Tuesday, 20 March 2012

समन्दर सूख जाये तश्नगी का


अधूरा हैं सफ़र इस ज़िन्दगी का 
कोई अवसर नहीं है वापसी का 

मेरी आँखों से हो बरसात इतनी 
समन्दर सूख जाये तश्नगी का 

इसी इक आरज़ू में उम्र गुज़री
कोई तो पल मयस्सर हो ख़ुशी का 

मुसीबत का सबब ईमानदारी 
तमाशा बन गया है ज़िन्दगी का 

तेरी यादों के जंगल में खड़ी हूँ 
कोई धब्बा नहीं है तीरगी का 

रफू करती हूँ इतने चाक दिल के 
हुनर ख़ुद आ गया बखियागरी का 

चराग़े दिल जलती हूँ वहां मैं 
जहां दम टूटता हैं रौशनी का 

सिया से कोई क्यूं नाराज़  होगा 
कभी भी दिल दुखाया हैं किसी का ?

1 comment:




  1. सिया से कोई क्यूं नाराज़ होगा
    कभी भी दिल दुखाया हैं किसी का ?

    आहाऽऽहाऽऽऽ…
    क्या अंदाज़ है ! बहुत प्यारा मक़्ता है …
    आदरणीया सिया सचदेव जी
    सस्नेहाभिवादन !
    सादर नमन !
    आदाब !

    आपके ब्लॉग की बहुत सारी ग़ज़लें और गीत पढ़ने के बाद ख़ुद को फ़िलहाल किसी और ही जहां में महसूस कर रहा हूं …
    :)

    इस ग़ज़ल के ये शे'र बहुत बहुत अच्छे लगे …
    अधूरा हैं सफ़र इस ज़िंदगी का
    कोई अवसर नहीं है वापसी का

    मेरी आंखों से हो बरसात इतनी
    समंदर सूख जाये तश्नगी का

    मुसीबत का सबब ईमानदारी
    तमाशा बन गया है ज़िंदगी का

    तेरी यादों के जंगल में खड़ी हूं ★
    कोई धब्बा नहीं है तीरगी का

    रफू करती हूं इतने चाक दिल के ★
    हुनर ख़ुद आ गया बखियागरी का

    चराग़े दिल जलाती हूं वहां मैं
    जहां दम टूटता हैं रौशनी का


    वाह वाह वाह कहता ही जा रहा हूं …

    *महावीर जयंती* और *हनुमान जयंती*
    की शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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