Thursday, 10 November 2011

जो कहनी ना हो वोह बात कह जाती हूँ मैं

रोज़  शब्  होते ही उसके घर को महकाती हूँ  मैं
बन के खुशबू उसके आँगन में बिखर जाती हूँ मैं

लोग कहते हैं भुलाना चाहता है वोह मुझे
इसका मतलब है के उसको अब भी याद आती हूँ मैं

ए मेरे महबूब आता है तो  फिर  जाया ना कर

 तुझ से इक पल भी बिछड़ जाऊ तो घबराती हूँ मैं

मेरी आँखें बोलती रहती हैं सच  मैं क्या करू

 उस से जो कहनी ना हो वोह बात कह जाती हूँ मैं

क्या  बताऊँ ज़िन्दगी  ने  क्या  दिया मुझको  सिया
रोज़ औरों के  गुनाहों की सजा पाती हूँ  मैं 


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