Friday, 28 October 2011

वह फूल नहीं पाते जो काँटों को बोते हैं

छुप छुप के ज़माने से आँखों को भिगोते हैं
हम दिन में तो हँसते हैं पर रात में रोते हैं

तू ग़ैर का हो जाये और हम को क़रार आये
यह दर्द तो वो जाने जो अपनों को खोते हैं

बस फ़िक्र में दौलत की,हैं ऊंचे मकां वाले
उनसे तो ग़रीब अच्छे जो चैन से सोते हैं

अंजाम बुराई का होता है बुरा यारो
वह फूल नहीं पाते जो काँटों को बोते हैं

करते हैं "सिया" उसकी तस्वीर से हम बातें
तनहाई में रह कर भी तनहा नहीं होते हैं

4 comments:

  1. बहुत खूब सिया जी....

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  2. महेन्द्र श्रीवास्तव JI !! nawazish ke liye bahut bahut shukriya SALAMAT RAHE

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  3. VIDYA JI BAHUT BAHUT SHUKRIA AAPKA SALAMAT RAHE

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