Tuesday, 29 October 2013

मुद्दत से अपने आप को भूली हुई हूँ मैं

रिश्तों कि कायनात में सिमटी हुई हूँ मैं 
मुद्दत से अपने आप को भूली हुई हूँ मैं 

गो ख़ुशनसीब हूँ मेरे अपनों का साथ हैं 
तन्हाइयों से फिर भी क्यों लिपटी हुई हूँ मैं 

दम घोंटती रही  हूँ तमन्ना का हर समय 
इन हसरतों की क़ब्र सजाती रही हूँ मैं 

आती है याद आपकी मुझको कभी कभी 
ऐसा नहीं कि आपको भूली हुई हूँ मैं 

उस चाराग़र को ज़ख्म दिखाऊ या चुप रहूँ 
इस कश्मकश में आज भी उलझी हुई हूँ मैं 

हूँ फिक्रमंद आज के हालात देख कर
बेटी कि माँ हूँ इस लिए सहमी हुई हूँ मैं 

 जज़्बात कैसे नज़्म करू अपने शेर में 
कब से इसी ख्य़ाल में डूबी हुई हूँ मैं 

बेकार ज़िंदगी में ये कैसी ख़लिश सिया
सब कुछ मिला है फिर भी कमी ढूढ़ती हूँ मैं 


rishtoN ki kaynaat mein simti hui hooN main 
muddat se apne aap ko bhuli hui hooN main 

go Khushnaseeb HooN mere apne ka sath hai 
tanhaiyoN se fir bhi kyuN lipti hui hooN main 

dam ghont'ti rahi hooN tamnna ka har samay 
in hasratoN ki qabr sajaati rahi hooN main 

aati hai yaad aapki mujhko kabhi kabhi 
aisa nahiN ki aapko bhuli hui hoon main 

us charagar ko zakhm dikhauN ki chup rahuN 
is kashmaksh mein aaj tak uljhi hui hooN main 

hooN fikrmand aaj ke haalaat dekh kar 
beti ki ma hooN is liye Sehmi Hui hooN main 

 Jazbaat kaise nazm karu apne sher mein 
kab se isi khyaal mein dubi hui hooN main
bekaar zindagi mein ye kaisi khalish 'siya' sab kuch mila haiN,phir bhi kami dhudhti hoon main

Sunday, 27 October 2013

मैं हूँ इन्सां मुझे इन्सान नज़र आता है

मुझको हिन्दू न मुसलमान नज़र आता है 
मैं हूँ इन्सां मुझे इन्सान नज़र आता है 

किस क़दर पावँ पसारे हैं हवस ने हरसू 
आज हर शख्स परेशान नज़र आता है 

एक चेहरा भी दिखाई नहीं देता उसको 
आज तो आईना हैरान नज़र आता है 

आज इंसान तो ढूंढे नहीं मिलता मुझको 
जिस तरफ देखिये हैवान नज़र आता है

आपने सच की हिमायत में उठाया है कलम
हाँ मुझे आपका नुकसान नज़र आता है

रूह ए इन्सां भी दिखाई नहीं देती मुझको
शह्र का शह्र बियांबान नज़र आता है

पूछती है ये सिया मेरे सुखन में तुमको
वाकई क्या कोई इमकान नज़र आता है

mujhko hindu n musalmaan nazar aata hai
main hoon insaaN mujhe insaan nazar aata hai

kis qadar pavN pasaare haiN havas ne harsoo
aaj har shakhs pareshan nazar aata hai

ek chehra bhi dikhayi nahiN deta usko
aaj to aaina hairaaN nazar aata hai

aaj insaan to dhundhe nahiN milta mujhko
aaj har aadmi haivaan nazar aata hai

aapne sach ki himayat mein uthaya hai kalam
haan mujhe aapka nuksaan nazar aata hai

rooh e insaaN bhi dikhayi nahiN deti mujhko
shahr shahr biyabaan nazar aata hai

puchti hai ye siya mere sukhan mein tumko
waqyi kya koi imkaan nazar aata hai

siya

पुराना ज़ख्म फिर होगा हरा क्या

ये तुमने आज मुझसे कह दिया क्या 
पुराना ज़ख्म फिर होगा हरा क्या 

तुम अपने अज्म को मोहक़म करो ख़ुद 
किसी से माँगती हो हौसला क्या 

हमेशा ख़ुद को देखा आईने में 
तुम्हें दुनिया के ग़म से वास्ता क्या 

घने सायें हैं तेरे सर के ऊपर 
तपिश इस धूप की तुमको पता क्या

अभी तक थीं अँधेरे में सिया तुम
समझ अब आई दुनिया हैं बला क्या

ye tumne aaj mujhse kah dia kya
puarana zakhm fir hoga hara kya

tum apne azm ko mohqam karo khud
puarana zakhm fir hoga hara kya

hamesha khud ko dekho aaine mein
tumhe auron ke gham se wasta kya

ghane saayeN haiN tere sar ke upar
tapish is dhoop ki tumko pata kya

abhi tak theeN andhere mein 'siya' tum
samajh ab aayi duniya haiN bala kya ....

Saturday, 5 October 2013

जला है ज्ञान का दीपक उन्ही के जीवन में

जो बरसों डूबे रहें हैं पठन में, चिंतन में 
जला है ज्ञान का दीपक उन्ही के जीवन में 

परम्पराओं की इन बेड़ियों के बोझ तले
कटी है उम्र मेरी हर घड़ी ही उलझन में

यहाँ ग़रीबों को मिलती नहीं है क्यूँ रोटी
ये-वेदना ये व्यथा बस गई मेरे मन में

इसी उमीद पे गुजरी है ज़िंदगी अपनी
कभी तो आप नज़र आयें मेरे दरपन में

बस एक फ़ूल की क़िस्मत की आरजू की थी
तमाम काँटे सिमट आये मेरे दामन में

इस एक सच को समझने में लग गयी सदियाँ
बसे है राम सिया की हर एक धड़कन में

Wednesday, 2 October 2013

अब कोई सिलसिला नहीं बाक़ी

ज़िंदगी की दुआ नहीं बाक़ी 
अब कोई सिलसिला नहीं बाक़ी 

जिंदगी तुझ पे राय क्या दू मैं 
अब कोई तब्सरा नहीं बाक़ी 

वक़्त-बेवक़्त क्यूँ बरसते हैं 
बादलों में हया नहीं बाक़ी 

रंज, उलझन, घुटन, परेशानी 
रोग़ कोई  रहा नहीं बाक़ी 

मेरे दिल में तो बस तुम्ही तुम हो 
अब कोई दूसरा नहीं बाक़ी 

अपनी मंज़िल को छू लिया मैंने 
कोई मक़सद रहा नहीं बाक़ी 

मेरे दुश्मन के क़ल्ब में फ़िलवक़्त 
जंग का हौसला नहीं बाक़ी 

जीत रक्खा है मैंने अपने को 
मुझ में कोई अना नहीं बाक़ी 

अश्क़ आँखों में आ गये हैं सिया 
ज़ब्त दिल पर ज़रा  नहीं बाक़ी 

zindgi ki dua nahiN baaqi 
ab koi silsila nahiN baaqi 

zindgi tujh pe rai kya du main 
ab koi tabsra nahiN baaqi 

waqt bewaqt kyun barasate haiN 
Badlo mein haya nahiN baaqi 

ranj,uljhan,ghutan,pareshani 
rog koi raha nahiN baaqi

mere dil mein to bus tumhi tum ho 
ab koi dusra nahiN baaqi

apni manzil ko chhu liya maine 
koi maqsad raha nahiN baaqi

mere dushman ke qalb mein philwaqt
jung ka housla nahiN baaqi

jeet rakkha hai maine apne ko 
mujh mein koi ana nahiN baaqi....

ashq aankhoN mein aa gaye haiN siya 
zabt dil par zara  nahiN baaqi....