Sunday, 7 May 2017

ऐसा लगता है इबादत को चले आते हैं

जब भी हम तेरी ज़ियारत को चले आते हैं
ऐसा लगता है इबादत को चले आते हैं

बस दिखावे की मुहब्बत को चले आते हैं
लोग रस्मन भी अयादत को चले आते हैं

देखकर आपको इस दिल को क़रार आ जाए
अपनी आँखों की ज़रुरत को चले आते हैं

जब भी घबराने सी लगती है तबीयत अपनी
ऐ ग़ज़ल हम तिरी ख़िदमत को चले आते हैं।

हम फकीराना तबियत हैं हमें क्या लेना
लोग बेवज्हा सियासत को चले आते हैं।

गज़ब दुनिया के हमने ढंग देखे

बदलते ज़िंदगी के रंग देखे
गज़ब दुनिया के हमने ढंग देखे

वफाये, प्यार ,नफरत बेवफाई
कई मौसम तुम्हारे संग देखे

ज़माने से बहुत लड़ता है इन्सां
कभी खुद से भी करके जंग देखे

नए इस दौर के बच्चों की बाते
जिसे सुनकर बड़े भी दंग देखे

बड़ी बाते किया करते हैं जो लोग
वोही दिल के निहायत तंग देखे
नक़ाब उनके थे कितने खूबसूरत
मगर चेहरे बहुत बदरंग देखे

ज़िंदगी तू कहाँ ठहरती है

ख़ुद की हस्ती गिरां गुज़रती है
ज़िंदगी जब मज़ाक करती है

रास्ते कब तमाम होते हैं
ज़िंदगी तू कहाँ ठहरती है

ये मोहब्बत भी है कली की तरह
ख़ुद ही खिलती है खुद बिखरती है

रक़्स करता है कोई ज़ेहन पे जब
शायरी तब कहीं उतरती है

ऐसी रानाई किसने मानी जो
आईना देख कर सँवरती हैं

रौब इतना हैं उसके चेहरे पर
आँख उठते हुए भी डरती है

मुझमें ख़ामी जो ढूँढता है फ़क़त
उसको ख़ूबी मिरी अखरती है।

ज़िन्दगी हैं अजीब सी कश्ती
डूबती है न जो उभरती है

उस जुबां का सिया भरोसा क्या
अपने वादे से जो मुकरती है

मुझे पाने की ख़्वाहिश मत करो तुम

कोई मुझसे गुज़ारिश मत करो तुम
मुझे पाने की ख़्वाहिश मत करो तुम

तुम्हारे दिल में क्या है जानती हूँ
मोहब्बत की नुमाईश मत करो तुम
नतीजे पर बहुत अफ़सोस होगा
वफ़ा की आज़माइश़ मत करो तुम

बिछड़ना ही है जब अंजाम अपना
क़रीब आने की कोशिश मत करो तुम

मैं इक मुद्दत से भूली मुस्कुराना
नयी इक और साज़िश मत करो तुम

बढूँगी क़ाबलियत से ही अपनी
मेरी कोई सिफ़ारिश मत करो तुम

मेरी खुद्दारियों पर आँच आये
कोई ऐसी नवाज़िश़ मत करो तुम

रोने लगे वो दर्द की तफ़्सीर देख कर

हालात देख कर मेरी तहरीर देख कर
रोने लगे वो दर्द की तफ़्सीर देख कर

ए काश तुझ में इतना समां जाऊं के हर इक
पहचान लें मुझे तेरी तस्वीर देख कर

उठती है आँख बारहा देहलीज़ की तरफ
अटका हुआ हैं दम तेरी ताख़ीर देख कर

ख्वाबो से दिल को होती थी तस्कीन जिस क़दर
उतना ही डर गयी हूँ मैं ताबीर देख कर

रहती हैं जिनकी दोस्तो तदबीर पर निगाह
चलते नहीं हैं वो कभी तक़दीर देख कर

मुझको बदलते वक़त का एहसास हो गया
हैरान हूँ मैं अपनी ही तस्वीर देख कर

जो उम्र मेरी खास थी ख्वाबों में कट गयी
करना भी क्या है अब मुझे ताबीर देख कर

मंज़िल तो सामने है मगर क्या करें सिया
बैठे हुए हैं पांव की ज़ंजीर देख कर

डर डर कर यूँ रोज़ मरें क्यूँ

-इस दुनिया से और डरें क्यूँ
डर डर कर यूँ रोज़ मरें क्यूँ
दिल है जब ख़ुशियों से ख़ाली
अश्कों से फिर नैन भरें क्यों
तुमको पाया ही कब हमने
खोने का अफ़सोस करें क्यूँ
पत्थर जैसी हैं जो यादें
उनका दिल पर बोझ धरें क्यूँ
फरज़ानो की बाते सुन कर
खुद को पागल और करें क्यूँ

तिफ़्ल ए मासूम हर एक दिल में छुपा होता है

उम्र से चाहे कोई कितना बड़ा होता है
तिफ़्ल ए मासूम हर एक दिल में छुपा होता है

हँसते चेहरे लिए फिरते हैं मेरे शहर के लोग
लेकिन इक ज़ख्म हर इक दिल में दबा होता है

मैंने चेहरे से हर अहसास मिटा डाला मगर
फिर भी आँखों से अयाँ दर्द मेरा होता है

तंज़ के तीर चलाने में हैं माहिर अहबाब
वार कैसे हो उन्हें खूब पता होता है

माँ पे क़ुर्बान भी होकर मैं रहूंगी मक़रूज़
इससे ममता का कहाँ क़र्ज़ अदा होता है

सिर्फ इस बात से बरहम है ज़माना ए सिया
अपना अंदाज़ ज़माने से जुदा होता है
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तेरी झूठी तरफदारी करे हम

भला कब तक अदाकारी करे हम
तेरी झूठी तरफदारी करे हम

कहाँ तक झूठ से बहलाये ख़ुद को
कहाँ तक खुद से ग़द्दारी करे हम

हमें तहज़ीब विरसे में मिली है
तो कैसे बात बाज़ारी करे हम

उठाये कब तलक़ नखरे जहाँ के
कहाँ तक नाज़ बर्दारी करे हम

उठो काँटों के बदले फूल बाँटे
चलो ये सिलसिला जारी करे हम

सफर पे जाने कब जाना पड़ेगा
चलो थोड़ी सी तैयारी करे हम

मरासिम दर्द से ग़हरे हैं मेरे

मसाइब हमसफ़र रहते हैं मेरे
मरासिम दर्द से ग़हरे हैं मेरे

कोई जब पोंछने वाला नहीं है
तो फिर ये अश्क़ क्यों बहते है मेरे

सभी रस्ते हुए मसदूद जब तो
तेरी जानिब क़दम उट्ठे हैं मेरे

मुझे ग़ैरों से कब शिकवा है कोई
मुख़ालिफ़ आज तो अपने हैं मेरे

नहीं आती मुझे तख़रीब कारी
नज़रिये आपसे अच्छे है मेरे

कहा उसने सिया साँसो पे तेरी
तेरी हर फ़िक्र पर पहरे मेरे

जीते जी ख़ुद को मार डाला है

दर्द क्यों दिल में ऐसा पाला है
जीते जी ख़ुद को मार डाला है

शीशा ए दिल रक्खा जहाँ मैंने
उसने पत्थर वहीं उछाला है

तब तलक़ ख़ैरियत मनाओ तुम
जब तलक इस ज़ुबाँ पे ताला है

मुँह छिपाए है सच अँधेरे में
झूठ का मुंह पे अब उजाला है

कौन पूछे यहाँ लियाक़त को
चापलूसी का बोलबाला है

आज के दौर में सिया कैसे
हमने ईमान को संभाला है
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मेरे जज़्बों की कहाँ तुमने हिमायत की है

तुमने महसूस कहाँ मेरी ज़रूरत की है
मेरे जज़्बों की कहाँ तुमने हिमायत की है

हाल पूछा न किसी ने मेरे आँसू पोंछे
क्या किसी से भी नहीं मैंने मोहब्बत की है

खुश थी मैं छोटे से घर में भी तेरे प्यार के साथ
मैंने कब तुझसे किसी महल की चाहत की है

सोचती हूँ मैं यही बैठ के तन्हाई में
क्या यक़ीं करके तेरा मैंने हिमाकत की है

आज फिर शहर में उट्ठेगा कोई हंगामा
आज सच कहने की इक शख़्स ने ज़ुर्रत की है

कितना रोई हूँ तेरे बाद तुझे क्या मालूम
मैंने लम्हों की अदा इस तरह कीमत की है

किस तरह मिलता सिया सारे ज़माने से मिज़ाज
बात कुछ और नहीं बात तबियत की है

अब ज़रा चैन से जिया जाए

क्या कहा जाए क्या सुना जाए
इससे बेहतर है चुप रहा जाए

तल्ख़ियों को भुला दिया जाए
अब ज़रा चैन से जिया जाए
कौन ढूंढें इलाज दर्दों का
ज़ायका ग़म का भी चखा जाए

ख़्वाब अश्कों में बह गए सारे
राख को भी बहा दिया जाए

मैं अधूरा सा इक फ़साना हूँ
क्यूँ मुक़म्मल मुझे पढ़ा जाए

तू नहीं तो तेरा तसव्वुर ही
दर्द ए दिल का मेरे बढ़ा जाए

मैं भी तनहा हूँ चाँद भी तनहा
क्यों न अब रात से मिला जाए

लम्हा उधड़ रही हूँ 'सिया '
वक़्त का पैरहन सिया जाए

खुद अपने आप को बर्बाद कर रही हूँ मैं

-दम उसकी झूठी मोहब्बत का भर रही हूँ मैं
खुद अपने आप को बर्बाद कर रही हूँ मैं

मेरी उड़ान मुझे कर न दें कहीं गुमराह
खुद अपनी सोच के ही पर कतर रही हूँ मैं

मेरी अना की गया है वो किर्चियां करके
चुभन सी हर घड़ी महसूस कर रही हूँ मैं

यक़ीन प्यार का अब आँधियों की जद में हैं
मुझे संभाल लो आकर बिखर रही हूँ मैं

मैं अपने क़दमों की आहट भी सुन नहीं पाती
ख़ुदा ही जाने कहाँ से गुज़र रही हूँ मैं

तेरे ख़ुलूस ने इतना किया मुझे मोहतात
खुद अपने जिस्म के साये से डर रही हूँ मैं

शदीद धूप मेरे सर पे ग़म की है लेकिन 
इस इम्तेहां की तपिश में निखर रही हूँ मैं 
`
लगाओ अब मेरी कमज़ोरियों का अंदाज़ा
जो वादा करके भी तुमसे मुकर रही हूँ मैं

मेरी हयात में दो चार लम्हे बाक़ी है
ठहर जा मौत ज़रा सा संवर रही हूँ मैं

वो अब नहीं है तो महफ़िल में कैसा मातम है

वो जिससे  जीते जी पूछा  नहीं की क्या ग़म है   
वो अब नहीं है तो महफ़िल में कैसा  मातम है 

हमारी नींद भी हमको सुक़ून दे कैसे 
हमारी आँखों में आया जो  ख्वाब भी नम है 

न पूछो मुझसे मेरी तुम  उदासियों का सबब  
जो खा रहा है मुझे  रात दिन  वो क्या  ग़म है 

मैं अपने आप से तो मुतमइन नहीं लेकिन 
 तुम्हारी ज़ात पे मेरा यक़ीन-ए-मोहकम  है 

कहूँ मैं कैसे मेरी उम्र तुझको लग जाए 
मैं जानती हूँ मेरी ज़िंदगी बहुत कम है 

नहीं उजाले मुक़द्दर में है सिया तेरे 
जलाया धूप ने जिसको तू ऐसी शबनम है 

छोड़ जाएंगे यहाँ हम तो सुखन की खुशबू

याद रह जायेगी बस फ़िक्र की फन की खुशबू
छोड़ जाएंगे यहाँ हम तो सुखन की खुशबू

थरथाते हुए लफ़्ज़ों से मेरे ज़ाहिर है
मेरे लहजे में उतर आई थकन की खुशबू

कुछ शहीदों ने बहाया है लहू सरहद पर
हर तरफ फैल गयी मेरे वतन की खुशबू

उसका पैकर है की इक इत्र का मजमुआ है
जैसे इक गुल में सिमट आये चमन की खुशबू

खासियत है ये मेरे मुल्क की दुनिया वालो
मिलके रहती है यहाँ गंग ओ जमन की खुशबू

तेरे आमाल बता देंगे हकीकत तेरी
छुप नहीं सकती सिया चाल चलन की खुशबू

जिसे याद रखना था उम्र भर उसे एक पल में भुला दिया।

मुझे इस जहान से क्या मिला, मुझे इस जहान ने क्या दिया। जिसे याद रखना था उम्र भर उसे एक पल में भुला दिया।

ये अँधेरे मेरा नसीब थे, ये अँधेरे मेरे क़रीब थे, मुझे रास आ गयी तीरगी, तो चराग़ किसने जला दिया।

मैं हक़ीक़तो से थी बेख़बर, बड़ी मुतमइन थी मेरी नज़र
अभी महवे ख़्वाब थी नींद में ,मुझे आके किसने जगा दिया

मैं तो अपनी क़ैद में थी मगन, मुझे अपने दर्द से थी लगन
मुझे अब रिहाई का फ़ैसला, यहाँ आके किसने सुना दिया

जो मुसाफिरों को बताता था सभी रास्तों की हक़ीक़तें
उसे संगे राह समझ लिया, उसे रास्ते से हटा दिया।

तेरी याद ही मेरे साथ थी तुझे क्या मिला इसे छीन कर
ज़रा मुस्कुराये थे लब मिरे मुझे तूने फिर से रुला दिया।

मेरे हमसफ़र तुझे क्या खबर, मैं भटक रही हूँ इधर उधर
जिसे लोग कहते हैं ज़िंदगी मुझे उस  सफर ने थका दिया

यानि अल्लाह के बन्दों से मोहब्बत करने

-आप भेजे गए तकमील ए इबादत करने
यानि अल्लाह के बन्दों से मोहब्बत करने
हक़ न मज़लूमों का मजबूरों का मारा जाए
आप आये थे यहाँ हक़ की हिफाज़त करने
दोस्तों पर ही नहीं चश्मे करम थी उनकी
दुश्मनो से भी वो आये थे रिफ़ाक़त करने
आदमी कोई अधूरा ही न रह जाए कहीं
आये इंसान की वो पूरी ज़रूरत करने
रब की बख़्शी हुई नेमत का करो शुक्र अदा
सारी दुनिया को यह नसीहत करने

नसीब चैन हमें लम्हा भर भी हो या रब

मेरी दुआओं में इतना असर भी हो या रब
नसीब चैन हमें लम्हा भर भी हो या रब

हमारे हौसले भी अब जवाब देने लगे
कहीं पे ख़त्म हमारा सफ़र भी हो या रब

करूँ मैं अपनी ही मर्ज़ी से जिसकी आराइश
मेरे नसीब में इक ऐसा घर भी हो या रब

वो जिसकी याद से ग़ाफ़िल नहीं है पल भर भी
हमारे हाल की उसको खबर भी हो या रब

जिसे मैं सींच रही हूँ लहू से अपने सिया
ये एक पौधा किसी दिन शजर भी हो या रब

फिर आँसुओं को भी सबसे छुपाना पड़ता है

तुझे ए ज़िन्दगी कितना मनाना पड़ता है
के तुझ से रूठ के भी मुस्कुराना पड़ता है

ग़मे हयात पे रोना भी लाज़िमी है मगर
फिर आँसुओं को भी सबसे छुपाना पड़ता है

यक़ीन मानिये जिससे कोई उम्मीद नहीं
इक ऐसे शख्स से रिश्ता निभाना पड़ता है

ज़माना लाख हमें दे तस्सलियाँ लेकिन
ग़मो का बोझ हमें ख़ुद उठाना पड़ता है

नज़्म ----ये कैसा ख़्वाब



खबर कुछ भी नहीं मिलती तुम्हारी 
फ़ना तुम हो गए हो किस जहाँ में 
गए हो कौन से लम्बे सफर पर 
कहाँ हो ? कैसे हो? कुछ तो बताओ 
तुम्हारी राह तकते थक गयी हूँ 
तुम्हे अब ढूँढने निकली हूँ हमदम 


सफ़र की धूल से चेहरा अटा है 
थकन से हो गयी पलकें भी बोझल 
तुम्हे आवाज़ देते जा रही हूँ 
मेरी आवाज़ रुँधती जा रही है 
अचानक आँख मेरी खुल गयी है 
उठी हूँ नींद से मैं हड़बड़ा कर