Friday, 31 January 2014

ख़त्म कब आज़माइशें होंगी




 जब दरे दिल पे दस्तकें होंगी
ताज़ा फिर कुछ हिकायतें होंगी 

जितनी नज़दीक आहटें होंगी 
उतनी बेताब धड़कने होंगी 

दिल को क्यूँ मेरे उलझने होंगी 
कहने वालों की अटकलें होंगी 

 शाख़  पे जब न कोयलें होंगी 
 कैसे गीतों की बारिशें होंगी 

कब तलक वक़्त इम्तेहान लेगा 
ख़त्म कब आज़माइशें होंगी 

एक दिन तो मिलेगी आज़ादी 
जब ये बेज़ा न  बंदिशे होंगी 

उतने होंगे तसव्वुरात  अज़ीम 
फ़िक्र में जितनी वुसअतें होंगी 

टूटे दिल कब जुड़ेंगे ए मौला 
हमपे कब तेरी  रहमतें होंगी 

ज़िंदा रहने का है ये जुर्माना 
ज़िंदगी है तो  मुश्किलें होंगी 

कब से दहलीज़ पर पड़ी हूँ मैं 
आपकी कब इनायतें होंगी 

 याद भूले से हमको कर लेना 
आप को जब भी फ़ुर्सतें होंगी 

jab dar e dil pe dastkeN hoNgi
taza phir kuch hikayeteN hoNgi

jitni nazdeek aahteN hoNgi
utni betaab dhadkane hoNgi

dil ko kyun mere uljhane hoNgi
kahne waloN  ki atkaleN hoNgi

shakh pe jab na koyleN  hoNgi 
kaise geetoN ki barisheN  hoNgi 

kab talak  waqt imtehaan lega
khatm kab
 aazmaisheN hoNgi 

ek din to milegi aazaadi 
jab ye beja n  bandisheN hoNgi
utne hoNge taswwuraat azeem 
fikr mein jitni wusateN hoNgi 

tute dil kab judeNge  aye maula 
humpe kab teri rahmate'N  hoNgi 

jinda rahne ka hai ye jurmana 
zindgi hai to mushkileN  hoNgi

kab se dehleez par padi hoon main 
aapki kab inayteN hoNgi 

yaad bhule se humko kar lena 
aap ko jab bhi fursateN hoNgi 

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