Sunday, 6 November 2011

सजदे में तेरे जिंदगी मेरी तमाम हो


ले दे के इस हयात में बस एक काम हो
मेरी जुबां से ज़िक्र तेरा सुब्ह ओ शाम हो

मैं उम्र भर तेरी ही इबादत में बस रहू 
सजदे में तेरे जिंदगी मेरी तमाम हो 

खिलते रहे चमन में मोहब्बत के फूल ही 
दुनिया में नफरतों का न कोई निजाम हो 

रुसवा जो हो गए हैं बहुत कमनसीब हैं 
ये कौन चाहता हैं जहाँ में न नाम हो 

हम तो तुम्हारे वास्ते करते हैं इक दुआ
सबके लबों पे आपका उम्दा कलाम हो 

नेकी की राह से कोई भटके न अब सिया 
अच्छाइयों का रास्ता इतना तो आम हो

2 comments:

  1. ले दे के इस हयात में बस एक काम हो
    मेरी जुबां से ज़िक्र तेरा सुब्ह ओ शाम हो

    मैं उम्र भर तेरी ही इबादत में बस रहू
    सजदे में तेरे जिंदगी मेरी तमाम हो ...........
    सिया जी .....खूबसूरत और सूफियाना कलाम ......इश्क की इन्तहा .....वाह और जिंदाबाद

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  2. JANAB HADI SAHEB aap jaise kabil shkas se daad milti hain to khud par thodha sa yakeen hone lagta hain .pasandagi ke liye main mashkoor-o-mamnoon hoon-salamati hO

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