Thursday, 17 April 2014

रिश्तों के सूखे है उपवन

रिक्त हुआ है मन का आँगन 
रिश्तों के सूखे है उपवन

महज़ औपचारिकता बरतें 
कहाँ दिलों में है अपनापन 

चकनाचूर हुए है सपनें 
छलनी छलनी है मेरा मन 

इक तूफ़ान उठा है दिल में 
अश्क़ों से भीगा है दामन

उनको दर्द सुनाये क्योंकर
पत्थर जैसा है जिनका मन

ऐसे भी कुछ क्षण आते हैं
मुश्किल हो जाता है जीवन

3 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (27-04-2014) को ''मन से उभरे जज़्बात (चर्चा मंच-1595)'' पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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  2. वाह !
    कृपया निम्नानुसार कमेंट बॉक्स मे से वर्ड वैरिफिकेशन को हटा लें।

    इससे आपके पाठकों को कमेन्ट देते समय असुविधा नहीं होगी।

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    http://www.youtube.com/watch?v=VPb9XTuompc

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