Monday, 21 November 2011

किस ज़बां से उसको अनजाना कहूं


पहले अपने दिल को दीवाना कहूं 
फिर कहीं चाहत का अफसाना कहूं 


बारहा कहता है मुझ से मेरा दिल 
मैं तेरी आँखों को मयखाना कहूं 


कब से मेरे दिल में रहता है वोह शख्स 
किस ज़बां से उसको अनजाना कहूं 


मुझको  सच  कहने  की  आदत  है बहुत   
कातिलो  को  कैसे  दीवाना  कहू ..


कहता है दिल कम से कम इक बार तो 
शमा उस को खुद को परवाना कहूं 


जाने कब से  खुश्क है आंखे तेरी 
किस तरह  मैं  इसको मयखाना कहू  


ज़ेहल के  जो  लोग  पैरोकार हैं चाहते  है 
चाहते हैं मैं  उन्हें  दाना  कहू 


उस की मूरत बस गयी दिल में सिया 
फिर ना क्यूं इस दिल को बुतखाना कहूं

4 comments:

  1. बहुत खूब सिया जी .....

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  2. hausla afzaai ke liye tah-e-dil se mashkoor hoon vidya JI
    salamati ho

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  3. मुझको सच कहने की आदत है बहुत
    कातिलो को कैसे दीवाना कहू ..

    Behtreen Panktiyan...

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  4. खूबसूरत गजलें !फुरसत मे एक बार फिर पढ़ूँगा !

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