Wednesday, 31 December 2014

नज़्म .... आगे पीछे बस तन्हाई


बीते साल ने छीना मुझसे वीर मेरा वो मेरा भाई
लगता है हर जानिब मेरे फैल गयी मेरी तन्हाई
वक़्त अचानक बदल गया है उम्र लगी है सहसा ढलने 
हाँ कहने को अपने रिश्ते भाषा इनकी लगे परायी
इतने दुःख और ज़ख्म लगे है रूह तलक है छलनी छलनी
जीवन तक कम पड़ जाएगा होगी ना दुःख की भरपाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
क्या ऐसे रिश्ते होते हैं ? आँखे मिर्चों से धोते हैं
बेचैनी की सेज बिछाकर तंज़ भरे काँटे बोते हैं
हार गयी इज़्ज़त की ख़ातिर चुप चुप हूँ ग़ैरत की ख़ातिर
सब्र खड़ा है सर निहुड़ाये वरना फैलेगी रुसवाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
उंगली पकड़ने वाले हाथ भी अब तो अंजाने लगते हैं
दुनिया जिन्हें मेरा कहती है वोह सब बेगाने लगते हैं
सबकी अपनी अपनी दुनिया सबके अपने अपने क़िस्से
सब के कान हुए है बहरे अपना दर्द कहूँ मैं किस से
बचपन में माँ बाप थे बिछड़े और जवानी में ये भाई
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
कैसा दिसंबर जनवरी कैसी जीवन मिला है सो है जीना
अपना भी अब होश कहाँ है गुज़र रहा है साल महीना
इतना अरसा बीत चूका है कब बदला ये समय हरजाई
सायों से बस भरी हुई है नहीं दिलो में ज़रा समायी
तन्हाई ही तन्हाई है आगे पीछे बस तन्हाई
siya

Saturday, 27 December 2014

कितने हैं ये प्यारे फ़ूल

एक चमन में सारे फ़ूल
कितने हैं ये प्यारे फ़ूल

आते जाते रोज़ यूँही 
होते हैं बंजारे फ़ूल

लूटने आया जब   कोई
बन बैठे अंगारे फ़ूल

जीवन की हर बाज़ीसे 
शर्त  कभी  न हारे फ़ूल

सबकी   ख्वाहिश होती  है 
ख़ुश्बू, चाँद, सितारे  फ़ूल

दौलत की कब  हसरत है 
सिर्फ  "सिया" को प्यारे फ़ूल 

अब मोहब्बत की राह मुश्किल हैं

नश्तरों से निबाह मुश्किल हैं 
अब मोहब्बत की राह मुश्किल हैं

कैसे देखूं मैं ज़िंदगी तुझको 
रात काली सियाह  मुश्किल हैं 

यूं तो हर शय मिली मगर मुझको 
एक  तेरी पनाह मुश्किल हैं 

दे  गी  दुनिया तो मश्वरा लेकिन 
एक उसकी सलाह मुश्किल है  

अब "सिया" ज़िन्दगी के साथ चलो 

उनकी हम पर निगाह, मुश्किल है

वो हमें जान के रुलाता है


दास्ताँ अपनी जो सुनाता हैं 
वो हमें जान के रुलाता है 

वो शहनशाह  है मोहबत का 
ताज को जो महल बनाता है

रूप  उसका अजब सही लेकिन 
दिल में एहसास वो जगाता है 

उसकी ग़ज़लों की धुन बनाती हूँ
उसका मेरा अजीब नाता है 

अपने आंसू छुपा के पीता है
प्यास ऐसे ही वो बुझाता है

इक मुसव्विर है या कि है आशिक़
मेरी तस्वीर जो बनाता है 

आदमी क्यूं हो गया पत्थर बता

ऐ खुदाया ऐ मेरे परवर बता
आदमी क्यूं हो गया पत्थर बता

तू समंदर है मुझे ये इल्म है
मैं भी हूँ दरिया मुझे पीकर बता

हर तरफ ऊंची इमारत हैं फ़क़त
तू मुझे इंसान का इक घर बता

क्या अभी इंसान है मुझमें कोई
दिल को मेरे बस यही छूकर बता

लोग तो सब फ़ूल लेकर चल दिए
क्यूं मेरे हिस्से में हैं नश्तर बता.

हर घड़ी रहता है आँखों में क्यों चेहरा तेरा

मुंसलिक है रग ए जां से कोई रिश्ता तेरा 
हर घड़ी रहता है आँखों में क्यों चेहरा तेरा 

मेरी तक़दीर में हरगिज़ नहीं लिक्खा होगा 
सब बुरा हो मेरा हर काम हो अच्छा तेरा 

तूने अफवाह उड़ा  दी है कि मैं हार गयी 
मैं भी दुनिया पे अयाँ कर दूंगी धोका तेरा 

जा तुझे वक़्त दिया ढूँढ ले मुझसे बेहतर 
तुझको मुझसा न मिलेगा कोई अपना तेरा 

उस घडी कहना मुझे दर्द ए जुदाई क्या है 
छोड़ कर जाएगा जिस दिन तुझे अपना तेरा 

Friday, 12 December 2014

फ़रेब ए आरज़ू ही खा रही हूँ

फ़रेब ए आरज़ू ही खा रही हूँ 
मैं अपने आप को झुठला रही हूँ

किसी  के ग़म में घुलती  जा रही हूँ 
संभल जा दिल तुझे समझा रही हूँ 

मेरे ग़म दर्द आहें और आंसू 
इन्ही से खुद को मैं बहला  रही हूँ 

इन्ही सदमों का दिल पे बोझ लेकर 
तुम्हारी ज़िंदगी से जा रही हूँ

किसी के नाम से रुसवा रही हूँ
किसी को चाह के पछता रही हूँ

ये चाहत,ये वफायें ये तड़पना
मैं इनके नाम से घबरा रही हूँ

हैं क्यूँ उलझे हुए रिश्तों के धागे
इसी उलझन को मैं सुलझा रही हूँ

कोई साथी कोई महरम नहीं था
भरी दुनिया में भी तन्हा रही हूँ

समझना ही नहीं जो चाहता कुछ
उसी पत्थर से सर टकरा रही हूँ

ख़लिश बन कर खटकते हैं जो अब भी
उन्ही ज़ख्मो को मैं सहला रही 




नज़्म ---उदासी से भरा आलम



वही हैरान सी ख़ामोशियाँ है
वही चारों तरफ मायूसियाँ है 
लगे सिमटा हुआ हर एक लम्हा 
हाँ तन्हा जिस्म और ये जान तन्हा 
बहुत बेरंग सा मौसम लगे है 
उदासी से भरा आलम लगे है 
 मेरे दिल की चुभन जाती नहीं है 
कोई भी शय मुझे भाती नहीं है 
वो उठ कर रात को चुपचाप रोना 
फिर एहसासों को लफ़्ज़ों में पिरोना 
गिनू घड़िया कटेगी रात ये कब 
सह्ऱ की आस में बैठी हूँ मैं अब 

न जाने कब वो आएगा सवेरा 
कि ये जीना, मुकम्मल होगा मेरा 

wahi hairan si khamoshiya.n hai
wohi  chaaron taraf maayusiya. n hai 
lage  Simta hua  har ek lamha
hain tanha jism aur ye jaan tanha 
bohot berang sa mausam lage  hai 
udasi se bhara aalam lage hai 
mere dil ki chubhan jati nahi hai
koyi bhi shay mujhe bhati nahi hai
wo uth kar raat ko chupchap rona
phir ehsaso'n ko lafzo'n mein pirona
ginu ghadiya kategi raat ye kab 
Sehr ki aas mein baithi hoon main ab 

na  jaane  kab wo aaey ga sawera 
ki  ye jeena ... ,mukammal hoga  mera  




Monday, 8 December 2014

आपका साथ बा ख़ुदा है ना !

ख़वाब आँखों ने इक बुना है ना !
आपका साथ बा ख़ुदा है ना !
मेरी मरती हुई उम्मीदों को
ज़िंदगी का दिया पता है ना !
गुमशुदा थी कई ज़माने से
मुझ को मुझसे दिया मिला है ना !
वक़्त की आग ने जला कर यूँ
तुमको कुंदन बना दिया है ना !
थी खुले सायबान की चाहत
तुमने रास्ता दिखा दिया है ना !
दिल भी अपनी तरफ झुका लेना
मैंने सर तो झुका लिया है ना !
जिस्म हारा है जान बिस्मिल है
मेरी उल्फत का ये सिला है ना
फिर रही थी तलाश ए हस्ती में
मेरी मंज़िल का तू पता है ना !
khwaab ankho ne ik buna hai na !
aapka saath bakhuda hai na !
Meri marti hui umeedoN ko
zindgi ka diya pata hai na !
gumshuda thi main ik zamane se
mujhko mujhse diya mila hai na !
waqt ki aag ne jala kar yun
tumko kundan bana diya hai na !
dil bhi apni taraf jhuka lena
maine sar to jhuka liya hai na
thi khule saaibaan ki chahat
tumne rasta dikha diya hai na !
jism hara hai jaan bismil hain
meri ulfat ka ye sila hai na !
phir rahi thi Talaash-e-hasti mein
meri manzil ka tu pata hai na !
siya

Sunday, 7 December 2014

मेरा दामन तो दाग़दार नहीं

मेरा दामन तो दाग़दार नहीं 
इसलिए ख़ुद से शर्मसार नहीं  
 
लफ्ज़ का हम न कर सके सौदा 
ये हमारा तो कारोबार नहीं 

देखते हो पलट पलट कर क्यों 
मेरा चेहरा है इश्तेहार नहीं 

हाले दिल इत्मिनान से कहिये
मुत्मुइन हूँ मैं बेक़रार नहीं

रूह पर बोझ ज़िंदगी का हैं
मौत पर कोई इख़्तियार नहीं
लोग गम है हवसपरस्ती में
ख़ूनी रिश्तों में भी तो प्यार नहीं

ख़त्म जब राब्ते हुए सारे
फिर किसी का भी इंतज़ार नहीं