Saturday, 26 January 2013

सो रही हूँ मुझे मत जगाया करो ...


सब्र को अपने यूं आज़माया करो 
शिद्दत ए ग़म में भी मुस्कुराया करो 

अपनी पलकों पे ख्वाबों की चादर किये
सो रही हूँ मुझे मत जगाया करो ...

फर्क पड़ता नहीं है किसी को यहाँ
ज़ख्म ए दिल मत किसी को दिखाया करो

ऐब जोई तुम्हे ज़ेब देगी मगर
आइना बनके भी तो दिखाई करो

धूप शोहरत की दो दिन में ढल जायेगी
तुम मोहब्बत भी थोड़ी कमाया करो

सर की टोपी ज़मीं पर गिरे एकदम
इतना ऊँचा ना सर को उठाया करो

तुम किसी के हुए ही नहीं जब कभी
फिर किसी को न अपना बनाया करो

रोशनी जिनसे सबको मिले है सिया
दीप ऐसे जहां में जलाया करो...

sabr ko apne yoon aazmaya karo
shiddat e gham mein bhi muskuraya karo

apni palko'n pe khwabo'n ki chadar liye
so rahi hoon mujhe mat jagaya karo

farq padta nahi hai kisi ko yahan
zakhm e dil mat kisi ko dikhaya karo

aib zoyi tumhe zeb degi magar
aaina banke bhi to dikhaya karo

dhoop shohrat ki do din mein dhal jaayegi
tum mohbbat bhi thodhi kamaya karo

sar ki topi zameen par gire ek dam
itna uncha na sar ko uthaya karo

tum kisi ke hue hi nahi jab kabhi
fir kisi ko na apna banaya karo

roshni jinse sabko mile hai siya
deep aise jahan mein jalaya karo ..

दिल से दुःख दर्द सब भुलाने दो

जिंदगी ख़ुशनुमा बनाने दो
दिल से दुःख दर्द सब भुलाने दो 

खुद ही चलना वो सीख जाएगा 
उसको कुछ देर लडखाने दो 

जुस्तजू थी ख़ुशी मिलेगी कभी 
न सही ग़म से ही निभाने दो

धुधला धुंधला हर एक मंज़र है 
इक किरन रौशनी की आने दो

खुशबुए गुल उड़ेगी चारो ओर
तितलियों को करीब आने दो

लोग तो मज्हका उड़ाते हैं,
दिल पे मत लेना यार जाने दो ..

अपने कातिल से खूंबहा लेकर
कह रहा है वो मुस्कुराने दो

ये जो फुटपाथ पर हैं इनको भी
हक़िम ए वक़्त शामियाने दो

मेरी हस्ती को ए खुदा मेरे
नूर से अपने जगममगाने दो

मांगती हूँ सिया यहीं मालिक
अपनी रहमत के तुम खज़ाने दो...

मेरी इक पंजाबी ग़ज़ल ....

मेरी इक पंजाबी ग़ज़ल ....

आंख तो हंजू बै जांदे ने 
हाल दिला दा कह जांदे ने 

जो दुनिया नू राह विखान्दे 
ओही कल्या रह जांदे ने 

इश्क़ कीता सी लोगो जिंना 
ज़ुल्म यार दे सह जांदे ने 

रात हनेरी दा ए आलम
ख्वाब वी डर के रह जांदे ने

पानगे ओह की खाक़ किनारे
जो पानी विच बह जांदे ने

मोती ओनु ही लभदे ने
जो सागर दी तह जांदे ने

दिल विच अपने बैर न रक्खी
लोग सयाने कह जांदे ने ..

समन्दरों से वो वापस न आये घर के लिए


उतर गए थे जो नायाब से गुहर के लिए 
समन्दरों से वो वापस न आये घर के लिए 

ये नेक नेक से आमाल ही बचा रक्खू
 की मैंने कुछ भी बचाया नहीं सफ़र के लिए 

लहू चरागों में भर भर जला रही हूँ मैं
 अभी उजाले की हाजत है मुझको घर के लिए 

तू चाह ले तो ये सहरा अभी बने गुलशन
 तरस रही हूँ मैं कब से तेरी नज़र के लिए 

दुआ ये मांग रही हूँ की इसमें फल आ जाये
 उम्मीदों _यास के इस आखरी शज़र के लिए 

ग़मो की आंच में पकते रहे है सारी उम्र 
वो शेर क़ैद है लफ़्ज़ों में अब असर के लिए 

भटक रही है सिया भी हवस के जंगल में 
बुला लो मुझको मिरे राम उम्र भर के लिए ..

utar gaye the jo naayab se guhar ke liye
 samandaro'n se wo wapas na aaye ghar ke liye 

ye nek nek se aamaal hi bacha rakkhu
 ki maine kuch bhi bachaya nahi safar ke liye 

lahu charago mein bhar bhar jala rahi hoon main
 abhi ujaale ki haajat hai mujhko ghar ke liye 

tu chah le to ye sehra abhi bane gulshan
 taras rahi hoon main kab se teri nazar ke liye 

dua ye mang rahi hoon ki ismein fal aa jaye
ummedo -yaas ke is aakhri shazar ke liye 

ghamo'n ki aanch mein pakte rahe hai sari umar
 wo sher qaid hain lafzo'n mein ab asar ke liye 

bhatak rahi hai siya bhi hawas ke jangal mein
 bula lo mujhko mire ram umr bhar ke liye ..

Saturday, 12 January 2013

प्रभु के जितने नाम पता थे हमने उतने नाम लिए

वहशत रक़्सकुना थी हरसू नफरत का पैगाम लिए 
प्रभु के जितने नाम पता थे हमने उतने नाम लिए 

जिस्म का प्याला इक दिन खाली हो जाना है जान के तुम
इतराते फिरते हो क्यूँ कर रूह का इसमें जाम लिए

तेरी तलब की धूप में दिन भर आग उगलता है सूरज
भट्टी से पीकर लौटी है शाम तुम्हारा नाम लिए

फ़र्ज़ निभाया है बेटे ने कल पहाड़ की चोटी पर
गिरने से पहले ही उसने मेरे बाजू थाम लिए

दूध की मक्खी जैसा उसने दिल से अपने दिया निकाल
जिसकी ख़ातिर मैंने अपने ऊपर सौ इलज़ाम लिए

ऊँची बाते करने वाला इंसा कितना छोटा है
मंडी में खुद को बेचा और सबसे ऊँचे दाम लिए ..

बहुत उदास उजाला दिखाई देता है

घना घना जो अँधेरा दिखायी देता है 
बहुत उदास उजाला दिखाई देता है 

इसे करीब से देखो तो घिन न आ जाए
जो आदमी तुम्हे अच्छा दिखायी देता है

घने अंधेरों की चादर को चीर कर देखो
चराग़ सबको अकेला दिखाई देता है

उसे किसी से भी कुछ चाहिए नहीं शायद
हर आदमी जिसे अपना दिखायी देता है

चिता में राख धुवाँ आग की लपट और मैं
मुझे बताओ की क्या क्या दिखाई देता है

जो देखता है सभी को सिया बुलंदी से
हर आदमी उसे छोटा दिखाई देता है

ghana ghana jo andhera dikhayi deta hai
bahut udas ujala dikhayi deta hai

use qareeb se dekho to ghin na aa jaye
jo aadmi tumeh achcha dikhayi deta hai

ghane andheron ki chadar ko cheer kar dekho
charag sabko akela dikhayi dekha tha

use kisi se bhi kuch chahiye nahi shayad
har aadmi jise apna dikhayi deta hai

chita mein rakh dhuva aag ki lapat aur main
mujhe batao ki kya kya dikhayi deta hai

jo dekhta hai sabhi ko siya bulandi se
har aadmi use chota dikhayi deta hai 

शायरी जिंदा रक्खेगी मुझको मर जाने के बाद

हौसला पाती हूँ मैं अपने को समझाने के बाद 
शायरी जिंदा रक्खेगी मुझको मर जाने के बाद 

मुन्कशिफ होती हैं दुनिया की सभी सच्चाइयां
दर्द के गहरे समंदर में उतर जाने के बाद

मैं न कहती थी संभल जाओ मगर माने नहीं
अब खुली आंखे तुम्हारी ठोकरे खाने के बाद

इश्क के तूफ़ान ने जिसको छुआ वो बह गया
ख़ुद वो पागल हो गए है मुझको समझाने के बाद

खुदबखुद पल पल महकता है मिरा अपना वजूद
उसके खुशबूं की तरह मुझ में समां जाने के बाद

मुतमइन हूँ किस क़दर इसकी है बस मुझको ख़बर
आरज़ूवें खत्म हैं सारी तुझे पाने के बाद

housla pati hoon main apne ko samjhanae ke baad
shayari zinda rakkhegi mujhko mar jaane ke baad

munkashif hoti hain duniya ki sabhi sachchaaiyaan
dard ke gahre samandar mein utar janae ke baad

main na kahti thi sambhal jao magar maane nahi'n
ab khuli aankhe tumahari thokre khaane ke baad

ishq ke tufaan ne jisko chua wo bah gaya
khud wo pagal ho gaye hai mujhko samjhane ke baad

khud ba khud pal pal mahakata hai mira apna wajood
iske khushboon ki tarah mujh mein sama'n jaane ke baad

mutmain hoon kis qadar iski hai bus mujhko khabar
arzoove'n khatm hai sari tujhe paane ke baad ...

Friday, 4 January 2013

मजबूर कर गए मेरे हालात किस क़दर


बढ़ने लगे हैं ज़ेहन में खदसात किस क़दर 
मजबूर कर गए मेरे हालात किस क़दर 

हैवानियत की सारी हद्दे पार कर गए 
थी ज़ेहन पर सवार खुराफात किस क़दर

आखिर हयात हार गयी जंग मौत से 
थे सख्त दामिनी पे वो हालात किस क़दर 

मत पूछ मुझसे मेरी उदासी का यूं सबब 
कर देंगे शर्मसार सवालात इस क़दर 

इंसानियत भी मुंह को छिपाए है इन दिनों 
होने लगे वतन में फ़सादात किस क़दर 

ए दिल मुझे संभाल,जरा सब्र दे मुझे भड़का रहे है
मुझको ये जज़्बात किस क़दर 

कोई तो हो जो बात का मेरी जवाब दे
खुद से करुँगी मैं भी भला बात किस क़दर 

badhne lage hain zehan mein khadsaat kis qadar 
majboor kar gaye mere halaat kis qadar 

havaniyat ki sari hadde paar kar gaye
 thi zehan par sawar khurafaat kis qadar ..

aakhir hayat haar gayi jung maut se
 the sakht damini pe wo halaat kis qadar 

mat puch mujhse meri udasi ka yoon sabab
 kar denge sharmsaar sawalaat is qadar 

insaniyat bhi mooh ko chipaaye hai in dino
 hone lage vatan mein fasadaat kis qadar 

aye dil mujhe sambhal,jara sabr de mujhe
 bhadka rahe hai mujhko ye jazbaat kis qadar 

koyi to ho jo baat ka meri jawab de
khus se karungi main bhi bhala baat kis qadar .

मेरे हिस्से में कायनात नहीं


माँ जो तू आज मेरे साथ नहीं
मेरे हिस्से में कायनात नहीं 

तेरे आँचल में छुप के सो जाती
मेरी किस्मत में अब वो रात नहीं

जिससे पूछो वहीं ये कहता है
मुश्किलों से मुझे नज़ात नहीं

मौत से क्यूँ मुझे डराते हो
रुह को जब कभी वफ़ात नहीं

जिंदगानी में रस नहीं होगा
ग़म अगर शामिले हयात नहीं

जाने क्यूँ तुम खफ़ा हुए मुझसे
बात जैसी तो कोई बात नहीं

हूक उठती नहीं कहीं से भी
अब कोई दिल में वारदात नहीं

ma jo tu aaj mere sath nahi
mere hisse ki kainaat nahi

tere anchal mein chup ke so jati
meri kismat mein ab wo raat nahi..

jisse pucho waheen ye kahta hain
mujhkilon se mujhe nazaat nahi

maut se kyun mujhe darate ho
rooh ko jab kabhi wafaat nahi

zindgani mein ras nahi hoga
gham agar shamile hayaat nahi

jane kyun tum khafa hue mujhse
baat jaisi to koyi baat nahi

hooq uthti nahi kaheen se bhi
ab koyi dil mein wardaat nah
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लफ्ज़ मेरे भी असर तक आ गए

उसकी चश्मे _मोतबर तक आ गए 
लफ्ज़ मेरे भी असर तक आ गए

डालियां ख़म हैं फलों के बोझ से 
किसलिए पत्थर शज़र तक आ गए 

लग रहा है जंगलों को छोड़कर
कुछ दरिन्दे फिर नगर तक आ गए

शेर के सब ऐब आये सामने 
जब कभी अहले नज़र तक आ गए 

मर गए जो भूख से फुटपाथ पर 
सुब्ह की ताज़ा ख़बर तक आ गए 

हो गयी अपनी दुआएं भी कबूल 
हम तिरी फ़िक़्रो नज़र तक आ गए 

ए सिया सांसे मेरी अटकी रही
जब तलक़ बच्चे न घर तक आ गए...

uski chashme _motbar tak aa gaye 
lafz mere bhi asar tak aa gaye 

daliya'n kham hain falon ke bojh se 
kis liye patthar shazar tak aa gaye 

lag raha hain janglo'n ko chhod kar 
kuch darinde fhir nagar tak aa gaye 

sher ke sab aib aaye hai nazar 
jab kabhi ahle nazar tak aa gaye 

mar gaye jo bhookh se futpath par 
subh ki taza khabar mein aa gaye 

ho gayi apni duaen bhi qabool 
hum ti ri fiqr o nazar tak aa gaye 

aye siya sanse meri atki rahi 
jab talaq bachche na ghar tak aa gaye..