Friday, 15 April 2011

सितारों झिलमिला जाओ


अँधेरी रात तारों तुम ज़रा सा झिलमिला जाओ 
मैं तन्हा हूँ मेरे पेहलू में तुम  ही मुस्कुरा जाओ 

तुम्हारी बेरुखी पे हम अगर रोये तो क़िस्मत है
तुम्हे हक़ है कभी आओ मेरा ये दिल जला जाओ 

ये आंसू है मेरे बारिश नहीं है आस्मां की ये 
अगर हो प्यार मुझसे तो कभी आकर मना जाओ 

मेरा हर गीत तुम्हारे अक्स का आईना है शायद 
मेरा नगमा भी है तन्हा तुम्ही आकर सुना जाओ

तुम्हारी  एक चुप्पी भी मुझे नागन सी डसती है 
अरे बोलो, ज़रा बोलो कोई तो गुल खिला जाओ 

दुआ में हो असर तो संग भी आखिर चटकते हैं 
"सिया" की इस दुआ में तुम असर बनकर ही आ जाओ 

Saturday, 9 April 2011

ग़ज़ल ....अब नहीं आसां..!!!!

तुमको इस दिल से भुला पाना अब नहीं आसां
ज़ख्म दिल के ये दिखा पाना अब नहीं आसां

हम तो अपनों के दिए ग़म ही संभाले बैठे

इनको लफ़्ज़ों में बता पाना अब नहीं आसां

जो नहीं मिलता हम उसकी जुस्तजू में रहे

इस दिले जार को समझाना अब नहीं आसां

हमने आँखों के इशारे से जताया है मगर

जुबां से बात ये बतलाना अब नहीं आसां

चराग-ए-  आरज़ू रोशन है चारसू मेरे

ऐ सिया उसको बुझा पाना अब नहीं आसां

सिया

Wednesday, 6 April 2011

प्यार के रंग

आ मेरी ज़िन्दगी में प्यार के कुछ रंग भर दे 
मैं अधूरी हूँ मुझे आ तू मुक़म्मल कर दे 

 होश उड़ जाये तेरे, इतना मैं चाहूँ तुझको
अपनी चाहत से मुझे यार तू पागल कर दे 

मैंने मेहंदी से हथेली पर तेरा नाम लिखा
तू मेरे सर पे अपने नाम का आँचल कर दे 

मेरे माथे पे सजे बिंदिया पिया तेरे लिए
मेरी आँखों में अपने प्यार का काजल भर दे 

उम्र भर यूँ ही तेरा साथ निभाएगी "सिया"
अपनी पलकों में बसा दुनिया से ओझल कर दे 

सिया





Tuesday, 5 April 2011

उफ़ ! ये ज़िन्दगी

हरेक शख्स के चेहरे पे थकन सी क्यूं है.
इस शहर की गलियों में घुटन सी क्यूं है.

हर तरफ छाई है कैसी अजब ये मायूसी
दिल में शोले हैं आँखों में अगन सी क्यूं है.

हर तरफ भागते लोगो का हुजूम है देखो
ये दुनिया ख़ुद ही में देखो तो मगन सी क्यूं है

नींद में ख़्वाब का आना बड़ा हसीं हैं मगर
जागती आँखों में इस तरह जलन सी क्यूं है.

नहीं बदलते ये हालात चाहे कुछ भी करें
मगर उमीद की दिल में ये किरण सी क्यूं है

"सिया" ने टूट के चाहा है ज़िन्दगी में जिसे
उसी के दिल में मगर एक  चुभन सी  क्यूं है


सिया 

 

Sunday, 3 April 2011

तन्हा दिल


अपनों की हर बात ही आख़िर दिल को दुखाने आई है

और फिर उस पर तन्हाई भी दिल दहलाने आई है !!

रुसवा तो हम यार बहुत हैं, क्या बतलाएं दुनिया को
एक कहानी फिर से आख़िर कुछ दोहराने आई है !!

आप न आए वादा करके हम को थी तकलीफ़ यही
मौसम की सरगोशी शायद कुछ बतलाने आई है !!

दिल की हर दीवार में सीलन, आँखों में सैलाब सा है
इस रुत की ये बारिश रब्बा क्या समझाने आई है !!

आज हरेक महफ़िल में आख़िर उसकी बातें होती हैं
एक "सिया"रिश्तों को देखो ख़ुद सुलझाने आई है !!

सिया

Saturday, 2 April 2011

इक इल्तिजा

इस प्यार को ज़मीं पे उतारा न कीजिये
हमको यूँ सरे- राह पुकारा न कीजिये 

जीना हुज़ूर आपसे सिखा करेंगे हम 
लेकिन ये शर्त हमसे किनारा न कीजिये 

अब आप कह रहे हो मुहब्बत नहीं हमें 
ज़िन्दा किसी को यार यूँ मारा न कीजिये 

दिल में है कोई और तो ऐसा फ़रेब क्यूं
इक इल्तिजा है हमको संवारा न कीजिये 

लिक्खा हुआ "सिया' का पढता नहीं कोई 
ज़र्रा हूँ इक ज़मीं का सितारा न कीजिये 

Friday, 1 April 2011

बेमानी राहे


कुछ जिंदगी से  ऐसे घबरा  गए   हैं हम 
रिश्ते वो साथ में हैं घुटता है जिनसे  दम

जिस राह पर कदम धरे अनजान सी  लगी 
मंजिल थी कोई और कहाँ आ गए हैं हम 

पतझर में जैसे शाख पर पत्ता हरा ना हो 
मौसम बहार का हैं  मुरझा  गए  है हम 

एहसास होगा भूले से तुमको भी एक दिन 
जब दूर तुमसे दूर चले जायेगे जो हम

उसको  कहाँ है  फुर्सत कि दिल वो ले सिया 
लब सी लिए हैं हमने खामोश हैं  सनम

सिया