaye
naat jab jab main padhu pak mera dil ho jaaye
Roshni ilm ki bhar jaay meray seenay mein
Aap ke dar se ye taufeeq mayyasar ho jaaye
aap chahe to pahado ke bhi kar den zarre
aur agar chahen to qatra bhi samandar ho jaaye
Roza e paak ko dekhu ye kaha mera naseeb
Naam Loon aapka or Qalab munnawar ho jaye
mujhko aa jaaye aqeedat mein jhukana sar ko
Aap ki chashm e karam mera muqaddar ho jaaye
khaak ho jaay muyassar jo Madinay ki mujhay
Rait ka zrra meray waste gohar ho jaaye
garmiye waqt siya tujh ko na chhu paayegi
mehrbaan tujhpe agar saakiye kausar ho jaaye
siya sachdev

Monday, 20 June 2016

झाँक कर देखें मेरी आँखों की ये गहराइयाँ

झाँक कर देखें मेरी आँखों की ये गहराइयाँ
इन में आयेंगी नज़र बस आपकी परछाइयाँ
सिर्फ पीछे मुड़ के देखा है ज़रा सा उम्र ने
हसरतें लेने लगी हैं आज फिर अंगड़ाइयाँ
दिल का ये आलम अभी से क्या है ये मत पूछिये
क्या करेगी सुब्ह तक ये शाम की तन्हाईयाँ
तू गुलिस्तां तू बहाराँ तू ही हैं बादे सबा
फूल ख़ुश्बू रंग क्या हैं सब तेरी परछाइयाँ
इश्क़ में जाता है दिल होशो ख़िरद ताबो तवां
और मिलता भी है क्या ? तन्हाईयाँ रुसवाईयाँ
दर्द फिर से दे रहा है मेरे दिल पर दस्तकें
ऐसा लगता हैं की फिर चलने को है पुरवाइयाँ
jhank kar dekhe'n meri aankho ki ye Gehraiyan
in mein aayegi nazar bus aapki parchaiyan
Sirf peechhe mud ke dekha hai zara sa umr ne
hasraten lene lagi hain aaj phir Angdaiyan
dil ka ye aalam abhii se hai ki kuch mat puchiye
kya karegi subh tak ye Shaam Ki Tanhaiyan
tu gulistaN tu bahaarN tu hi hai baade saba
phool khushbu rang kya haiN/sab teri parchaiyaaN
ishq me jata hai dil hosh o khirad tab o tawaaN
aur milta bhi hai kya ? tanhaiyaN ruswaiyaN
Dard phir se de raha hai mere dil par dastaken
aisa lagta hai ki phir chalne ko 

ik punjabi ghazal


Terian yaadan ne dhaya qahar , das main kee Karaa'n?
faaye lag javaan ki khava zehr das main ki Karaan
Hun kisay v than te teray baajo dil lgda nahi
chadh gaya ankha,n da teri sehr das main ki Karaa'n
Par je honday pohnch jandi main udari mar ke
Tu vasaya door jake shahr das main ki karaa'n
ho gaya sunjha banera kaaN vi hun nayi bolde
rovan kulavan hun atthay pehr das main ki kraa'n
Vekh lai tu aake aape haal hoya ki mera
dil to uthdi dard di ik lahar das main ki karaa'n
تیریاں یاداں نے ڈھایا قہر، دسّ میں کی کراں
پھائے لگّ جاواں کے کھاواں زہر دسّ
میں کی کراں
ہن کسے وی تھاں تیرے باجھوں دل نئیں لگدا
چھڈّ گیا اکھاں دا تیری سحر دسّ میں کی کراں
پر جے ہندے پُہنچ جاندی میں اڈاری مار کے
توں وسایا دور جا کے شہر دسّ میں کی کراں
ہو گیا سنجا بنیرا کاں وی ہن نئیں بولدے
روواں، کُرلاواں ہن اٹھے پہر دس میں کی کراں
ویکھ لے توں آکے آپے حالَ ہویا کی میرا
دل تو اٹھدی درد دی اک لہر دس میں کی کراں
ਤੇਰੀਆਂ ਯਾਦਾਂ ਨੇ ਢਾਇਆ ਕਹਿਰ, ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾ ?
ਫਾਏ ਲੱਗ ਜਾਵਾਂ ਕੇ ਖਾਵਾਂ ਜ਼ਾਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਹੁਣ ਕਿਸੇ ਵੀ ਥਾਂ ਤੇਰੇ ਬਾਝੋਂ ਦਿਲ ਨਹੀ ਲਗਦਾ
ਛੱਡ ਗਿਆ ਅੱਖਾਂ ਦਾ ਤੇਰੀ ਸਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਪਰ ਜੇ ਹੁੰਦੇ ਪੋਹੰਚ ਜਾਂਦੀ ਮੈਂ ਉਡਾਰੀ ਮਾਰ ਕੇ
ਤੂੰ ਵਸਾਇਆ ਦੂਰ ਜਾ ਕੇ ਸ਼ਹਿਰ ਦੱਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਹੋ ਗਿਆ ਸੁੰਜਾ ਬਨੇਰਾ ਕਾਨ ਵੀ ਹੁਣ ਨਹੀ ਬੋਲਦੇ
ਰੋਵਾਂ ਕੁਰਲਾਵਾਂ ਹੁਣ ਅਠੇ ਪਹਿਰ ਦਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਵੇਖ ਲੈ ਤੂੰ ਆਕੇ ਆਪੇ ਹਾਲ ਹੋਇਆ ਕੀ ਮੇਰਾ
ਦਿਲ ਤੋ ਉਠਦੀ ਦਰਦ ਦੀ ਇਕ ਲਹਿਰ ਦਸ ਮੈਂ ਕੀ ਕਰਾਂ
ਸੀਆ ਸੱਚਦੇਵ

Thursday, 26 May 2016

ज़ह्र को जो दवा समझता है

ज़ह्र को जो दवा समझता है
वो मरज़ को शिफ़ा समझता है
क्या उदासी है मेरे चेहरे पे
मेरा दुःख आइना समझता है
कितनी तनहा हूँ मैं हुजूम में भी
तू कहाँ जानता समझता है
हूक उठती है मेरे सीने से
और वो क़हक़हा समझता है
जिससे वाबस्ता हूँ मैं शिद्दत से
क्या वो हर्फ़ ए वफ़ा समझता है
अस्ल में शेर कहने वाला ही
दर्द तख़लीक़ का समझता है
कोई देखे तो अंदरून उसका
खुद को जो पारसा समझता है
जाने क्या क्या गुमान हैं उसको
जाने वो ख़ुद को क्या समझता है
नाव को किस जगह डुबोना हैं
ये मेरा नाख़ुदा समझता है
उसकी मन्ज़िल हूँ मैं मगर ज़ालिम
वो फ़क़त रास्ता समझता है
राय उसको सिया मैं देती हूँ
जो मेरा मश्वरा समझता है
siya

Friday, 13 May 2016

ghazal रूबरू जब आ गया हैआईना

रूबरू जब आ गया हैआईना
खुद से ही मिलवा गया है आईना
वहशते बेचैनियाँ हैरानियाँ
देख कर घबरा गया है आईना
एक लम्हा लिख गया चेहरे पे कुछ
मुददतों देखा गया है आईना
अस्ल सूरत भी नज़र आती नहीं
इस क़दर धुँधला गया है आईना
झूठ के चेहरे की रंगत उड़ गयी
असलियत दिखला गया है आईना
दिल के जज़्बों की ख़ुदाया ख़ैर हो
संग से टकरा गया है आईना
सबके चेहरों पर बनावट की अदा
आज धोखा खा गया है आईना
साफ़गोई की मिली है ये सज़ा
आये दिन तोड़ा गया है आईना
rubroo jab aa gaya hai aaina
khud se hi milva gaya hai aaina
wehshate;n bechaniyan hairaniyan
dekh kar ghabra gaya hai aaina
ek lamha likh gaya chehre pe kuch
muddton dekha gaya hai aaina
asl surat bhi nazar aati nahi
is qadar dhundhla gaya hai aaina
jhooth ke chehre ki rangat ud gayi
asliyat dikhla gaya hai aaina
dil ke jazbo ki khudaya khair ho
sang se takra gaya hai aaina
sabke chehro par banavat ki ada
aaj dhokha kha gaya hai aaina
saafgoyi ki mili hai ye saza
aaye din toda gaya hai aaina

Friday, 6 May 2016

श्रमिक दिवस पर लिखी एक नज़्म


तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बदहाली का जीवन जीने पर मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
झुलसा देने वाली भीषण गर्मी हो
हाड़ कंपाने वाली चाहे सर्दी हो
दर-दर की ठोकर खाने को हैं मजबूर .
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
भूख प्यास पीड़ा को वो क्या समझेंगे
मजबूरों के दुःख को वो क्या जानेंगे
बड़ी बड़ी बाते कर के जो हैं मशहूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बेबस और बेहाल यहाँ पर इतने हैं
जल संकट के कारण जाने कितने हैं
दूषित पानी पीने पर भी हैं मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
पड़ी आपदा फसलें सब बर्बाद हुई
उस बेबस से कहाँ कहाँ फ़रियाद हुई
आत्महत्या करने पर जो है मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
सिसक--सिसक कैसे जीवन जी पायें
कभी चैन के पल दो पल हम भी पायें
इसी आस में बैठे हैं जो थक कर चूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
siya

Saturday, 2 April 2016

जीवन है काँटों का बिछौना
कितना मुश्किल इस पर सोना
उसने जब जी चाहा खेला
दिल को मेरे जान खिलौना
जाओगे या साथ रहोगे !
कुछ तो अपना मूंह खोलो ना !
ज़ालिम प्यार का यहीं नतीजा
दुःख पाना है सुख है खोना
आँसू , आहें और तन्हाई
हिज्र की शब में और क्या होना
ख़ुद ही रस्ता कट जाएगा
तुम भी मेरे साथ चलो ना !
मुझसे एक सहेली बोली
दिल में ख़्वाहिश को मत बोना
सिया ढूँढती हो क्यों कांधा
अच्छा होगा तन्हा रोना
siya

Friday, 25 March 2016

गणतंत्र दिवस की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनायें

तिरंगा मेरे भारत का रहे ऊँची उड़ानों में
ये लहराता नज़र आये हमेशा आसमानो में

वतन के नाम पर जो हँसके चढ़ जाते हैं सूली पर
ये जज़्बा ये जुनूँ मिलता है भारत के जवानो में

भगत सिंह,चंद्रशेखर और जो अश्फ़ाक़ ओ बिस्मिल थे
भरा था हौसला क़ुर्बानियों का उन जवानो में

मिला था खून जिनका ख़ाक़ में इस देश की
चमकते हैं सितारे बन के वो अब आसमानो में

जवान बेटा वो जिसका लौट कर आया न सरहद से
अभी तक उसके आँसू चुभ रहे है माँ के शानो में

यहीं अहले क़लम पैग़ाम देते है मोहब्बत का
सभी ग़ज़लों में नज़्मों में सभी गीतों में गानो में

tiranga mere bharat ka rahe unchi udaanon men
ye lahrata nazar aaye hamesha aasmanao mein

vatan ke naam par jo hanske chadh jaate hain sooli par
Ye jazba ye junoon milta hain bharat ke jawano mein

Bhagat Singh, Chandrashekhar,aur jo Ashfaqallah the
bhara tha hausla qurbaniyon ka in deewano mein

mila tha khoon jinka khaaq mein is desh ki khatir
chamakte hai sitaare ban ke wo ab aasmano mein

jawan beta wo jiska laut kar aaya na sarhad se
Abhi tak uske ansoo chubh rahe hain maa ke shaanon men

yaheen ahle qalam paigham dete hai mohbbat ka
sabhi ghazlo'n mein nazmo'n mein sabhi geeto mein gano mein

दोहे

           


जीवन रूपी नाव को साँसों की है आस 
जाए जब  संसार से कुछ न होगा पास 

जो जीवन बेरंग सा दिखता तुम्हे उदास 
उस में भर दो प्रेम के रंगो का उल्लास 

अंतर्मन में झाँक ले  जहाँ प्रभु का वास 
 उसके सिमरन से मिटे जनम जनम की प्यास 

ए मनवा तू ही बता काहे रहे उदास 
तुझ पर तो रहती सदा रब की दृष्टि ख़ास 

कण कण में अनुभव हुआ  जब से तेरा वास 
रोम रोम में बस गया  श्रद्धा और विश्वास





Wednesday, 16 March 2016

geet

किस से प्रीत करूँ मैं बोलो किसको मीत लिखूँ
शब्द अधूरे से हैं मेरे कैसे गीत लिखूँ
जब कोई तस्वीर बनाऊँ अक्स बिखरता जाए
जो भी रंग भरु मैं उसमें वही उतरता जाए 
हार मान लूँ इसको अपनी या फिर जीत लिखूँ
किस से प्रीत करूँ मैं बोलो किसको मीत लिखूँ
सीख न पायी क्यों अब तक मैं इस दुनिया के ढंग
समझ न पाऊँ कौन है बैरी कौन है मेरे संग
मैं नादान भला दुनिया की कैसे रीत लिखूँ
किस से प्रीत करूँ मैं बोलो किसको मीत लिखूँ
अपनी परछाईं से अक्सर डर जाती हूँ मैं
देखके बेहिस दुनिया घुट कर मर जाती हूँ मैं
अपनी हालत से घबराकर मैं भयभीत लिखूं
किस से प्रीत करूँ मैं बोलो किसको मीत लिखूँ
kis se preet karu'n main bolo kisko meet likhu'n
shadb adhure se hain mere kaise geet likhu'n
jab koyi tasweer banau, aks bikharata jaaye
jo bhi rang bharu'n main usmein wahi utarata jaaye
haar maanlu isko apni ya phir jeet likhu'n
kis se preet karu'n main bolo kisko meet likhu'n
seekh na paayi kyo ab tak main is duniya ke dhangh
samajh n paayi kaun hai bairi kaun hai mere sang
main nadaan hoon duniya teri kaise reet likhu'n
kis se preet karu'n main bolo kisko meet likhu'n
apni parchayi se aksar dar jaati hoon main
dekh ke behis duniya ghut kar mar jaati hoon main
apni halaat se ghabarakar main bhaibheet likhun
kis se preet karu'n main bolo kisko meet likhu'n
siya
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ghazal

छोड़ के अपनों को जो आई 
उसकी क़द्र न की हरजाई
जिसने दुनिया तेरी बसाई
उसमें ढूंढ़ी सिर्फ बुराई
मेहबूबा पर पढ़े क़सीदे
घर की ज़ीनत नज़र न आई
तूने अपनी ऐश की ख़ातिर
अपनी दौलत खूब लुटाई
और किफ़ायत करके उसने
बरती तेरी नेक कमाई
लाज का घूंघट काढ के जिसने
दोनों घर की लाज बढ़ाई
जिसने जीवनसाथी बनकर
मरते दम तक खूब निभायी
कसे चुटकले सबने उसपर
सबने उसकी हँसी उड़ाई
chhor ke apno ko jo aayi
uski qadr n ki harjaayi
jisne duniya teri basayi
usmein dhudhi sirf buraayi
mehbooba par padhe qaseede
ghar ki zeenat nazar n aayi
tune apni aish ki khaatir
apni daulat khoob lutaayi
aur qifayat karke usne
barti teri nek kamaayi
laaj ka ghunght kaadh ke jisne
dono ghar ki laaj badhayi
jisne jeevan saath ban kar
marte dam tak khoob nibhayi
kase chutkale sabne us par
sabne uski hansi udaaayi

Tuesday, 15 March 2016

रास आने लगी असीरी भी

छोड़ी जिसके लिए अमीरी भी
रास आई न वो फ़क़ीरी भी
क़ैद से हम रिहाई क्या मांगे
दिल को भाने लगी असीरी भी
मेरी फितरत में दोनों शामिल हैं
बादशाही भी और फ़क़ीरी भी
चंद सांसे भी कब ख़रीद सके
काम आई कहाँ अमीरी भी
काट दे तेरी जुस्तजू में सिया
ये जवानी भी और पीरी भी
chori jiske liye ameeri bhi
raas aayi n wo faqeeri bhi
qaid se hum rihaai kya mange
dil ko bhane lagi aseeri bhi
meri fitrat mein dono shamil hain
baadshahi bhi aur faqeeri bhi ..
chand sanse bhi kab khreed sake
kaam aayi nahi ameeri bhi
kaat de teri justjoo mein siya
ye jawani bhi aur peeri bhi
siya

Monday, 29 February 2016

punjabi ghazal

बापू वीरा ते माँ प्यारी
सारे टुर गए वारी वारी
रब दा भाना मनना पैंदा
दिल ते रख के पत्थर भारी
दिल न होर दुखाओ साडा
अग्गे घट हां दुःखा दी मारी
सह सह के दिल हो गया होला
हुन मैं हारी, हुन मैं हारी
ऐस दुनिया विच जी नईयों लगदा
कद आनी ये साडी वारी
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Thursday, 18 February 2016

ghazal

तू हक़ीक़त से निकल कर दास्ताँ हो जाएगा
तब ज़माने पर तेरा जज़्बा अयाँ हो जाएगा

तुम सुलगते ही रहोगे हिज्र में मेरे सदा
और ये ख़्वाबों भरा आँगन धुवाँ हो जायेगा

छोड़ जाऊँगी तुम्हारा हँसता बसता ये जहाँ
ये जो इक घर है कभी सूना मकाँ हो जाएगा

मैं ज़मीं ज़ादी हूँ रिश्ता है मेरा इस ख़ाक़ से
क्या ख़बर थी मेरा दुश्मन आसमाँ हो जाएगा

तू कहाँ ईमान लाने पर तुली है ए सिया


''ऐसी बातो से वो क़ाफिर बदगुमां हो जाएगा ''

Sunday, 31 January 2016

नज़्म -मासूम सी गुड़िया



वो इक मासूम सी नन्ही सी गुड़िया
जिसे हैवानियत ने नोच डाला
दरिंदो शर्म तुमको क्यों न आई
तुम्हारे घर भी होगी माँ की जाई
उसे शर्मिन्दगी महसूस होगी
दरिन्दा जिसका तुम जैसा है भाई


तुम्हारे जन्म पर धिक्कार नीचो
पड़े तुम पर ख़ुदा की मार नीचो
जो तुमने वहशीपन का खेल खेला
किसी मासूम ने ये कैसे झेला
गिद्धों की तरह उसको नोच डाला
हवस ने कर लिया मुंह अपना काला
बना कर मौत का उसको निवाला


कोई मज़लूम को न यूँ सताये
किसी पर भी न ऐसा वक़्त आये
हुआ हैं ज़ुल्म वो मासूमियत पर
सुने तो आत्मा भी कांप जाए
हमारी बच्चियों को ए ख़ुदाया
हवस के इन दरिंदो से बचाये

wo ik masoom si nanhi si gudiya
jise hawaniyat ne noch daala
darindo shrm tumko kyo n aayi
teri ghar bhi to hogi maa ki jaayi
use sharmindgi mehsoos hogi
darinda jiska tum jaisa hai bhai

tumahare janm par dhikkar neechon
pade tum par khuda ki maar neecho
jo tumne washipan ka khel khela
kisi masoom ne ye kaise jhela
ghidho.N ki tarah usko noch daala
hawas ne kar liya munh apna kaala
bana kar maut ka usko niwala

koyi mazloom ko n yun sataye
kisi par bhi na aisa waqt aaye
hua hai zulm wo masumiyat par
sune to aatma bhi kamp jaaye
hamari bachiyon ke aye khudaya
hawas ke in darindo'n se bachaye

siya

Sunday, 24 January 2016

नुमाईश वो जो इतनी कर रहा है
तो क्या गुमनामियों से डर रहा है
भले पिंजरे में हैं ये जिस्म मेरा
मगर दिल तो उड़ाने भर रहा हैं

बहुत औरों की साँसे जी चुकी मैं
मेरे अंदर का इन्सां मर रहा है

रही है दरबदर ये तो हमेशा
कभी औरत का कोई घर रहा है

जुदा होने पे माइल हो गया अब
वफ़ा का जो कभी पैकर रहा है

निकलता ही नहीं अब मेरे दिल से
मेरी आँखों में जो दम भर रहा है

जलाती क्या ग़मों की धूप मुझको
तेरा साया मेरे सर पर रहा है

कोई तो होगी उसमें खासियत जो
ज़माना आज उसपे मर रहा है

नहीं साबित हुआ जुर्मे मोहब्बत
यही इलज़ाम मेरे सर रहा है

siya