Sunday, 27 February 2011

गीत

इक मेहरबां की हमपे इनायत हुई 
ज़िन्दगी में कई रंग भरने लगे
कल  तलक हर कदम सिर्फ बोझल सा था 
अब तो हर राह से हम गुजरने लगे 

खुद को भूले थे हम , कोई अरमां न थे 
आपका साथ जबसे मिला  है हमें 
हम आखिर को  बनने संवरने लगे

अब तो तन्हाई भी मेरी तनहा नहीं 
उनके ख्वाबों में ऐसी थी जादूगरी 
ख्वाब उनके ही दिल में उतरने लगे

एक चुप्पी सी होटों पे बाकी थी बस 
और अब देखिये क्या क्या होने लगा
गीत,नगमें  मेरी मांग भरने लगे 

अपना ही अक्स मुझको कहाँ याद था 
हर नफ़स, और हरेक पल ही नाशाद था
आजकल  गम भी हमसे मुकरने लगे

सोचा हमने "सिया" उनसे कुछ तो कहें
उनके दिल में नदी बनके आखिर बहें
क्या  हुआ किसलिए हम यूँ डरने लगे

सिया 

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