Friday, 9 March 2012

अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे


अपने दिल से तेरी यादों को मिटाऊं कैसे
 अपनी आँखों को नए ख्वाब  दिखाऊ कैसे 

कागज़ी फूलों को कमरे में सजाऊ कैसे 
मैं बनावट के उसूलो से निभाऊ कैसे 

मेरे एहसास की तन्हाई का जिद्दी बच्चा
 सो गया हैं तो उसे हाथ लगाऊं  कैसे 

मैं भी कर सकती थी उस जैसी खताए सारी 
अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे   

नफरते घर को कभी घर नहीं रहने देती
\अपने बच्चो को यहीं बात बताऊ कैसे ?

 गैर  दुश्मन हों तो मैं उनको मिला दूं लेकिन 
भाई दुश्मन हों तो फिर उनको मिलाऊं कैसे ?

यूं तो मैं छुप  के ज़माने से खताएं कर लूं  
अपनी नज़रों से मगर खुद को गिराऊ कैसे 

उम्र भर तुझ  से मेरे दोस्त मोहब्बत की है
दिल में नफरत मैं तेरे वास्ते लाऊं कैसे 

कोई आंसू न सितारा,न कोई चिंगारी 
जुल्मते शब् में कोई कोई दीप जलाऊ कैसे  

तू ही बतला दे मुझे रूठ के जाने वाले
दिल पे गुजरी जो क़यामत वह  सुनाऊं कैसे 

दिल की दुनिया तो है पथरीली ज़मीं की मानिंद 
सोचती हूँ की कोई फूल खिलाऊ कैसे 

जिसको पाने की तमन्ना में गवायाँ खुद को
 ए सिया मैं उसे पाऊ भी तो पाऊ कैसे ..

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