Tuesday, 20 March 2012

दर्द ये क़ल्ब में पलता क्यों है


अश्क बन कर के निकलता क्यों है 
दर्द ये क़ल्ब में पलता क्यों  है 

जबकि फ़ानी है जहां की हर चीज़ 
फिर ये इंसान मचलता क्यों है 

कोई तो है जो बचाता हैं उसे 
वर्ना वो गिर के सभलता क्यों है

तुम न समझे की दिया मिटटी का 
तेज़ आंन्धी में भी जलता क्यों है 

जान बाकी न हो दीपक में तो फिर 
ये धुवाँ  उससे निकलता क्यों है 

वो जो आता है मुहाफ़िज़ बन कर 
वो दरिन्दे में बदलता क्यों है 

ashq ban kar ke nikalta kyo hai 
dard ye qalb mein palta kyo hai 

jabki fani hai jahan ki har cheez
fir ye insaan machlata kyo hai 

koyi to hain jo bachata hain use
varna wo gir ke sambhlata kyo hai 

tum n samjhe ki diya mitti ka 
tez aandhi mein bhi jalta kyo hai 

jaan baki n ho deepak mein to fir 
ye dhuvan usse nikalta kyo hai 

wo ja aata hain muhafiz ban kar 
wo darinde mein badalata kyo hain 

समन्दर सूख जाये तश्नगी का


अधूरा हैं सफ़र इस ज़िन्दगी का 
कोई अवसर नहीं है वापसी का 

मेरी आँखों से हो बरसात इतनी 
समन्दर सूख जाये तश्नगी का 

इसी इक आरज़ू में उम्र गुज़री
कोई तो पल मयस्सर हो ख़ुशी का 

मुसीबत का सबब ईमानदारी 
तमाशा बन गया है ज़िन्दगी का 

तेरी यादों के जंगल में खड़ी हूँ 
कोई धब्बा नहीं है तीरगी का 

रफू करती हूँ इतने चाक दिल के 
हुनर ख़ुद आ गया बखियागरी का 

चराग़े दिल जलती हूँ वहां मैं 
जहां दम टूटता हैं रौशनी का 

सिया से कोई क्यूं नाराज़  होगा 
कभी भी दिल दुखाया हैं किसी का ?

Wednesday, 14 March 2012

आदमी को हर तरह बांटा गया


इक शजर सरसब्ज़ था,काटा गया
आदमी को हर तरह बांटा गया

मिट गए दिल के सभी शिकवे _गिले
दूरियां को प्यार से पाटा गया

कोई मामूली न थी सतही चुभन
दिल की गहराई तलक काँटा गया

दिल में फिर उम्मीद की शम्में जली
बज उठी शहनाई,सन्नाटा गया

सोचती हूँ क्यूं सिया केवल मुझे
आज़माइश के लिए छांटा गया

Friday, 9 March 2012

बस ये ही चाहते हैं भला हो बुरा न हो


ग़ज़ल 

क्या हो हमारी रामकहानी में क्या न हो 
बस ये ही चाहते हैं भला हो बुरा न हो 

देखा है हम ने बज़्म में छुप छुप के आप को
"ये देखते हुए कि कोई देखता न हो"

वह शख्स जिस ने बाँट लिए हैं जहाँ के ग़म
इन्सां की शक्ल में वो कहीं देवता न हो 

तुम सब के ऐब ढूंढ चुके अब करो यह काम
ऐसी जगह पे जाओ जहाँ आइना न हो

मुजरिम पिसर के बाप ने मांगी है ये दुआ
या रब मिरी ज़बां पे कभी बद दुआ न हो

हो जाये तर हर एक मुहब्बत की ओस से
नफरत की मेरे मुल्क में कोई हवा न हो 

इक बार देखना है “सिया” उस का अस्ल रूप 
लगता है डर वो शख्स कहीं बेवफ़ा न हो

मुद्दत में जो बना था वह पल में बिखर गया


इक रिश्ता जोड़ने   में ज़माना गुज़र गया  
मुद्दत में जो बना था वह पल में बिखर गया

हम किस तरह यकीन करें उसकी बात का  
सौ बार   जिस ने  वादा किया और मुकर गया   
  
वह दर्द था के जिस से संभलना मुहाल था
अच्छा  हुआ के दर्द का एहसास मर गया  

परदेस में जो ठोकरें खाता है रात दिन
पूछो ये उस से छोड़के  क्यों अपना घर गया  

फिर दिल के इस मकां में आता वह किस तरह  
इक बार ऐ  सिया जो नज़र से उतर गया

अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे


अपने दिल से तेरी यादों को मिटाऊं कैसे
 अपनी आँखों को नए ख्वाब  दिखाऊ कैसे 

कागज़ी फूलों को कमरे में सजाऊ कैसे 
मैं बनावट के उसूलो से निभाऊ कैसे 

मेरे एहसास की तन्हाई का जिद्दी बच्चा
 सो गया हैं तो उसे हाथ लगाऊं  कैसे 

मैं भी कर सकती थी उस जैसी खताए सारी 
अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे   

नफरते घर को कभी घर नहीं रहने देती
\अपने बच्चो को यहीं बात बताऊ कैसे ?

 गैर  दुश्मन हों तो मैं उनको मिला दूं लेकिन 
भाई दुश्मन हों तो फिर उनको मिलाऊं कैसे ?

यूं तो मैं छुप  के ज़माने से खताएं कर लूं  
अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे 

उम्र भर तुझ  से मेरे दोस्त मोहब्बत की है
दिल में नफरत मैं तेरे वास्ते लाऊं कैसे 

कोई आंसू न सितारा,न कोई चिंगारी 
जुल्मते शब् में कोई कोई दीप जलाऊ कैसे  

तू ही बतला दे मुझे रूठ के जाने वाले
दिल पे गुजरी जो क़यामत वह  सुनाऊं कैसे 

दिल की दुनिया तो है पथरीली ज़मीं की मानिंद 
सोचती हूँ की कोई फूल खिलाऊ कैसे 

जिसको पाने की तमन्ना में गवायाँ खुद को
 ए सिया मैं उसे पाऊ भी तो पाऊ कैसे ..

तो ख़ुदा की तुझपे रहमत हो गयी

एक ग़ज़ल आप सबकी नज्र.........

सच्चे दिल से ग़र इबादत हो गयी
तो ख़ुदा की तुझपे रहमत हो गयी 

रंज से फिर मुझको राहत हो गयी
सब तुम्हारी ही बदौलत हो गयी

ज़िक्र जब भी बेवफाई का हुआ
आपकी क्यों स्याह रंगत हो गयी

ज़िन्दगी मेरी संवरने सी लगी
जब से मेरी नेक सोहबत हो गयी

मर गया हैं भूख से फिर इक गरीब
हाकिमे दौरां को राहत हो गयी

गावं से आये थे तो सच्चे थे तुम
झूठ की अब तुमको आदत हो गयी

बूढी माँ का दिल दुखाया था बहुत
इसलिए बद्तर ये हालत हो गयी

बरिशे संगे_मलामत हो तो हो
मुझको सच कहने की आदत हो गयी

आज़िज़ी से अपना हक माँगा सिया
आपकी ख़ातिर बग़ावत हो गयी ...