Saturday, 9 February 2013

बोझ हस्ती का ही जब हमसे उठाया न गया


दिल में सोयी हुई यादों को जगाया न गया 
दश्त में शहर ए तमन्ना को उगाया न उगाया 

अपनी महफ़िल से भला खाक़ उठाती तुमको
 बोझ हस्ती का ही जब हमसे उठाया न गया 

इतना मजबूत रहा है तेरी यादों का हिसार 
ज़श्न ए तन्हाई भी अब हमसे मनाया न गया 

कर रहे है वो सभी प्रयावरण पे तक़रीर 
पेड़ गमले में कभी जिनसे लगाया न गया 

शोर ए मातम था बहोत आपकी बस्ती में ज़नाब
 ऐसे माहौल में हमसे भी तो गाया न गया 

दिल के जज़्बात को तहरीर किया है फिर भी 
मुझसे आगे मिरी रुसवाई का साया न गया 

क़ैद खाने के तरानों से बग़ावत उभरी 
ज़ुल्म से फ़िक्र को क़ैदी तो बनाया न गया 

मैंने इस दिल में बसा रक्खी हैं तेरी यादे
 दूसरा कोई भी इस शहर में आया न गया ...

1 comment:

  1. दिल के जज़्बात को तहरीर किया है फिर भी
    मुझसे आगे मिरी रुसवाई का साया न गया

    किस कदर तन्हा तेरी शायरी का मिज़ाज़ है
    तूने दिल में छुपा रक्खा क्या कोई राज़ है...........

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