Thursday, 17 July 2014

नज़्म - दिल- ए- बे -आसरा



नींद आँखों का साथ छोड़ गयी 
पलकें बोझल हैं मुज़्तरिब दिल है 
कौन है,,किसका इंतज़ार मुझे 
रात दिन बेक़रार रखता है ?
भीगी आँखों के नर्म गोशों से 
अश्क बन कर टपकता रहता है 
तकती रहती है जिसकी राह निग़ाह 


इक नज़र काश उसको मैं देखूँ 
छुप गया जाने रूठ कर वो कहाँ 
जैसे  छुप जाए चाँद बादल ओट 
फिर भी महसूस हो रहा है यही
वो मेरे आस पास हो जैसे 
बंद आँखे करूँ उसे छू लूँ 
वो बने चोर और मैं छुप जाऊँ 
कुछ न कुछ तो है रस्म ए उल्फ़त में 
दिल को जो बेक़रार करता है 
वरना एक बार जब बिछड़ जायें 
कौन फिर किसको याद करता है 


या इलाही ये कैसा रिश्ता है 
रग़ ए जाँ से क़रीब जिस्म से दूर 
दिल- ए- बे -आसरा है और मैं हूँ 
कौन वरना हुआ है यूं मजबूर 
ख़्वाब है या सराब है क्या है 
मैंने आँखों में जो बसाया है 
काश इक दिन ये भेद खुल जाए 
की वो अपना है या पराया है 
क्या वो सुन पायेगा मेरी आवाज़ ? 



Neend aankho'n ka saath chhod gayi
 Palke'n bojhal hai'n muztarib dil hai 
 Kaun hai......
.....kis ka intazaar mujhe....
Raat din beqaraar rakhta hai ?
Bheegi aankho'n ke narm gosho'n se/
Ashk ban kar tapakta rahta hai/ 
Takti rahti hai jiski raah nigaah 



ik nazar kaash usko main dekhoo"n.
Chhup gaya jaane rooth kar wo kahaa'n 
 jaise chhup jaaye chaand baadal ot 
phir bhi mahsoos ho raha hai yahi/
wo mere aas paas ho jaise 
Band aankhe'n karoo'n use chhoo loo'n.
 Wo bane chor aur mai'n chhup jaau'n 
Kuchh na kuchh to hai rasm-e-ulfate me'n 
 Dil ko jo beqaraar rakhta hai 
Warna ek baar jab bichhad jaaye'n
 Kaun phir kisko yaad karta hai.




Ya illahi ye kaisa rishta hai 
Rag-e-jaa'n se qareeb jism se door 
 Dil-e-be-aasra hai aur mai'n hoo'n 
Kaun warna hua hai yoo'n majboor 
Khwaab hai ya saraab hai kya hai 
 Mai'n ne aankho'n me'n jo basaaya hai 
Kaash ek din  ye bhed  khul jaaye
Ki wo apna hai ya paraaya hai 
Kya wo sun paayega meri awaaz?





Saturday, 12 July 2014

कभी ये खुद से कभी आईने से बात करूँ

बिसात पर उसे शह दूँ की अपनी मात करूँ 
कभी ये खुद से कभी आईने से बात करूँ 

तेरा ख़्याल तेरी आरज़ू हो घर मेरा 
तुझी में दिन को गुज़ारूं तुझी में रात करूँ 

वो सामने हो तो खुलती नहीं ज़बान मेरी 
निग़ाह दे जो इजाज़त तो उससे बात करूँ 

तेरे ही नाम का आँचल रहे सदा सर पर 
तेरे ही ज़िक्र से आँगन को क़ायनात करूँ 

सिया दुआ है ख़ुदा से वो वक़्त आ जाये 
मैं उसके नाम  ही अपनी ये कुल  हयात करूँ 

Friday, 11 July 2014

ज़िन्दगी जैसी ज़िन्दगी भी नहीं.

जुस्तजू के लिए ख़ुशी भी नहीं,
ज़िन्दगी जैसी ज़िन्दगी भी नहीं.

ख़्वाहिशें हैं के बढ़ती जाती हैं 
और कहने को कुछ कमी भी नहीं 

धुधला धुंधला सा है हर इक मंज़र
इन  निग़ाहों में रौशनी भी नहीं 

मैं तेरा नाम लेके मर जाऊं,
इतनी कमबख्त बेबसी भी नहीं,

धूप आई 'सिया' न मुद्दत से
और किस्मत में चांदनी भी नहीं.
..

Wednesday, 9 July 2014

मैं आँसू ऐसे समेटूँ की झील बन जाए

तिरे लिए मिरे ग़म की दलील बन जाए 
मैं आँसू ऐसे समेटूँ की झील बन जाए 

 ये तेरी तल्ख़ कलामी के तेज़तर नश्तर 
मेरी जगह जो कोई हो क़तील बन जाए.....

मैं उसके पास रहूँ वह न देख पाये मुझे 
खुद करें कोई ऐसी सबील बन जाए.।

क़दम जिधर को उठा लूँ वो रास्ता हो जाए 
जहाँ पे ठहरूँ वही संग ए मील हो जाए 

जो तेरी राह चले ए ख़ुदा वो नेक बने 
जो तेरा रास्ता छोड़े ज़लील  बन जाए 

सिया मिले कोई मुर्शिद तो ऐसा मुर्शिद हो 
हुज़ूर ए रब जो हमारा वकील बन जाए 


Tire liye mire gham ki daleel ban jaaye
 Mai'n aansu aise sametu'n ki jheel ban jaaye

Ye teri talkh kalaami ke teztar nashtar 
meri jagah jo koi ho qateel ban jaaye.....{.qateel Jis ka qatl ho}

Mai'n uske paas rahu'n woh na dekh paaye mujhe
 : Khuda kare koi aisi sabeel ban jaaye   ( sabeel = tareeqa)

Qadam jidhar ko utha le'n wo raasta ho jaaye 
: Jahaa'n pe thahre'n wahi sang-e-meel ban jaaye


Jo teri raah chale aye Khuda wo nek bane 
 Jo tera Raasta chhode zaleel ban jaaye


Siya mile koi murshid to aisa murshid ho 
 Huzoor-e-Rab jo hamaara wakeel ban jaaye



Sunday, 6 July 2014

इक शजर ,इक साया ,न उम्मीदी ,आँखे अश्कबार

भीगती शब.चाँद सन्नाटा  सितारे सब्ज़ाज़ार 
इक शजर ,इक साया ,न उम्मीदी ,आँखे अश्कबार 

खुद से लड़ती तेज़ तर मौजे ,नदी बिफरी हुई
इक शिकस्ता नाँव जिसका बादबाँ है तार तार   


सोच में डूबी हुई,खोयी हुई ,हर शय उदास 
ऐसे आलम में रहे किस दिल को खुद पे इख्तियार 

बे अमाँ  बेसब्र नग्में, बेसदा बे हर्फ़ लय 
एक कोने में टिका ,नाराज़ खुद से इक सितार .


एक प्याली  चाय सुब्ह ए हिज्र ख़ुद से गुफ़्तगू ............bichoh ki subha 
ज़ेहन में तूफ़ान चलती आँधियाँ गर्द ओ गुबार

कौन दे बेताब जज़्बों को नवद ए सुब्ह ए नौ 
आस का बोसीदा दामन भी हुआ अब तार तार 

दर्द का बादल है छाया वादी ए दिल पर मेरे 
मेरी आँखों से टपकते अश्क हैं या आबशार 

जी में आता है ख़मोशी ओढ़ कर  सो जाईयें 
बोलना ख़ुद का भी गुज़रे है सिया को नागवार 

bheegti shab,chand sannata,sitaare sabzazar
ik shajar,ik saya n ummedi ,aankhe'n ashkbaar 


khud se ladti tez tar mauje,nadi bifri hui 
ik shiksta naav' jiska badbaa'n hai taar taar { baadbaan naav mein baandhne wala ek kapda }

soch mein doobi hui,khoyi hui,har shay udaas 
aise aalam mein rahe kis dil ko khud pe ikhtiyaar 

be ama'n besabr nagme'n , besada be harf lay ..
ek kone mein tika, naraaz khud se ik sitaar .... .{beama'n ashant man .be sada bina aawaz ke nishabd }.

ek pyaali chai subh e hijr khud se guftgoo .....{subh e hijr..bichoh ki subha}
zehan mein tufaan chalti aandhiyaa'n gard o gubaar 

kaun de betaab jazbo'n ko nawad e subh e nau 
aas ka boseeda damaan bhi hua hai taar taar 

dard ka badal hai chaya wadi e dil par mere
meri aankho se tapakte ashk hain ya aabshaar {aabshaar yani jharna }

jee mein aata hai khamoshi odh kar so jaiye'n 
bolna khud ka bhi gujre hai siya ko nagwaar