Sunday, 23 June 2013

कितनी दुश्वार जिंदगी होगी

हौसलों में अगर कमी होगी 
कितनी दुश्वार जिंदगी होगी

ऐसी दुनिया तलाश करती हूँ
नेक बन्दों से जो बसी होगी

धन्य है माँ वो जिसने बच्चों को
सीख इंसानियत कि दी होगी

जाके ससुराल दुःख सहा उसने
अपने बाबा की लाड़ली होगी

छिन गयी है मेरे लबों से हँसी
बद्दुआ किसकी ये लगी होगी..

इतनी उम्मीद काहे दुनिया से 
ये भला कब तेरी सगी होगी 

आज से होंठ सी लिए मैंने
अब मेरे ग़म में भी कमी होगी

ग़म का मातम मनाऊ भी कितना
ये तो किस्तों में ख़ुद कुशी होगी

मेरी तस्वीर पे जमी कब से
धूल आँचल से पोंछती होगी

बूढी माँ का जो दिल दुखाया था
कैसे जीवन में फिर ख़ुशी होगी

ये सियासत लड़ाके आपसे में
बीज नफ़रत के बो रही होगी

माँ सिया आज बहुत याद आये
आज आँखों में फिर नमी होगी

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