Friday, 10 June 2011

तन्हाईयो के साये


बेचैनियाँ ये दिल की  कैसे तुम्हे  बताएं
लफ्जों में दर्द अपना हम कर बयां न पाए



हालत हैं दीवानों  सी हैरान हूँ मैं  खुद पे
किस कशमकश से गुज़री कैसे ये हम बताये 



लाये कहाँ से इतना अंदाज़ -ए -हिम्मते हम
चेहरा बता रहा  हैं  कुछ तो गवां के आये


होकर  के बेखबर हम हँसते तो  कभी रोते
रहते हैं खुद में खोये ,खुद को समझ ना पाए


ये किस अधूरेपन की तकलीफ हो रही है
जो भीड़ में भी रहते तन्हाईयो के साये


सिया 

2 comments:

  1. "
    लाये कहाँ से इतना अंदाज़ -ए -हिम्मते हम
    चेहरा बता रहा हैं कुछ तो गवां के आये"

    बहुत बढ़िया...

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