Monday, 22 July 2013

मुझको सब्र ओ करार दे या रब

दिल से उसको उतार दे या रब 
मुझको सब्र ओ करार दे या रब 

रात दिन बस तेरी इबादत हो
ज़िंदगी यूं संवार दे या रब

नूर से तेरे जगमगा उट्ठू
मुझको ऐसे निखार दे या रब

जिसने दिल को मेरे दुखाया है
उसको खुशियाँ हज़ार दे या रब

अब तो बदले खिज़ा का ये मौसम
मुझको फ़स्ल ए बहार दे या रब

ग़म से थोड़ी निजात मिल जाए
इतनी किस्मत संवार दे या रब

बोझ एहसास ए जुर्म का है जो
मेरे दिल से उतार दे या रब

जिनके सर पे न कोई साया है
उनकी किस्मत संवार दे या रब

युहीं चमके सुहाग की बिंदिया
मुझको ऐसा सिंगार दे या रब

छीन ली मुझसे मेरी माँ तुमने
माँ के जैसा तू प्यार दे या रब

dil se usko utaar de ya rab
mujhko sabr o qarar de ya rab

Raat din bas teri ibadat ho
Zindgi yun guzaar de ya rab

noor se tere jagmaga uttho'n
zindgi yuun nikhar de ya rab

jisne dil ko mere dukhaya hai
usko Khushiyan hazaar de ya rab

ab to badle khiza'n ka ye mausam
mjhko fasl e bahaar de ya rab

Gham se thodi najaat mil jaae,
itni qismat saNwaar de yaa rab

Bojh ehsas e jurm ka hai jo
mere dil se utaar de ya rab.

jinke sar pe na koi saya hai
unki kismat sanvaar de ya rab

yuheen chmke suhag ki bindiyaa
mujhko aisa singaar de ya rab

cheen li tumne meri ma mujhse
ma ke jaisa tu pyaar de ya rab

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