Saturday, 23 March 2013

अना पे वार न करती तो और क्या करती



हद्दों को पार न करती तो और क्या करती 
अना पे वार न करती तो और क्या करती 

नहीं था दुनिया में कोई भी चाहने वाला 
मैं खुद से प्यार न करती तो और क्या करती 

बड़े ही शौक़ से खायी थी उसने सर की कसम 
मैं ऐतबार न करती तो और क्या करती 

मुझे जो घर से मिले है उन्ही उसूलों पर
मैं जां_निसार न करती तो और क्या करती

किस ऐतबार से उसने कहा था आऊंगा
मैं इंतज़ार न करती तो और क्या करती

सिया फ़िराक़ में है लोग बस कमी ढूंढे
कलम को धार न करती तो और क्या करती ....

Hado'n ko paar na kartee to aur kya kartee,
Anaa pe' waar n kartee to aur kya kartee.

nahi'n tha duniya mein koyi bhi chahne wala
Main tujh se pyaar n kartee to aur kya kartee...

bade hi shuoq se khayi thi usne sar ki kasam
Main aitbaar n kartee to aur kya kartee.....

Mujhe jo ghar se mile the unhee'n usoolo'n par
Main jan'nisaar n kartee to aur kya kartee?

kis aitbaar se usne kaha tha aaunga
Main intizaar n kartee to aur kya kartee.

siya firaq mein hain log bus kami dhundhe
kalam ko dhaar na karti to aur kya karti

siya

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