Tuesday, 1 March 2011

मेरी आरज़ू

आओ कि ज़िन्दगी को बेहतर ज़रा बनाएं 
सब रंजिशे मिटा कर सबको गले लगाएं


हैं चार दिन का जीना क्यों ना जिए ख़ुशी से
मिल जुल के क्यों ना ऐसा प्यारा जहाँ बसाएं

वो सब गिले वो  शिकवे तुमको रहे किसी से
आओ कि  फिर से मिलके हम उनको भूल जाएं 


दुनिया में क्या रखा है, यारो सिवा वफ़ा के 
हर दुश्मनी मिटा के सबको वफ़ा सिखाएं 


फूलों के जैसी खुशबू , इंसानियत में महके 
हम आये हैं जहां में  कुछ करके भी दिखाएं

करना हैं इस जहां में तो कुछ ऐसा काम करलें 
दुनिया में लोग तुझको "सिया" भूल ही न पायें   


सिया  

1 comment:

  1. फूलों के जैसी खुशबू , इंसानियत में महके
    हम आये हैं जहां में कुछ करके भी दिखाएं..

    Beautiful Lines.. n too deep as well.
    beautiful write.
    very nice.
    :)

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