Monday, 27 June 2011

चोट अपनों से ही हम खाते रहे


दर्द होता रहा छटपटाते रहे
चोट अपनों से अक्सर ही खाते रहे

दीदा-ए-नम छुपाकर ज़माने से हम
सामने सबके हम  मुस्कराते रहे

 दिल में आहे लिए,लब पे झूठी हसी 
गीत खुशियों के हम  गुनगुनाते रहे

भरने को ज़ख्म तो सारे  भर जायेगे
टीस जब भी उठे , हम कराहते रहे

बुत ये बेजान लेकर जमाने में हम
खुद को ज़िंदा है हरदम बताते रहे

रस्मे _दुनिया  का खुद हवाला दिया 
खुद से नज़रे हम अपनी चुराते रहे

दागे _ए _सीन _ए _दर्दे  ना पूछे कोई
जो जमाने से हरदम छुपाते रहे

बोझ दिल में छुपाये हुए हम सिया
उम्र भर दर्द-ओ-गम को  उठाते रहे

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