Wednesday, 26 February 2014

आशियाँ लुट गया है चाहत का

ऐसा टूटा भ्रम मोहब्बत का 
आशियाँ लुट गया है चाहत का 

कैसे तुमको पुकारती बोलो 
दरमयां था सवाल ग़ैरत का 

तेरी जिद्द थी ग़ुरूर था क्या था 
जो सबब बन गया बगावत का 

कैसे गुज़री उदास शाम मेरी 
हाल मत पूछ दिल की हालत का

बीते लम्हें टटोलती हूँ मैं
एक पल भी मिले जो फुर्सत का

मेरे सर पे करम रहा हरदम
मेरे ख़ालिक़ तुम्हारी रहमत का

झूठ का आज बोलबाला है
हर तरफ दौर है सियासत का

चल सिया अब यहाँ से कूच करे
वक़्त अब आ गया है हिजरत का

aisa tuta bharam mohbbat ka
aashiyaan lut gaya hai chahat ka

kaise tumko pukarati bolo
darmyaN tha sawal ghairat ka

teri zidd thi ghurur tha kya tha
jo sabab ban gaya bagavat ka

kaise guzri udaas shaam meri
haal mat puch dil ki halaat ka

beete lamhe tatolti hoon main
ek pal bhi mile jo fursat ka

mere sar pe raha karam hardam
mire khaliq tumahari rahmat ka

jhooth ka aaj bolbala hai
har taraf daur hai siyasat ka

chal siya ab yahan se kunch kare
waqt ab aa gaya hai hijrat ka

3 comments:

  1. आपकी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    --
    आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल सोमवार (03-03-2014) को ''एहसास के अनेक रंग'' (चर्चा मंच-1540) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!

    ReplyDelete
  2. बहुत शानदार गजल , बधाई आपको ।

    ReplyDelete