Sunday, 2 March 2014

फिर इस माहौल में कैसे गुज़र है

dara sahma hua sa har bashar hai 
phir is mahoul mein kaise guzar hai 

sarapa dard se lipti udaasi 
yahaN aaNsu bahati raat bhar hai 

kabhi khul ke haNsi aati nahiN ab 
lagi kiski buri mujhko nazar hai

Dayar-e-Gair Mein kyun aa gayi hoon
koyi sunta nahiN meri idhar hai

shikayat kya kisi se hum kareN jab
hamare haal ki unko khabar hai

डरा सहमा हुआ सा हर बशर है
फिर इस माहौल में कैसे गुज़र है

सरापा दर्द से लिपटी उदासी
यहाँ आंसू बहाती रात भर है

कभी खुल कर हँसी आती नहीं अब
लगी किसकी बुरी मुझको नज़र है। ...

दयार ए ग़ैर में क्यूँ आ गयी हूँ
कोई सुनता नहीं मेरी इधर है

शिकायत क्या किसी की हम करे जब
हमारे हाल की उनको खबर है

2 comments:

  1. मार्मिक ......................

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  2. वाह वाह यथार्थवादी हालात से उपजी सुन्दर ग़ज़ल
    बधाई

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