Friday, 4 April 2014

कभी हद्दों से तो बाहर मैं जा नहीं सकती


नज़र से खुद को मैं अपनी गिरा नहीं सकती
कभी हद्दों से तो बाहर मैं जा नहीं सकती
मेरे वजूद में तहज़ीब साँस लेती है
जदीद तर्ज़ पे खुद को गँवा नहीं सकती
किसी ने शहर में अफ़वाह ये उड़ा दी है
चराग़ लेके मैं आँधी में जा नहीं सकती
किये है तुमने जो एहसान बारहा मुझ पर
ये क़र्ज़ मर के भी तेरा चुका नहीं सकती
वो एक दिल मैं जिसे आइना समझती हूँ
मैं उसके सामने चेहरा छुपा नहीं सकती
तेरे फ़रेब ने मोहतात कर दिया मुझको
मैं दिल पे और नए ज़ख्म खा नहीं सकती
अजीब लोग है अपनी ग़रज़ से मिलते हैं
सिया मैं उनसे ताल्लुक़ निभा नहीं सकती
nazar se khud ko main apni gira nahin sakti
kabhi hado'n se to bahar main ja nahi sakti
mere wajood me tahzeeb saans leti hai .
jadeed tarz pe khud ko ganwa nahi sakti
kisi ne shahar mein afwaah kyun uda di hai
charagh leke main aandhi mein ja nahin sakti
kiye hain tumne jo ehsaan barha mujhpar
ye qarz mar ke bhi tera chuka nahi sakti
wo ek dil main jise aaeina samajhti hoon .
main uske saamne chehra chupa nahi sakti
tere fareb ne mohtat kar diya mujh ko
main dil pe aur naye zakhm kha nahin sakti
ajeeb log hain apni gharaz se milte hain ..
siya main unse ta'alluq nibha nahi sakti

1 comment:

  1. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

    ReplyDelete