Sunday, 31 March 2013

दर्द दिल में रहा है निहाँ देर तक

वो सुनाते रहे दास्ताँ देर तक 
दर्द  दिल में रहा है निहाँ देर तक 

जब गले मिल न पाया ज़मीं से कभी
खूब रोया हैं फिर आसमां देर तक

याद रखने की सच को ज़रूरत नहीं
झूठ को मिल न पायी अमाँ देर तक

घर से निकले है हम आंसुवों की तरह
मुड़ के देखा नही आशियाँ देर तक

गर्दिश ए वक़्त छू भी न पाया मुझे
रोज़ करती हूँ तैयारियाँ देर तक

छावं दिल को सकूं दे न पाई सिया
धूप रहने लगी है यहाँ देर तक

wo sunate rahe daasta.n der tak
dard dil mein raha hai niha'n der tak

jab gale mil na paaya zameen se kabhi
khoob roya hain fir aasmaa'n der tak

yaad rakhne ki sach ko zarurat nahi
jhooth ko mil na payi amaa'n der tak

ghar se nikle hai hum aansuvon ki tarah
mud ke dekha nahi aashiyaa'n der tak

gardishen waqt chhu bhi na paye mujhe
roz karti hoon taiyariya'n der tak

chavn dil ko sakoon de na paai siya
dhoop rahne lagi hai yahan der tak

Saturday, 30 March 2013

ज़र्रे ज़र्रे में तेरी ख़ुशबू नज़र आने लगे




बर्ग में गुल में शज़र में तू नज़र आने लगे 
ज़र्रे ज़र्रे में तेरी ख़ुशबू नज़र आने लगे 

वो जो करता था कभी इमदाद सारे शहर की 
उसके शानों पर तिरे बाज़ू नज़र आने लगे 

आपकी खामोशियों में आपके इनकार में 
अब मुझे इक़रार के पहलू नज़र आने लगे 

मैंने जब भी आईना देखा तो मुझको यूं लगा 
मेरी सूरत में ही जैसे तू नज़र आने लगे 

इससे बढ़ कर और क्या होगी मोहब्बत की दलील 
तेरी आँखों में मेरे आँसू नज़र आने लगे 

आज तक तो बात बन जाने की कुछ उम्मीद थी 
अब मगर हालात बेक़ाबू नज़र आने लगे 

ये निगाह ए शौक़ इतनी मोतबर तो हो"सिया" 
तेरा ही चेहरा मुझे हरसूं नज़र आने लगे 

barg mein gul mein shazar mein tu nazar aane lage 
zarre zarre mein teri khushboo'n nazar aane lage 

wo jo karta tha kabhi imdaad sare shahar ko 
uske shano par tire bazu nazar aane lage 

aapki khamoshiyon mein aapke inqaar mein 
ab mujhe iqraar ke pahlu nazar aane lage ..

maine jab bhi aaina dekha to mujhko yuun laga 
meri surat mein hi jaise tu nazar aane lage ..

isse badh kar aur kya hogi mohbbat ki daleel 
teri anakho mein mere aansu nazar aane lage ...

ajj tak to baat ban jaane kuch ummed thi 
ab magar haalat beqabu nazar aane lage

ye nigah e shauq itni motbar to ho siya 
tera hi chehra mujhe harsoo'n nazar aane lage...

siya

Saturday, 23 March 2013

अना पे वार न करती तो और क्या करती



हद्दों को पार न करती तो और क्या करती 
अना पे वार न करती तो और क्या करती 

नहीं था दुनिया में कोई भी चाहने वाला 
मैं खुद से प्यार न करती तो और क्या करती 

बड़े ही शौक़ से खायी थी उसने सर की कसम 
मैं ऐतबार न करती तो और क्या करती 

मुझे जो घर से मिले है उन्ही उसूलों पर
मैं जां_निसार न करती तो और क्या करती

किस ऐतबार से उसने कहा था आऊंगा
मैं इंतज़ार न करती तो और क्या करती

सिया फ़िराक़ में है लोग बस कमी ढूंढे
कलम को धार न करती तो और क्या करती ....

Hado'n ko paar na kartee to aur kya kartee,
Anaa pe' waar n kartee to aur kya kartee.

nahi'n tha duniya mein koyi bhi chahne wala
Main tujh se pyaar n kartee to aur kya kartee...

bade hi shuoq se khayi thi usne sar ki kasam
Main aitbaar n kartee to aur kya kartee.....

Mujhe jo ghar se mile the unhee'n usoolo'n par
Main jan'nisaar n kartee to aur kya kartee?

kis aitbaar se usne kaha tha aaunga
Main intizaar n kartee to aur kya kartee.

siya firaq mein hain log bus kami dhundhe
kalam ko dhaar na karti to aur kya karti

siya

मनाना तब ख़ुशी जब हम न होंगे

मेरे मरने पे भी मातम न होंगे 
मनाना तब ख़ुशी जब हम न होंगे 

वफ़ादारी का दावा तुम न करना 
दिए सदमे जो तुमने कम न होंगे 

ग़लतफ़हमी यूहीं चलती रहगी 
दिलों के फ़ासले भी कम न होंगे 

सितमगर है वो इतना जानते है 
के हम उनसे कभी बरहम न होंगे

दिलों में ग़र न पाले कोई नफ़रत
किसी घर में कभी मातम न होंगे

मिलेंगे यूं कई हमदर्द तुमको
मगर हम जैसे वो हमदम न होंगे

कोई उनका यकीन कैसे करेगा
जो अपने क़ौल पे क़ायम न होंगे ...

ग़मों से अब सिया घबराना कैसा
ये मेरे हौसले अब कम न होंगे

Mere marne pey bhi matam na hongey
manana tab khushi jab hum na hongey

wafadari ka dawa tum na karna
diye sadme jo tumne kam na honge

ghalat fahmi yunhi chalti rahegi
dilon k fasley bhi kam na hongey

sitamgar hai wo itna jante hain
Ke hum unse kabhi barham na honge

dilon mein gar na paley koi nafrat
Kisi ghar mei kabhi matam na honge

milenge yoon kayi humdard tumko
magar hum jaise wo humdam na honge

koyi unka yakeen kaise karega
jo apne qaul pe qayam na honge

ghamoN se ab siya ghabrana kaisa
ye mere housle ab kam na honge

वो उंगुलियों पे हर एक दिन शुमार करता है

बिछड़ के मुझसे मेरा इंतज़ार करता है 
वो उंगुलियों पे हर एक दिन शुमार करता है 

बिछा दिया मिरी राहों में अपना दिल तूने
ये काम वो है जो इक जाँ _निसार करता है

वो दुश्मनों के इरादों को भांप कर उन पर
बड़े सधे हुए हाथो से वार करता है

कोई सितारा ए सहरी है या मेरी यादे
कोई तो है जो उसे बेक़रार करता है

उबूर करता है हर इक भंवर को तेरा ख्याल
बगैर नाव के दरिया को पार करता है

सिया मैं जान भी दे दू तो इससे क्या होगा
वो दोस्तों में मुझे कब शुमार करता है

bichhad ke mujhse mera intzaar karta hai
wo unguliyo'n pe har ek din shumaar karta hai

bichha dia miri raho'n meiN apna dil tune
ye kam wo hain jo ik jaan_nisaar karta hai

wo dushmano ke irado ko bhanp kar un par
bade sadhe hue hatho se waar karta hai

koyi sitara e sahri hai ya meri yaadeN
koyi to hai jo use beqarar karta hai

uboor karta hai har ik bhaNvar ko tera khayal
bagair naav ke dariya ko paar karta hai

siya main jaan bhi de du to isse kya hoga
wo dosto mein mujhe kab shumaar karta hai

वो मिरे इंतेख़ाब से कम है


चलती फिरती किताब से कम है 
वो मिरे इंतेख़ाब से कम है 

डूब जाएगी अब मेरी कश्ती 
इसमें पानी भी दाब से कम है 

दिल की हसरत को आसरा न मिला 
ये हक़ीक़त तो ख़्वाब से कम है 

तुम न पढ़ पाओगे कभी मुझको
मेरा चेहरा किताब से कम है

हक़ की ख़ातिर उठाई जो आवाज़
वो किसी इंकलाब से कम है

चाहे जो कुछ हो हैसियत मेरी
हाँ मगर कुछ जनाब से कम है

मेरे सर पर मुसीबते इतनी
जिंदगी क्या अज़ाब से कम है

नोके _नेज़ा भी मेरे सीने में
तेरे कडवे जवाब से कम है

ज़ख्म जो भी मिला मुझे तुझसे
वो अभी तक गुलाब कम से है ..

chalti firti kitaab se kam hai
wo mere intekhab se kam hai

doob jayegi ab miri kashti
ismein mani bhi daab se kam hai

dil ki hasrat ko aasra na mila
ye haqeeqat to khwaab se kam hai

tum na padh paoge kabhi mujhko
mera chehra kitaab se kam hai

haq ki khatir uthayi jo aawaz
wo kisi inqlaab se kam hai

chahe jo kuch ho hasiyat meri
haan magar kuch janab se kam hai

mere sar par musibate itni
zindgi kya azaab se kam hai

noke_neza bhi mere seene mein
tere kadve jawab se kam hai

zakhm jo bhi mila mujhe tujhse
wo abhi tak gulaab se kam hai

siya

Sunday, 3 March 2013

सब्र अपना आज़माना चाहिए


मुश्किलों को घर बुलाना चाहिए 
सब्र अपना आज़माना चाहिए 

मेरे हिस्से में ही आये ख़ार क्यों 
ये शिकायत भूल जाना चाहिए
 
बोझ दिल का होगा कुछ हल्का तभी 
हाल ए दिल उनको सुनाना चाहिए 

वो जो पहलू से उट्ठे तो यूं लगा 
उनको जाने का बहाना चाहिए 

लुट गए दिल के सभी अरमान अब 
दर्द का मुझको खज़ाना चाहिए 

दर्द तो मैंने कमाया हैं बहुत 
अब ख़ुशी का इक बहाना चाहिए  

फिर अँधेरे दिल से होंगे दूर सब 
दीप रोशन इक जलाना चाहिए 

रौशनी की इक किरन चमके ज़रा 
कुछ तो जीने का बहाना चाहिए 

पड़ गयी माथे पे सूरज की किरन 
नींद से अब जाग जाना चाहिए 

इस जहाँ से भर गया दिल मेरा 
अब नया इक आशियाना चाहिए 
 
कौन समझेगा यहाँ दिल की ज़बां 
हाल ए दिल सबसे छुपाना चाहिए 

मुख़्तसर सी जिंदगी है ए सिया 
प्यार से मिलना मिलाना चाहिए

mushkilon ko ghar bulana chahiye 
sabr apna aazmana chahiye 

 Mere hisse mein he aaye khar kyun 
ye shikayat bhul jaana chahiye 

Bojh dil ka hoga kuch halka tabhi 
haal e dil unko sunana chahiye 

Wo jo pehlo sey uthey to yoon laga
unko  jane ka bahana  chahiye 

lut gaye dil ke sabhi armaan ab
dard ka mujhko khazana chahiye 

Dard to maine kamaye hai bahut 
ab khushi ka ik bahana chahiye ...

fir andhere dil se honge door sab 
deep roshan ik jalana chahiye 

roshni ki  Ik Kiran chamke zara 
kuch to jeene ka bahana chahiye 

pad gayi mathe pe suraj ki kiran 
neend se ab jaag jana  chahiye 

is jahan se bhar gaya hai dil mera 
ab naya ik aashiyaana chahiye 

kaun samjhega yahan dil ki zabaan 
Haal e dil sabse chupana chahiye 

mukhtsar si zindgi hai ab siya
pyaar se milna milana chahiye 

Saturday, 2 March 2013

पर ये सच है की तुझे याद बहुत आयेगे


हँसते हँसते तेरी दुनिया से चले जायेगे 
पर ये सच है की तुझे याद बहुत आयेगे 

खाक़ से उट्ठे इसी खाक़ में मिल जायेगे 
ढूंढने वाले हमें ढूढ़ नहीं पायेगे 

जिंदगी हद्द से गुज़र जाए तेरे ज़ुल्म ओ सितम 
अपने लब पर कभी फ़रियाद नहीं लायेगे 

क्या किसी को मैं बताउंगी उदासी का सबब 
ज़ख्म जो सूख गए हैं सभी छिल जायेगे

मैंने छोड़ा ही नहीं सब्र का दामन अब तक 
एक दिन अश्क़ मेरे हक़ मेरा दिलवायेगे 

इक नज़र देख ले मुड़ के वो हमारी जानिब 
दिल के मुरझाये हुए फूल भी खिल जायेगे 

ग़र ज़बां खोली तो खुल जाएगा हर राज़ तेरा 
और जो ख़ामोश रहे बेवफा कहलायेगे 

आपको हम कभी रुसवा नहीं होने देगे 
आपके सर की कसम आप ही मिट जायेगे 

सोच कर आज सिया मुझको हंसी आती है 
बदनुमा लोग मुझे आईना दिखलायेगे 

haNste haNste tiri duniya se chale jayenge
par ye sach hai ki tujhe yaad buhat aayeNge
khak se utthe isi khak men mil jayeNge
dhoondne wale hameN dhoond nahiN payeNge
zindagi had se guzar jayeN tire zulm o sitam
apne lab par kabhi faryad nahiN layeNge
kya kisi ko meN batauNgi udasi ka sabab
zakhm jo sookh gaye hen sabhi chhil jayeNge
maiN ne chhoda hi nahi sabr ka daman ab tak
ek din ashk mire haq mira dilwayeNge
ik nazar dekh leN mud kar wo hamari janib
dil ke murjhaye hue phool bhi khil jayeNge
gar zabaN kholi to khul jayega har raaz tera
or jo khamosh rahe be wafa kehlayeNge
aap ko ham kabhi ruswa nahiN hone deNge
aap ke sar ki qasam aap pe mit jayeNge
soch kar aaj "siya" mujh ko haNsi aati he
badnuma log mujhe aaina dikhlayeNge.....

siya


ख्वाब तो मेरी आँखों में पलता रहा ..

वक़्त रफ़्तार से अपनी चलता रहा 
और संसार पल पल बदलता रहा

थोड़े ग़म थोड़ी खुशिया सभी को मिली 
चोट खा खा के इंसा संभलता रहा 

तुझसे मिलने की चाहत में ए ज़िन्दगी
चाँद आँगन में शब् भर टहलता रहा 

उसने भी गरम लहजे में गुफ़्तार की 
खून मेरा भी दिन भर उबलता रहा

पा_ये _तकमील तक तो न पंहुचा कभी
ख्वाब तो मेरी आँखों में पलता रहा ...

siya

मुल्क़ के हर किसी बच्चे को पढाया जाए

इल्म से कल हो सुनहरा ये बताया जाए 
मुल्क़ के हर किसी बच्चे को पढाया जाए 

दौलत ए इल्म जो बख्शी हैं ख़ुदा ने हमको 
बाँट कर इसको ज़माने में बढाया जाए 

हो ये हीरे की तरह ऐसा तराशो इनको
इस तरह फन से ज़माने को सजाया जाए

सिर्फ सच्चाई को ईमान बना कर इनकी
इनके क़िरदार को आइना बनाया जाए

ईट के संग के लोहे के बियाबां से दूर
गावं के बेच नया शहर बसाया जाए

गर इबादत है 'सिया' फ़र्ज़ करें हम ऐसे
इनका जो हक़ हैं इन्हें बढ़ के दिलाया जाए

Ilm se kal ho sunahra yeh bataya jaaye
Mulk k har kisi bachche ko padhaya jaaye

Daulat-e-ilm jo bakhshi hai khuda ne humko
Bant kar isko zamane mei badhaya jaaye

Ho yeh heere ki tarah aisa tarashein inko
is tarah fan se zamaney ko sajaya jaaye

sirf sachchayi ko imaan bana kar iinki
Inke kirdaar ko aaina banaya jaaye

Eint ke sang ke lohey ke biyabaan se door
Gaon ke beech naya shahr basaya jaaye

Gar ibadat hai ‘Siya’ farz karein ham aisey
inka jo haq hai inhe badh ke dilaya jaaye

siya

के जिनको दिलो में समायी नहीं है

मुसीबत से उनको रिहाई नहीं है 
के जिनको दिलो में समायी नहीं है 

मेरा दिल तो है आईने के मुआफ़िक 
किसी की भलाई बुराई नहीं है 

ग़मों के धुवें की इबारत है दिल पर 
उजाले पे कालिख तो आई नहीं है 

बिछड़ के मैं रोती हूँ उसके लिए अब
जभी दोनों आँखों में काई नहीं है

वो बहने किसे बांधने जाए राखी
के जिनका कोई जग में भाई नहीं है

बिछड़ के भी दिल पर हुकूमत है उसकी
रिहाई भी मेरी रिहाई नहीं है

सिया मुझको मंजिल मिलेगी यक़ीनन
भवंर में तो किश्ती भी आई नहीं है

musibat se unko rihaayi nahi hai
ke jinko dilo mein samayi nahi hai

mera dil to hai aaine ke muafiq
kisi ki bhalayi burayi nahi

ghamo ke dhuve'n ki ibarat hai dil par
ujaale pe kaalikh to aayi nahi hai

bichad ke main roti hoon uske liye ab
jabhi dono aankho mein kaai nahi hai

wo bahne kise bandhne jaye raakhi
ke jinka koi jag mein bhai nahi hai

bichhad ke bhi dil par hukumat hai uski
rihayi bhi meri rihayi nahi hai

siya mujhko manzil milegi yaqeeqan
bhavar mein to kishti bhi aai nahi hai ....

siya

देश लगता है मुझको गुलाम आज भी

हो रहा हर तरफ क़त्ल ए आम आज भी 
देश लगता है मुझको गुलाम आज भी

देखिये मेरे भारत में आ कर ज़रा 
रिश्ते नातो का है एहतराम आज भी

लौ चरागों की मुझको को न भाये ज़रा 
तेरे बिन सूनी सूनी है शाम आज भी

छोड़ कर ज़िस्म इक रोज़ उड़ जाएगा 
ये परिंदा तो है ज़ेर ए दाम आज भी 

इसलिए है उजाला मेरी रूह में 
मेरी धड़कन में है मेरे राम आज भी 

मुझसे ग़ाफ़िल ना हो पायेगा वो कभी 
मेरे दिल में है जिसका क़याम आज भी 

सरबलंदी ख़ुदा ने अता की सिया 
उसके दम से है ऊँचा मक़ाम आज भी 

ho raha har taraf qatl e aam aaj bhi 
desh lagta hain mujhko gulaam aaj bhi 

dekhiye mere Bharat mein aakar zara 
rishte naato ka hain ehtraam aaj bhi 

lau charagho'n ki mujhko na bhaye zara 
tere bin suni suni hai shaam aaj bhi 

chhod kar zism ik roz  ud jaayega 
ye parinda to hai zer_ e _daam aaj bhi 

isliye hai ujala meri rooh mein 
meri dhadkan mein hai mere ram aaj bhi 

mujhse gaafil na ho paayega wo kabhi 
mere dil mein hai jiska qayaam aaj bhi 

sarbalandi khuda ne ata ki mujhe 
uske dam se uncha maqaam aaj bhi ..


मैं खुद से प्यार न करती तो और क्या करती


हद्दों को पार न करती तो और क्या करती 
अना पे वार न करती तो और क्या करती 

नहीं था दुनिया में कोई भी चाहने वाला 
मैं खुद से प्यार न करती तो और क्या करती 

बड़े ही शौक़ से खायी थी उसने सर की कसम 
मैं ऐतबार न करती तो और क्या करती 

मुझे जो घर से मिले है उन्ही उसूलों पर 
मैं जां_निसार न करती तो और क्या करती 

किस ऐतबार से उसने कहा था आऊंगा 
मैं इंतज़ार न करती तो और क्या करती 

सिया फ़िराक़ में थे  लोग बस कमी ढूंढे 
कलम को धार न करती तो और क्या करती ....

Hado'n ko paar na kartee to aur kya kartee,
Anaa pe' waar n kartee to aur kya kartee.

nahi'n tha duniya mein koyi bhi chahne wala 
Main tujh se pyaar n kartee to aur kya kartee...

bade hi shuoq se khayi thi usne sar ki kasam 
Main aitbaar n kartee to aur kya kartee.....

Mujhe jo ghar se mile the unhee'n usoolo'n par
Main jan'nisaar n kartee to aur kya kartee?

kis aitbaar se usne kaha tha aaunga 
Main intizaar n kartee to aur kya kartee.

siya firaq mein the log bus kami dhundhe 
kalam ko dhaar na karti to aur kya karti 

siya