Thursday, 26 May 2016

ज़ह्र को जो दवा समझता है

ज़ह्र को जो दवा समझता है
वो मरज़ को शिफ़ा समझता है
क्या उदासी है मेरे चेहरे पे
मेरा दुःख आइना समझता है
कितनी तनहा हूँ मैं हुजूम में भी
तू कहाँ जानता समझता है
हूक उठती है मेरे सीने से
और वो क़हक़हा समझता है
जिससे वाबस्ता हूँ मैं शिद्दत से
क्या वो हर्फ़ ए वफ़ा समझता है
अस्ल में शेर कहने वाला ही
दर्द तख़लीक़ का समझता है
कोई देखे तो अंदरून उसका
खुद को जो पारसा समझता है
जाने क्या क्या गुमान हैं उसको
जाने वो ख़ुद को क्या समझता है
नाव को किस जगह डुबोना हैं
ये मेरा नाख़ुदा समझता है
उसकी मन्ज़िल हूँ मैं मगर ज़ालिम
वो फ़क़त रास्ता समझता है
राय उसको सिया मैं देती हूँ
जो मेरा मश्वरा समझता है
siya

Friday, 13 May 2016

ghazal रूबरू जब आ गया हैआईना

रूबरू जब आ गया हैआईना
खुद से ही मिलवा गया है आईना
वहशते बेचैनियाँ हैरानियाँ
देख कर घबरा गया है आईना
एक लम्हा लिख गया चेहरे पे कुछ
मुददतों देखा गया है आईना
अस्ल सूरत भी नज़र आती नहीं
इस क़दर धुँधला गया है आईना
झूठ के चेहरे की रंगत उड़ गयी
असलियत दिखला गया है आईना
दिल के जज़्बों की ख़ुदाया ख़ैर हो
संग से टकरा गया है आईना
सबके चेहरों पर बनावट की अदा
आज धोखा खा गया है आईना
साफ़गोई की मिली है ये सज़ा
आये दिन तोड़ा गया है आईना
rubroo jab aa gaya hai aaina
khud se hi milva gaya hai aaina
wehshate;n bechaniyan hairaniyan
dekh kar ghabra gaya hai aaina
ek lamha likh gaya chehre pe kuch
muddton dekha gaya hai aaina
asl surat bhi nazar aati nahi
is qadar dhundhla gaya hai aaina
jhooth ke chehre ki rangat ud gayi
asliyat dikhla gaya hai aaina
dil ke jazbo ki khudaya khair ho
sang se takra gaya hai aaina
sabke chehro par banavat ki ada
aaj dhokha kha gaya hai aaina
saafgoyi ki mili hai ye saza
aaye din toda gaya hai aaina

Friday, 6 May 2016

श्रमिक दिवस पर लिखी एक नज़्म


तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बदहाली का जीवन जीने पर मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
झुलसा देने वाली भीषण गर्मी हो
हाड़ कंपाने वाली चाहे सर्दी हो
दर-दर की ठोकर खाने को हैं मजबूर .
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
भूख प्यास पीड़ा को वो क्या समझेंगे
मजबूरों के दुःख को वो क्या जानेंगे
बड़ी बड़ी बाते कर के जो हैं मशहूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
बेबस और बेहाल यहाँ पर इतने हैं
जल संकट के कारण जाने कितने हैं
दूषित पानी पीने पर भी हैं मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
पड़ी आपदा फसलें सब बर्बाद हुई
उस बेबस से कहाँ कहाँ फ़रियाद हुई
आत्महत्या करने पर जो है मजबूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
सिसक--सिसक कैसे जीवन जी पायें
कभी चैन के पल दो पल हम भी पायें
इसी आस में बैठे हैं जो थक कर चूर
अब तो करदे रब्बा इनकी मुश्किल दूर
भर दें मालिक़ इनके जीवन में भी नूर
तकलीफों से जूझ रहे हैं जो मज़दूर
siya