Monday, 28 February 2011

ग़ज़ल


एक दिल फरेब से हमें क्यूँ प्यार हो गया
ये कैसी बेकसी है, कि दिल ज़ार हो गया

उसने हमें जो दर्द दिया हम क्या बयां करें 
वो तो मेरे रकीब का हमवार हो गया 

एक बार कि खता तो चलो माफ़ भी करें 
लेकिन ये उनका इश्क में हर बार हो गया

अब ना कोई यकीन, ना कोई ऐतबार है
दिल का महल तो आज फिर मिस्मार हो गया 

क्या है वफ़ा, क्या प्यार, क्या इश्क, इन दिनों 
लगता है जैसे  ये कोई बाज़ार हो गया 

हम तो गए थे लेके हथेली पे दिल "सिया"
उनकी तरफ से इश्क में इनकार हो गया 

सिया 

Sunday, 27 February 2011

गीत

इक मेहरबां की हमपे इनायत हुई 
ज़िन्दगी में कई रंग भरने लगे
कल  तलक हर कदम सिर्फ बोझल सा था 
अब तो हर राह से हम गुजरने लगे 

खुद को भूले थे हम , कोई अरमां न थे 
आपका साथ जबसे मिला  है हमें 
हम आखिर को  बनने संवरने लगे

अब तो तन्हाई भी मेरी तनहा नहीं 
उनके ख्वाबों में ऐसी थी जादूगरी 
ख्वाब उनके ही दिल में उतरने लगे

एक चुप्पी सी होटों पे बाकी थी बस 
और अब देखिये क्या क्या होने लगा
गीत,नगमें  मेरी मांग भरने लगे 

अपना ही अक्स मुझको कहाँ याद था 
हर नफ़स, और हरेक पल ही नाशाद था
आजकल  गम भी हमसे मुकरने लगे

सोचा हमने "सिया" उनसे कुछ तो कहें
उनके दिल में नदी बनके आखिर बहें
क्या  हुआ किसलिए हम यूँ डरने लगे

सिया 

Thursday, 24 February 2011

गीत

मैं अक्सर सोचा करती हूँ , तुम कैसे हो, तुम कैसे हो
तुम ख़ुश्बू बेला गुलाब से, तुम हर पल चन्दन जैसे हो


धूप हो उजली सर्दी की तुम, तुम रातें रोशन पूनम की
तुम गर्मी से आहत मन की राहत सावन जैसे  हो


मैंने तुमको दे डाला दिल, सोचो कैसे होगे  तुम
तुम हो मेरी जान सनम तुम दरिया सागर जैसे हो


काली रातों के चराग तुम, तन-मन रौशन करते हो
राह दिखाओ भटके मन को तुम तो बिलकुल वैसे हो


जैसा अक्स ख्यालों में था, तुमको वैसा पाया है
तुम "सिया" की सोच थी जैसी जानम सचमुच वैसे हो

सिया  

Wednesday, 23 February 2011


मुझे न इतना सताओ, बहोत उदास हूँ मैं
ज़रा सा मान भी जाओ, बहोत उदास हूँ मैं

कुछ तो ज्यादा नहीं माँगा था ज़िन्दगी तुमसे
वफ़ा की राह दिखाओ, बहोत उदास हूँ मैं 

इतने नश्तर न चुभाओ,तुम मेरे दिल पर 
यूँ दुश्मनी न निभाओ, बहोत उदास हूँ मैं

चैन से जी लूँ मैं कुछ पल तो सुकूं मुझको 
न इतना दिल को दुखाओ, बहोत उदास हूँ मैं 

मैं खुद ही टूट गया हौं ग़मों की ठोकर से 
मुझे यूँ अब न सताओ, बहोत उदास हूँ मैं 

"सिया"को जीना है आखिर यूँ बेसबब अब तो 
उम्मीद अब न बंधाओ, बहोत उदास हूँ मैं 
 
सिया सचदेव  

ग़ज़ल




मेरे यार मुझको तू हंसना सिखा दे 


घटाओं को खुल के बरसना सिखा दे


कोई भटकती हुई रूह हूँ मैं 
मुझे अपनी आँखों में बसना सिखा दे 


नई हूँ मुहब्बत की राहों में आख़िर
मुझे हिज्र में अब तरसना सिखा दे


सुना है की ज़ुल्फों में जादू बड़ा है 
ज़रा मुझको ज़ुल्फों से डसना सिखा दे


बड़ी कोशिशें हैं मुहब्बत को सीखूं 
"सिया" को अब का बरस ना सिखा दे 
 

सिया सचदेव