Friday, 9 March 2012

तो ख़ुदा की तुझपे रहमत हो गयी

एक ग़ज़ल आप सबकी नज्र.........

सच्चे दिल से ग़र इबादत हो गयी
तो ख़ुदा की तुझपे रहमत हो गयी 

रंज से फिर मुझको राहत हो गयी
सब तुम्हारी ही बदौलत हो गयी

ज़िक्र जब भी बेवफाई का हुआ
आपकी क्यों स्याह रंगत हो गयी

ज़िन्दगी मेरी संवरने सी लगी
जब से मेरी नेक सोहबत हो गयी

मर गया हैं भूख से फिर इक गरीब
हाकिमे दौरां को राहत हो गयी

गावं से आये थे तो सच्चे थे तुम
झूठ की अब तुमको आदत हो गयी

बूढी माँ का दिल दुखाया था बहुत
इसलिए बद्तर ये हालत हो गयी

बरिशे संगे_मलामत हो तो हो
मुझको सच कहने की आदत हो गयी

आज़िज़ी से अपना हक माँगा सिया
आपकी ख़ातिर बग़ावत हो गयी ...

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