Saturday, 6 July 2013

जाने क्यों लोग हमसे जलते हैं

हम तो हँस कर ही सबसे मिलते हैं 
जाने क्यों लोग हमसे जलते हैं 

अब ये दुनिया फरेब लगती है 
आज कल घर से कम निकलते हैं 

ऐसे रिश्तों को क्या सहेजे हम 
जो बुरे वक़्त पे बदलते हैं 

आईना देखकर हो क्यूँ हैराँ 
एक दिन रूप रंग ढलते हैं 

वो ही है कामयाब दुनिया में 
वक़्त के साथ जो बदलते हैं 

घर से निकले तो बस यहीं सोचा 
हादसे साथ साथ चलते हैं 

कितना इंसान हो गया हिंसक 
देख कर जानवर दहलते हैं 

चापलूसों की जिंदगी मत पूछ 
भीख की रोटियों पे पलते हैं 

रोज़ ही कुछ चिराग़ बुझते हैं 
 रोज़ ही कुछ चिराग़ जलते हैं 

क्यूँ हैं इंसान में हसद इतनी 
लेके नफरत क्यूँ दिल में जलते हैं 

मेरे बच्चे ज़हीन हैं इतने 
ये खिलौनों से कब बहलते हैं 

आँधियाँ जो दिए जलाती है 
वो दिए ज़ुल्मतों को खलते हैं 

तंज ख़ुद ही कर लिया जाए 
आइये ज़ाएका बदलते हैं 

hum to hans kar hi sabse milte hain 
jane kyun log humse jalte hain

ab ye duniya fareb lagti hai 
aaj kal ghar se kam nikalte hain ...

ise rishton ko kya saheje hum jo bure waqt pe badalate hain 

wo hi hai qamyaab duniya mein 
waqt ke saath jo badalte hain 

Aaina dekh kar ho kyun hairaan 
ek din roop rang dhalte hain

ghar se nikle to bus yaheen socha 
hadse sath sath chalte hain

kitna insaan ho gaya hinsak 
dekh kar janvar dahalate hain

chaapluso'n ki zindgi mat puch 
bheek ki rotiyon pe palte hain

mere bachche zaheen hain itne 
ye khilone se kab bahalte hain

roz hi kuch chirag bujhte hain 
roz hi kuch charag jalte hain

kyun hain insan mein hasad itni 
le ke nafrat kyun dil mein jalte hain

andhiyaan jo diye jalaati hai 
wo diye zulmato'n ko khalte hain

tanz khud pe hi kar liya jaaye 
aaiye zaika badalate hain

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